अलौकिक प्रेम कथा-2 : मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की

अलौकिक प्रेम कथा-1 : मैं हूँ ही नहीं इस दुनिया की

अब आगे…

लावण्या के बारे में सोचते हुए कर्ष ने जैसे ही शॉवर का लिवर घुमाया तेज फुहारें उस पर बरस पड़ी, प्रेमाग्नि से प्रज्वलित देह पर जल शीतलता नहीं अग्नि बरसाता है. कर्ष को भी यही अनुभव हुआ.

प्रकृति ने जिस तरह इतने सुंदर परिवेश में अविश्वसनीय घटनाक्रम के माध्यम से उन्हें सामीप्य प्रदान किया था, उसे स्मरण कर उसे सबकुछ ईश्वरीय सा ही लग रहा था.

शॉवर प्लेट में अपने ऊर्ध्व अनावृत तन को देखकर उसे याद आया कि कैसे अंतर्मुखी स्वभाव वाले इस व्यक्ति ने जिसने कभी आधुनिक उत्तरेय (बनियान ) में भी कोई फोटो नही खिंचवाई थी, उसी ने अपने स्नान के निजी क्षणों में अपने स्कन्धपर्यंत ऊर्ध्व का स्वचित्र अपनी प्रिया से शेयर किया था.

स्त्री सौन्दर्य पर तो बहुत कुछ लिखा गया है लेकिन तब जो लावण्या ने उसके बारे में लिखा था वह भी कुमारसम्भवम के किसी श्रेष्ठ अंश से कम नहीं था.

उसे स्मरण कर वह पुरुष होकर भी शरमा सा गया और साथ ही एक कुटिल मुस्कान ने उस लज्जा को भंग कर दिया. कर्ष के मन मे चल रहे ये मधुर स्पंदन उसके जीवन का मार्ग बदलने वाले हैं, यह लेखक ही जानता था बस.

नहाकर बाहर आये कर्ष के लिए एक और अविश्वसनीय दृश्य प्रतीक्षारत था. 30 -35 मिनट जब वह अपनी यादों के साथ स्नानागार में था तब तक उसका कमरा “मद्धिम प्रकाशित रात्रिभोज” की परिकल्पना के अनुसार सज्ज था.

एक बड़ी मेज पर भोजन सुव्यवस्थित तरीके से स्थित था, पुष्पों की सजावट एवं बहुरंगी फ्रील से बद्ध. कमरे की विद्युत सज्ज़ा भी उसी लय के अनुकूल परिवर्तित हो गई लगती थी.

घड़ी साढ़े सात बजा रही थी, कर्ष की धड़कने अब प्रियामिलन को व्याकुल थी. इतना दूर तो वह जयपुर रहते हुए भी ना रह पाता था लावण्या से कभी. मोबाइल के माध्यम से ही सही संपर्क बना रहता था हमेशा. इंतजार पर दोनों ही जम के लिखते थे जिसे भी मौका मिलता था.

ऐसे ही किसी अवसर पर एक बार लावण्या ने उस से कहा था,

“बना के दिल को दिया और अरमानों को बाती इश्क की आग मैं जल तो सही,
वो भी आ जायेगी हमकदम फ़ारनूस बन के तू एक कदम आगे चल तो सही…
जलना तो होगा ही! राहे-ईश्क जो है.

वार्डरोब से एक शानदार परिधान युग्म निकाल कर कर्ष भी इस स्वप्निल डिनर के लिये तैयार हो गया. उसके चेहरे पर एक अलग सी आभा प्रस्फुटित हो रही थी. प्रेम अपनी अभिव्यक्ति के सभी विकल्पों को लेकर निरपेक्ष होता है, तरल होता है जो प्रत्येक संभावित ढलान की ओर चल पड़ता है.

जैसे जैसे कर्ष की व्यग्रता बढ़ रही थी वैसे वैसे ही उसके मन से निकली अदृश्य तरंगे लावण्या तक पहुंच कर परावर्तित हो रही थी. धड़कने जैसे ही अनियंत्रित प्रतीत हुई कि दरवाजे पर लैच के उपयोग की ध्वनि ने व्यग्रता को चरम पर पंहुंचा दिया.

पैसेज की रोशनी जब उस छवि पर पड़ी तो कर्ष की सांसे थम सी गई. तय समय से 15 मिनट पहले कर्ष के आत्मिक आव्हान पर लावण्या अपने पूर्णिमा स्वरूप में प्रकट थी. सुनहरी रोशनी में चमकते पूर्ण स्वतंत्र केश, अर्धपारगम्य रक्तवर्णा शिफॉन साड़ी से आवृत, श्यामरंग अंगिया धारण किये गौरांग लावण्या साक्षात रति रूप लग रही थी.

स्वर्णिम प्रकाश उसकी शुभ्र देह से परावर्तित होकर चांदनी की तरह छिटक रहा था, जैसे स्वयं शशि प्रकट हो गए हो अपनी पूर्णता लिए और लावण्या के देह से अंगकान्ति के रूप में दृष्टिगोचर हो रहे हो. इस समय लावण्या अपने नाम को चरितार्थ कर रही थी.

वह जाने क्यों वही खड़ी रही और कर्ष देखता ही रहा जैसे समय रुक गया हो, अलौकिक प्रेम असाधारण घटनाएं उत्पन करने में समर्थ होता है.

आखिर लावण्या के लिए ही संभव था समयधारा को फिर से प्रवाह देना सो वह धीमे धीमे आगे बढ़ी, कर्ष की आंखों में आंखे डालते हुए या कहे आंखों से होकर हृदय में प्रविष्ट होते हुए. कर्ष भी शिवांश ही था जो ऐसी स्थिति में भी सहज होकर एक सुंदर मुस्कान प्रकट करते हुए, अपनी वाणी से अनंग होकर रति का अभिवादन करने लगा ……

ये लटें श्याम बलखाती सी,
ये लाली लार चुआति सी,
ये काजल सीमारेखा सा,
सब कुछ करीब से देखा सा.

ये नथ नखरीली बैरन सी,
जुल्फें आवारा जोगन सी,
बिंदी ललाट पर स्वामिनी सी,
पलके अभिमंत्रित कामिनी सी..

ग्रीवा कमनीय सुराही सी
बाली पाथी पर स्याही सी
मुस्कान मनोहर मोहिनी सी
गलमाल सुशोभित सोहनी सी..

ये गौर कलाई चंदन सी,
चूड़ियां चमकीली कुंदन सी,
नज़रें तीखी अचूक तीर सी,
प्राप्तव्य मरुभूमि में नीर सी…

लावण्या लज्जायुक्त मुस्कुराहट के साथ नत हो गई और कर्ष के समीप आ गई.

कर्ष ने उसे बाहों में भरते हुए पूछा,” कैसी हो प्रिये ??”
लावण्या समर्पण सहित बोली,” प्रसन्न हूँ प्रिय, आपको स्वस्थ देखकर.”

दोनों ने सम्मानजनक समयांतराल पर एक दूसरे को मुक्त कर दिया. कर्ष ने कुर्सी खींची और लावण्या को बैठने का निवेदन किया. कर्ष भी बैठ गया उसके ठीक सामने और दोनों एकबार फिर से एक दूसरे की आंखों में ओझल हो गए.

लावण्या ने फिर से समय का प्रवाह अपने हाथों में लिया और एक कौर कर्ष की ओर बढ़ाया. कर्ष ने प्रेमपूर्वक स्वीकार किया और दृष्टि फिर से लावण्या के नेत्रों में प्रविष्ट कर दी.जैसे कर्ष बिना कुछ पूछे ही अपने सभी प्रश्नों, जिज्ञासाओं और प्रेम की थाह पा लेना चाहता हो उन स्याह काले नेत्रवृत्तों से. सच है सर्वदा कि हृदयप्रदेश का प्रवेश महामार्ग है नेत्र.

क्या भूख रही होगी भोजन की और क्या स्वाद तब जबकि आप एक शरीर नहीं भावात्मक रूप से केवल आत्मा के समान अनुभव कर रहे हो स्वयं को?

वैसे भी स्वाद भोजन में कहां होता है वह तो तृष्णा में ही होता हैं, न माने तो कभी पूर्ण संतुष्टि के बाद अपने सबसे पसंदीदा व्यंजन को चख कर देखे !

बस वही बात थी, कर्ष को क्या पता कि वह क्या खा रहा है और क्या पी रहा है, उसे तो बस लावण्या की अंगुलियों के स्पर्श का स्वाद आ रहा था और नेत्रों की मदिरा का, लावण्या की तृष्णा का…

लावण्या के पार्श्व में कांच से दिखता हिमाच्छादित हिमालय पूर्णिमा के पूर्णसोम के प्रकाश से आलोकित हो रहा था. देवदार के विशाल वृक्षों की शाखाएं पवन से प्रभावित होकर नृत्य में मग्न थी जैसे उनके प्रेमगीत का पार्श्वपटल बना दिया हो प्रकृति ने. होंठो को अवकाश मिला तो कर्ष ने भुना लिया ये शब्द कह कर,

“जलने लगा हूँ परवाना बनकर अब मैं,
मेरी शमा तू खुद को ऐसे ही जलाये रखना.।
डूब जांऊ गहरे कहीं तेरी इन आँखों में नशीली,
तब तलक तू बस इनको जाम पिलाये रखना.।

लज्जामिश्रित समर्पण भाव से सिर झुकाके हंसती लावण्या कर्ष के निमंत्रण को सादर स्वीकार कर रही थी.

कर्ष को भी ऐसे ही सकारात्मक संदेश प्राप्ति की आकांक्षा थी या कहें उत्कंठा थी. उसने इस बार कौर के साथ ही उसके हाथ को पकड़ लिया और करतल के पार्श्व भाग को चूम लिया.

लावण्या ने फिर से गर्दन झुका ली और बिल्कुल शांत हो गई, सांसो का आवागमन भी ध्वनिहीन हो गया हो जैसे, पहला प्रेमचिन्ह लावण्या के सम्पूर्ण देह को झंकृत करता हुआ आत्मा तक स्पंदित कर गया.

कर्ष हाथ पकड़े हुए ही खड़ा हो गया और बोला,

” I love you, laavanya .

वैसे तो दोनों ही ये शब्द दिन में सौ बार बोल देते थे लेकिन आज जब कर्ष ने प्रत्यक्ष प्रदर्शित कर दिया तो नित्य तत्काल प्रतियुत्तर देने वाली लावण्या मौन ही रह गई और अवाक भी.

 

इजहार तो उसने भी कर दिया लेकिन इस बार अलग तरीके से, लावण्या ने गंभीरता से अपनी दृष्टि दृढ़ करके कर्ष की आंखों में देखा और यह परीक्षण कर लिया कि उसके इन शब्दों में सत्य का सागर हिलोरे भर रहा है, उसके बाद आई हल्की मुस्कान और फिर से गर्दन का झुकना बिना कहे ही उद्घोष कर गया,

” I love you too jaan . ”

लावण्या भी खड़ी हो चुकी थी तब तक, कर्ष ने उसे बाहों में भर लिया और अपनी और खींचते हुए एक गंभीर ओष्ठमिलन लावण्या के मधुर होठों पर आरोहित कर दिया.

दोनों ने फिर से समयांतराल का ध्यान रखते हुए एक दूसरे को मुक्त कर दिया. हल्की मुस्कान के साथ दोनों की ही गर्दन झुक गई. दोनों फिर से कुर्सियों पर बैठ गए. कुछ समय के लिए पूर्ण शांति और स्तब्धता छा गई उस स्थान पर. दोनों अपने इस अद्भुत अनुभव को अपनी चेतना के स्मृति कोष में स्थायी करने में रत थे.

लावण्या जानती थी कि कर्ष उसकी निजता का सम्मान करेगा और तब तक आगे नहीं बढ़ेगा जब तक वह सांकेतिक स्वीकृति नहीं देगी. उसने शुरुआत करते हुए कहा,
” हमारी प्रिय कविता को आज पूर्ण नहीं करोगे कर्ष?

“अवश्य प्रिये, किन्तु शर्त अब भी वही है,
जो अनावृत होगा उसी का वर्णन होगा “- कर्ष

शर्माते हुए लावण्या बोली,
“यह तो ज्यादती है प्रिय, हमें लज्ज़ा आती है.”

“ठीक है ! तो फिर आप ही चयन कर लें, कल्पना का आश्रय लेकर लिखूं या यथार्थ का?

यथार्थ का प्रभाव आप देख ही चुकी हैं पहले.”
अपने सौंदर्य के वर्णन हेतु कौन स्त्री यथार्थ को छोड़ कल्पना को वरीयता देती?
लावण्या निरुत्तर थी, वह उठी और शैया पर विस्तृत हो गई, अपनी रमणीय देह के ऊपरी अर्द्ध क्षेत्र को वस्त्रों के बंधन से मुक्त करके बोली, “लीजिये ! अब कहिये.”

कर्ष ने एक प्रचंड कामबाण अपने उर में प्रविष्ट पाया और चीत्कार ने ये शब्द उत्पन्न किये,

“स्कन्ध सुडौल स्तंभक से
उरोजमुख मणि स्यंतक से
गोरांग उदरपटल कमलसम
गंभीर नाभि सुशोभित विहंगम.

कटि अल्प सुरम्य, धनुष सम राजे
पृष्ठ प्रफ्फुलित, कुमुदिनि सम साजे
जंघाएँ स्निग्ध, तरु केल स्तम्भ है
उर्वा सम सुगोल श्रेष्ट नितम्ब है.

श्रृंगार अब कामनिवेदन में परिवर्तित होने लग गया.

है कामिनी !अब अनुपम दर्श दिखा दो,
सुकोमल तन का मधुर स्पर्श करा दो,
दृष्टि को मार्ग दो अब पूर्ण कटि सुरम्य का,
तनित प्रत्यंचा सम उदर पटल गंतव्य का…

अब तक हुई व्यग्रता ने भी कविता का रूप ले लिया,

वो कब से कह रही थी कि कुछ तुम भी कहो,
बह रही है सौंदर्य धारा साथ कुछ तुम भी बहो,

मै मूढ़ बहता ही रहा कुछ कागज़ों के साथ में,
वो गीत गाती चल रही थी रसप्याल लिए हाथ में,

हूँ प्रज्ञ ऐसा है प्रसिद्ध फिर भी बुझ ना पाया सार को,
सब कुछ पाकर भी हूँ शून्य जो न पाया कामिनी के प्यार को,

वो बहुत रुकी अतृप्त सी निहारती स्वभाग्य को,
मैं अभागा समझ ना पाया वक्रगामी दुर्भाग्य को,

देव फिर भी पक्ष में थे समय पर समझा गए
व्यर्थ की बातों से नयनों को मेरे सुलझा गए,

संयोग पाकर जैसे ही नज़रें गिरीं अलौकिक देह पर,
गंधर्व प्रणयरस गाने लगे इस पारलौकिक स्नेह पर,

रति सी तेरी सुगम काया मेरे हृदय को थी वेधती,
मदग्राह्य हथिनी जिस तरह हर पाश को हो भेदती,

गौरांगी, रक्तवस्त्रा, अल्पकटी, केशमुक्ता प्रसन्न हो,
अलौकिक जगत में मुझ साधक संग आसन्न हो,

दो अनुमति, है विनती! सौंदर्य पान की अनुसंशा हो,
सम्पूर्ण देह का स्वामी होकर रमण की पूर्णाकंक्षा हो।।

विनय स्वीकार हो चुका था पूर्णाधिकार के साथ …..
लावण्या के नेत्र और अंगुलियों के इशारे ने अपेक्षित स्वीकृति प्रदान कर दी, कर्ष भी अब शैया पर आरूढ़ था जैसे मृगया पर निकले काम बाणों से सुसज्जित मकरध्वज अनंग अपने रथ पर आरूढ़ हो. अब तो समय नियंत्रण हीन होना अवश्यम्भावी था.

कर्ष ने लावण्या को स्पर्श किया, लावण्या ने कर्ष को, तृष्णा की संतुष्टि के प्रारंभिक कर्ता अंगुलियों की पोर और होंठ अपने अपने कार्य में सम्पूर्ण कुशलता से लग गए.

जैसे बाहर चंद्र के प्रकाश ने हिमक्षेत्र को अपने आग़ोश में ले लिया, वैसे ही कर्ष ने लावण्या को स्वयं से आच्छादित कर दिया.

दोनों जाने कहाँ अदृश्य हो गए और उनके स्थान पर जैसे रति और कामदेव ही प्रकट हो गए, सम्पूर्ण सृष्टि रतिमय होकर अधीरता से अनंग को कण कण में ढूंढने लगी और अदृश्य अनंग अनजान विमाओं से रसज शरसंधान करने लगे. वे बाण रति के उर को भेदते और उससे उत्पन्न शब्द अनंग को आनंद देते और प्रेरणा भी, मकरध्वज अब अपने शिखर पर थे जहाँ वे त्रिदेवों को भी पीड़ित करने का सामर्थ्य रखते थे. केवल काल ही उनके इस उग्र रूप को शांत करने में सक्षम रहा है सर्वदा और उसने ही अंततः सादर स्तुति से अवरोहण का मार्ग प्रशस्त किया.

विराट हिमालय, पूर्णिमा, व्यास नदी और वनराज इस उत्सव के साक्षी बने. समय भी असंतुलित होकर उनकी सांसो की गति से प्रभावित सा दिखने लगा. बाहर गला देने वाली हिमज शीतलता भी इस कमरे में धधकती प्रणायाग्नि को नमन करने लगी.

सहस्त्र योजन की दूरी पर स्थित होते हुए भी स्वयं जलधि उनकी अलौकिक देह से स्वेद सागर के रूप में प्रकट हुए. सभी आवेग श्रेष्ठता को स्पर्श कर अब शांत होने लगे, देवदार की शाखाएं भी अब पक्षियों को निर्भय करने लगी. सागर को स्वेद रूप में देख लहरे भी शांत हो गई.

शून्य सी नीरवता छा गई सृष्टि में जैसे संतुष्ट होकर कृष्ण के अव्यक्त स्वरूप में लय होने जा रही हो, सांसो के साथ समय भी अब सहज होने लगा. प्रकृति की भौतिक जय में विजेता वाला शांत भाव स्पष्ट था.

अब तक दहलीज पर स्थिर चांदनी अब इन उष्ण देहों को शीतल करने उस कमरे में प्रविष्ट हुई और वे भी हिमखंडों की तरह रजत की भांति आलोकित होने लगे.

दोनों ने एक दूसरे की आंखों में आंखे डाली, लेकिन ना कुछ जानने को शेष, ना पाने को तो कब पलकें पटाक्षेप कर गई अज्ञात ही रहा.

क्रमश:

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