भले आप चुप रहें, हम सब हैं ना सच बोलने के लिए

फाइल फ़ोटो : आफ़रीन रहमान

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की भोपाल में हुई बैठक इस धमकी के साथ समाप्त हो गयी कि वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करता है मगर शरीयत में किसी भी प्रकार का दख़्ल बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. सुप्रीम कोर्ट के तीन तलाक़ को असंवैधानिक ठहराने को उसने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर हमला बताया. सुप्रीम कोर्ट में तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ याचिका ले कर पहुंची आफ़रीन रहमान का कहना है “तीन तलाक़ शरीयत में कहीं भी मान्य नहीं है लेकिन यह चलन में आ गया है और इससे काफ़ी औरतों की ज़िन्दगी ख़राब हो रही है.”

ये बात इतनी मासूमियत से कही गयी है जैसे कोई कहे, “मुझे चलते-चलते रस्ते में एक रुपये का सिक्का दिखाई दिया और मैंने बिना सोचे-समझे उठा लिया”. हाय हाय सदक़े जाऊं आफ़रीन बीबी की बलैयां लूँ. तीन तलाक़ इतनी छोटी सी चीज़ है कि अपने आप चलन में आ गया. ये पड़ौसन से एक कटोरी चीनी उधार लेना है. आज ली और कल लौटा दी. पाकीज़ा की याद आ गयी ” मुझे कोई मिल गया था सरे-राह चलते चलते…”

शरीयत जो क़ुरआन, हदीस (मुहम्मद जी के जीवन की लिखित और अनेकों प्रकार से पुष्ट घटनायें), इस्लाम के न्याय शास्त्र के आचार्यों का विधान का मिला-जुला स्वरूप है, में आफ़रीन बीबी आपके अनुसार तीन तलाक़ का कोई ज़िक्र ही नहीं है? यह तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ यदि वर्षों मुक़दमा लड़ कर सुप्रीम कोर्ट नहीं गयी होतीं तो मैं समझता कि वो चुटकुला सुना रही हैं मगर यह तो तीन तलाक़ के विरोध में पक्षकार थीं. तो फिर इस स्टेटमेंट की क्या तुक है? निश्चित ही यह सत्य से अवगत नहीं हैं या यह इस्लाम के चेहरे से नक़ाब नहीं उतरने देना चाहतीं.

आइये निकाह और तलाक़ क्या है इसे जाना जाये. इसी से समझ भी आयेगा कि तीन तलाक़ पर आख़िर इतना हंगामा क्यों है?

सारी इस्लामी दुनिया में अधिसंख्य देशों ने इसे नकार दिया है तो भारत में ही टसुए क्यों बहाये जा रहे हैं? मुल्ला जमात का सारे संसार में दावा है कि इस्लाम ने औरतों को सबसे अधिक अधिकार दिए. इस्लाम में निकाह एक कॉन्ट्रेक्ट है. जिसमें दो गवाहों की उपस्थिति में औरत की स्वीकृति मुल्ला लेता है. इसमें शौहर को मेहर तय कर वचनबद्ध होना होता है.

पहले देखें कि औरत क्या है? निकाह क्या है?

जब हम क़ुरआन और हदीसों का अध्ययन करते हैं तो पता चलता है कि औरत एक ‘विपत्ति’ है जिसे आदमी को झेलना है. वो एक खेत है जिसे आदमी अपनी इच्छा के अनुसार सींचे, चाहे न सींचे.

मोमिन पूछता है “ओ अबू सईद मेरे पास कुछ लौंडियाँ हैं जो मेरी बीबियों से बेहतर हैं लेकिन मैं नहीं चाहता कि वो सभी हामिला हो जायें. क्या मैं उनके साथ अज़्ल (मैथुन) कर लूँ”? इस पर उसे बताया जाता है “वे तुम्हारे लिए काश्तकारी के खेत हैं, अगर तुम उन्हें सींचना चाहते हो तो सींचो अगर तुम उन्हें सींचना नहीं चाहते हो तो उन्हें सूखा रखो (संदर्भ इमाम मलिक मुवत्ता, शेख़ मुहम्मद अशरफ़, लाहौर अध्याय 360 1121).

ध्यान रहे कि यह अल्लाह के फ़रमान की पुनर्स्वीकृति भर है. “तुम्हारी बीबियां तुम्हारे लिये खेती के समान हैं. जिस तरह से चाहो अपनी खेती में जाओ…” (क़ुरआन आयत संख्या 223 सूरा 2)

(यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इस्लाम लौंडियों की स्वीकृति देता है. मुहम्मद जी के पास भी लौंडियाँ थीं. उनके बहुसंख्यक सहाबी/ साथी भी लौंडियाँ रखते थे. ज्ञातव्य है कि लौंडी युद्ध में बंदी बनायी/ लूटी गयी औरतें होती हैं तथा ऐसी औरतें भी जिन्हें इस्लामी ख़रीद कर सैक्स दासी बनाते हैं)

इस्लाम की दृष्टि में औरत अधिकतम उन चीज़ों में से एक है जिन्हें अल्लाह ने आदमी के आनंद के लिए बनाया है. मुहम्मद जी का कथन है “पूरा संसार आनंद लेने के लिये है मगर दुनिया में सबसे अच्छी चीज़ है एक औरत” (संदर्भ निष्कत अल मसाहिब लाहौर खंड 1 पृष्ठ 6).

इस सिलसिले में निकाह औरत का आनंद उठाने का एक इक़रारनामा भर है. जिसमें वह शर्तें निर्धारित की जाती हैं जिनके आधार पर वह उस औरत का आनंद उठा सकता है. इन्हीं शर्तों में मेहर होता है. मेहर का शाब्दिक अर्थ है उजरत यानी औरत को इस्तेमाल करने का किराया या भाड़ा. संभव है कि कुछ लोग इस पर चीं मीं करें, अतः क़ुरआन की यह आयत इस विषय पर अंतिम प्रकाश डालने के लिए पर्याप्त है “ओ पैग़ंबर हमने तुम्हारी बीबियों को जिन्हें तुमने उनका उजुरः अदा किया, तुम्हारे लिए दिया है” (आयत संख्या 24-25 सूरा 4).

यह भी ज्ञातव्य है और 4-6 सच बोलने वाले मुसलमानों से पुष्टि की जा सकती है कि व्यवहार में मेहर सुहागरात को ही माफ़ करा लिया जाता है. इस्लाम के अनुसार औरत पुरुष से नीची, दूसरे स्थान पर होती है. उनका काम है शौहर की फ़रमाबरदारी करना और उन्हें हर लिहाज़ से संतुष्ट करना. उनके बारे में यह भी मिलता है कि उनमें अक़्ल की कमी होती है, वे कृतघ्न होती हैं. मर्द की तरफ़ आगे बढ़ती हुई औरत शैतान होती है, मर्द से पीछे हटती हुई औरत शैतान होती है और जहन्नम में वो अधिक संख्या में होंगी.

शरीयत ने शौहर को अपनी बीबी को घर से निकाल देने उसे डरा-धमका कर ग़ुलाम बना कर रखने के असीमित और अमानवीय अधिकार दे रखे हैं. मुल्ला जमात को यह याद दिलाया जाये तो वो फ़रमाते हैं कि मुहम्मद जी ने कहा है “अल्लाह ने जो कुछ भी विधिसम्मत बनाया है उसमें कुछ भी तलाक़ से बढ़ कर घृणास्पद नहीं है” तो ऐसा क्यों है कि तलाक़ के सिलसिले में पागलपन, नृशंसता की हद तक पुरुष को दमन के अधिकार, फ़तवे सारी इस्लामी न्यायिक किताबों में भरे पड़े हैं.

वास्तविक स्थिति यह है कि मर्द को तलाक़ का अबाध, बिना शर्त अधिकार है. इस शब्द के उच्चारण के बाद औरत को उसका घर छोड़ने की अनिवार्य बाध्यता है. एक ही समय कर तीन तलाक़ बोलने पर उसकी बीबी को तुरंत घर छोड़ना पड़ता है. इद्दत की अवधि यानी 3 माहवारी में क्रमिक तलाक़ देने पर 3 महीने बाद भी उसे घर से दफ़ा होना पड़ता है. मर्द पर यह तक बताने की बाध्यता नहीं है कि उसने तलाक़ किस कारण दिया. उसके तलाक़ घोषित करने के बाद तीन महीने तक न्यूनतम रखरखाव के ख़र्च के अलावा उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है.

आइये कुछ तलाक़ और उन पर दिए गए फतवों को देखा जाये….

केस 260 : एक मौलवी ने एक बेवक़ूफ़ से तलाक़ कहलवा लिया हालाँकि बीबी निर्दोष है. इस मामले में क्या क़ानून है? और उस मौलवी के बारे में क्या व्यवस्था है?
फ़तवा : तलाक़ प्रभावी माना जायेगा. लेकिन बिना किसी कारण के किसी बीबी को तलाक़ दिलाना बुरी बात है. जिस मौलवी ने ऐसा किया वो बुरा आदमी है लेकिन तलाक़ प्रभावी माना जायेगा. बीबी अपने शौहर के लिए हराम है (फ़तवा-ए-दारुल उलूम देवबंद खंड 9 पेज नंबर 267).

फ़तवा नंबर 2193 : एक आदमी नशे की हालत में अपनी बीबी को शयनागार में सैक्स के लिए बुलाता है. वो आने में ज़रा देर करती है. पति कहता है “अगर तुम मेरी इच्छा को पूरा करती हो तो ठीक वर्ना तुम पर तलाक़”. फ़तवा-ए-क़ाज़ी ख़ान की व्यवस्था है कि पति की न केवल उस समय बल्कि कभी भी यह इच्छा पूरी नहीं की गयी तो तलाक़ हो जायेगा. इसका तर्क यह है कि शौहर द्वारा एक बार इच्छा प्रकट करने का बाद यह मान लिया जाना चाहिए कि वह भविष्य में भी तृप्ति के लिए उत्सुक रहेगा (फ़तवा-ए-क़ाज़ी ख़ान अंग्रेजी रूपांतर मौलवी यूसुफ़ बहादुर ख़ान और मौलवी विलायत हुसैन किताब भवन नई दिल्ली 1994).

फ़तवा नंबर 2297 : एक औरत अपने शौहर के साथ अपने पिता के घर रह रही है. शौहर अपने घर जाना तय करता है और बीबी से चलने के लिए कहता है. बीबी नानुकर करती है तो वो कहता है “अगर तुम मेरे साथ नहीं गयीं तो तुम पर तीन तलाक़”. यह कह कर पति सुसराल से निकल जाता है. इसके बाद बीबी भी वहाँ से चली जाती है और शौहर के घर पहुँचने से पहले घर पहुँच जाती है. इस पर फ़तवा दिया जाता है कि अगर औरत चली जाती है तो उसके चले जाने को उसके (शौहर के) साथ जाना नहीं कहा जा सकता. उसका तलाक़ माना जायेगा (फ़तवा-ए-क़ाज़ी ख़ान अंग्रेजी रूपांतर मौलवी यूसुफ़ बहादुर ख़ान और मौलवी विलायत हुसैन किताब भवन नई दिल्ली 1994)

फ़तवा नंबर 2321 : नशे की हालत में एक आदमी अपनी बीबी को पीट देता है. वो घर से बाहर चली जाती है. इस पर पति कहता है “अगर तुम लौट कर नहीं आईं तो मैं तुम्हें तलाक़ दे दूंगा”. यह बात दोपहर बाद हुई थी. औरत रात को लौट आती है. लेकिन उनका तलाक़ माना जायेगा चूँकि आदमी के हल्फ़ में फ़ौरन का भाव निहित है (फ़तवा-ए-क़ाज़ी ख़ान अंग्रेजी रूपांतर मौलवी यूसुफ़ बहादुर ख़ान और मौलवी विलायत हुसैन किताब भवन नई दिल्ली 1994)

फ़तवा नंबर 2098 : एक शौहर क़सम उठाता है “मैं अपनी नवविवाहिता पत्नी को कभी तलाक़ नहीं दूंगा. अगर मैं उसे तलाक़ दूँ तो मेरी बाक़ी सभी बीबियों को भी तीन तलाक़”. बाद में उसका मन बदल जाता है. अब वो किस तरह से अपनी बीबी से मुक्ति पाए और उसकी क़सम भी न टूटे? अब देखिये कि फ़तवा-ए-क़ाज़ी ख़ान कितनी सुंदर व्यवस्था दे कर रास्ता निकालता है. “इस मामले में तरीक़ा यह है कि शौहर किसी दूध पीती बच्ची (अर्थात जो ढाई साल से कम की हो) से निकाह कर ले और अपनी बीबी की मां और बहन से कहे कि वो इसे दूध पिलाये. इससे वह शिशु उसकी बीबी की बहन बन जाएगी और उसकी बीबी शिशु की मौसी भी बन जाएगी. ऐसी स्थिति में शौहर की शादी मौसी और भांजी से मानी जायेगी और दोनों रद्द हो जायेंगी. परिणामतः उस व्यक्ति की क़सम भी बच जाएगी और वह परिणाम भुगतने से बच जायेगा. (फ़तवा-ए-क़ाज़ी ख़ान खंड नंबर 2 पृष्ठ संख्या 117, किताब भवन नई दिल्ली 1994).

इस्लाम की देवबंदी, बरेलवी, शिया, वोहरा, अहमदिया इत्यादि सभी मसलकों की न्यायिक किताबों में ऐसे नृशंस और अमानवीय लाखों फ़रमान, फ़तवे हैं. फिर भी दावा किया जाता है कि इस्लाम ने औरतों को जितना ऊँचा स्थान दिया है किसी मज़हब ने नहीं दिया. यह सफ़ेद झूठ होने के बावजूद सम्पादकों, सैक्युलर चिंतकों, कम्युनिस्टों, काँग्रेसियों, सपाइयों, बसपाइयों, ललुओं की इस दावे से सहमति है. इसका कारण केवल यह है कि उन्होंने इन फ़रमानों के बारे में कुछ सुना ही नहीं. फिर वो पॉलिटिकली करैक्ट रहना चाहते हैं. कुलदीप नैयर से ही पूछिए कि मुल्ला पार्टी और पाकिस्तान एम्बेसी वाले पार्टियों में सबसे बढ़िया ख़ातिर करते हैं या नहीं.

साहिबों! आप-हम चाहे कुछ भी कहें, सोचें मगर आफ़रीन बीबी जैसों को तो अंदर की बात पता है. इस लिये वो इस्लाम का चेहरा बचाना चाहती हुई भी अपनी खाल भी बचाना चाहती हैं और इसी खींचातानी में बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गयी. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इस्लाम के इसी सौंदर्य को उजागर होने से बचाना चाहता है. कोई ग़म नहीं, हम सब हैं ना सच बोलने के लिए.

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