गौड़वैष्णवों की भोग खिचुरी की विधि

कालिन्दी किनारे, विश्रामघाट, मथुरा पर जो एक रात्रिभर व्यतीत करता है उसके मन में अनुराग का बीज पड़ जाता है, जिसके कारण वह मनुष्य जीवन में एक बार अचिंत्य प्रेम का भागी होता है. मेरे भाँजे अद्वैत आचार्य के पूर्वज विश्रामघाट पर ही रहकर द्वैतचिंतन में लीन रहा करते थे.

ज्येष्ठ की एकादशी की दोपहर जब वे निर्जल व्रत होने के कारण उस लता की भाँति क्षीण हो गए थे जिसकी वसंत में पत्रराशि झड़ जाती है और वह केवल पुष्पशेष रह जाती है; तब उन्हें महानुभाव रामानुजाचर्य ने शास्त्रार्थ में पराजित कर अपना वाद स्थापित किया. उन्होंने द्वैतभाव त्याग दूसरे दिन द्वादशी को यमुना और तुलसी के प्रसाद के संग विशिष्टाद्वैत ग्रहण किया.

अनुमानत: सहस्र वर्ष पीछे उन्हीं रामानुजाचारियों के यहाँ गौड़वैष्णवों की बेटी कनकलता (महाशय अद्वैत आचार्य की परदादी) ब्याहकर आई. पिछले वर्ष उनका वैकुण्ठगमन हो गया. सखाभाव होने के कारण उन्होंने मुझे गौड़वैष्णवों की भोग खिचुरी की विशुद्ध गौड़ीय विधि चुपचाप प्रदान की.

एक मुट्टी गोविंदभोग चावल, एक मुट्ठी मूँग की दाल, हल्दी, दालचीनी, छोटी इलायचियाँ और अनेक लौंग लेकर उसमें हरी मिर्च, जीरे और अदरक का छौंक देने और खड़ा नमक और ठीक उससे आधी मिश्री या गुड़ डालने पर भोग खिचुरी को मिट्टी की बटलोई में सिद्ध करना चाहिए. पुरातनसमय में चंदन की काठ की अग्नि पर खिचुरी बनाते किंतु अब सिद्ध होने के पश्चात् निकट कर्पूर जलाना चाहिए.

अचिंत्य भेदाभेद अर्थात् जीव और कृष्ण एक तो है किंतु भिन्न भिन्न भी है क्योंकि भिन्न भिन्न होने पर ही संयोग सिद्ध है, भिन्न ही एक हो सकते हैं. उसी प्रकार भोगखिचुरी में भिन्न भिन्न पदार्थ है किंतु भोगखिचुरी एक है.

ऐसी खिचुरी का भगवान को एकादशी को भोग लगाना चाहिए और स्वयं निर्जल-निराहार व्रत रखना चाहिए.

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