होते भी कहां हैं हम भरोसे के काबिल?

हां, यह बात सही है कि मेरी सम्पूर्ण टीन-एज और उसके बाद का भी कुछ हिस्सा मठों में ही गुजरा है. प्रारब्धवश काफी कम उम्र में ही धार्मिक स्थल के प्रबंधन की भी जिम्मेदारी आन पड़ी थी. उसी दौरान बकरीद के दिन की बात है. 18-20 वर्ष पहले की. हमारे मठ से चार-पांच किलोमीटर दूर मुस्लिमों की एक बस्ती थी, अभी भी होगी ही.

वहां मुस्लिमों के रिवाज़ अनुसार इस ‘पाक’ मौके पर गायों की ‘कुर्बानी’ दी जा रही थी. उन्हीं में से एक गाय, जिसे रस्सी से पांव आदि बांध कर गिरा दिया गया था. गर्दन पर उसकी, कटार चलने ही वाली थी कि पता नहीं कहां से उसमें इतनी ताकत आ गयी. सारे बन्धनों को तोड़ते हुए गोमाता खड़ी हो गयी और भीड़ के बीच से ही भाग निकली.

आगे-आगे गाय और पीछे-पीछे खुदा के बन्दों का समूह हथियार लिए उस गाय का पीछा करते-करते दूर तक निकल आये थे. मुस्लिम बस्ती के बाद बीच में कई किलोमीटर खेत ही थे जहां आबादी नहीं थी. उसके बाद हिन्दुओं की आबादी वाले गांव थे. गाय भागकर हिन्दू इलाके में आ गयी थी. तनाव की स्थिति निर्मित हो गयी थी. दुस्साहसी मुस्लिम फिर भी अपने ‘शिकार’ को लेकर जाने पर अड़े हुए थे. पुलिस ने बीच-बचाव कर मामला सुलझाया, खाली हाथ भेजा ईमान वालों को.

अब सवाल यह था कि इस गाय का किया क्या जाय. उस बेजुबान ने जान भले बचा ली थी अपनी, लेकिन लगभग विक्षिप्त सी हो गयी थी. काफी जद्दोजहद के बाद उसे काबू किया गया था. अंततः तय हुआ था कि उसे मठ पर छोड़ दिया जाय. मठ पर दर्ज़नों गायें थी ही. उन्हीं की देख-रेख करने वालों में एक बुजुर्ग चरवाहे भी थे. चरवाहा होने के साथ-साथ उन्होंने संन्यास भी ले लिया था. पहले वे यादव थे, बाद में छेदी दास हो गए थे.

छेदी जी ने कहा कि वह निजी तौर पर इस गाय को पालना चाहते हैं. यानी रहेगी गाय मठ पर लेकिन यह उनकी अपनी संपत्ति होगी. अपन ने अनुमति दे दी उन्हें. उसके बाद उस संत-चरवाहे का दिन-रात का काम केवल उस गाय की सेवा करना ही रह गया था. पागल सी हो गयी वह गाय किसी भी इंसान पर भरोसा करने को तैयार नहीं थी. अगर कभी उसे रस्सी से मुक्त कर दिया जाता तो शायद सामने वाले को मार ही देती.

बड़ी तपस्या के बाद अंततः छेदी जी गाय का भरोसा जीतने में सफल हुए. बाद में भी केवल वह इकलौते ऐसे इंसान रहे, जिसपर गाय ने भरोसा किया. सुबह-सुबह अपन जाते थे गायों को रोटी खिलाने लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद मैं उसे कभी अपने हाथों से रोटी नहीं खिला पाया.

समय को तो रुकना था नही. वह गुजरता भी गया. अब अपना मठ को छोड़ने का समय आ गया था. नए लोगों ने काम सम्हाल लिया था. मेरे वहां से निकलने तक वह बूढ़ी और बेकार मान ली गयी गाय, जिसे बकरीद पर ‘कुर्बान’ होना था, उसने छेदीदास जी की हालत सुधार दी थी. तीन बछिया तब तक दे चुकी थी वह. देसी नस्ल के हिसाब से दूध भी ठीक-ठाक ही देती थी, जिसमें से कुछ बेचकर संत जी का खर्च भी चल जाता था. फिर वे बछिया भी बड़ी होने लगी थी.

कुनबा बड़ा हो रहा था छेदी जी का और काषाय वस्त्र उतारने का अपना समय भी आ गया था. हम शामिल हो गए थे फिर से दुनिया के मेले में. घर वापसी के बाद कभी फिर मठ की तरफ जाना हुआ नहीं, सो आगे का पता नहीं, पर तब तक अधेड़ छेदी जी को मानो जीवन का मकसद मिल गया था. ‘आर्थिक सुरक्षा’ भी हासिल हो गयी थी उन्हें कुछ हद तक.

हां… इतना ज़रूर था कि लाख सेवा-सुश्रुषा के बावजूद उस गाय ने फिर कभी किसी इंसान पर (छेदी जी के अपवाद को छोड़कर) भरोसा नहीं किया. होते भी कहां हैं हम भरोसे के काबिल?

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