ग़ुलाम मुहम्मद दुर्रानी : पार्श्व गायन की बुलंदी, नवाबी ठरक और पतन

फिल्म संगीत में जिस तरह पुरुष गायन में मुहम्मद रफ़ी का अपना एक युग रहा है, वैसे ही जी.एम. दुर्रानी भी एक चकाचौंध भरी दौर के अगवा रहे है. 50 के दशक में इतने बड़े गायक थे कि धुन पसंद ना आने पर संगीतकार को मुँह पे ही बोल दिया करते थे… “पहले मेरे लायक धुन बनाना सीख लो तब रिहर्सल पर बुलाया करो”.

फिल्मी दुनिया की हर रंगीनी के शौकीन थे. लखनऊ के नवाब, एक नम्बर के ठरकी और रंगीन मिजाज थे. उस समय इनके पास तीन-तीन गाड़ियां हुआ करती थी जिसमें एक में बकायदा ‘बार’ बना हुआ था… फिल्म ‘शराबी’ के विक्की बाबू (अमिताभ बच्चन) की गाड़ी की तरह. रिहर्सल या रेकॉर्डिंग का टाइम कुछ भी हो, दुर्रानी जाते अपने ही टाइम से थे… बड़े और सफल गायक थे तो ज़ाहिर है प्रोड्यूसर्स और संगीतकार इंतज़ार करते थे.

एक बार ये नौशाद साहब के एक गाने की रेकॉर्डिंग कर रहे थे. साथ में गा रही थी एक नयी लड़की ‘लता मंगेशकर’. फिल्म थी ‘चाँदनी रात’ और गाना था.. ‘हाय छोरे की जात बड़ी बेवफा’. रोमांटिक गाना था तो दुर्रानी भी रोमांटिक हुए जा रहे थे. उस समय रेकॉर्डिंग में सिर्फ दो हो माइक यूज होते थे… एक गायकों के लिये और दूसरा रेकॉर्डिंग रूम से बाहर सारे साजिंदों के लिये.

सो गायक गायिका आमने-सामने खड़े होकर गा रहे थे. अपने हिस्से का गाना गाने के बाद दुर्रानी ‘शरारत’ पर उतर आते. नौशाद साहब ने जाकर दुर्रानी को समझाया… ‘भाई अपना हिस्सा ख़त्म होने पर नज़रें झुका कर चुपचाप खड़े हो जाया करो, लड़की नयी है… नर्वस हो रही है”. नयी गायिका लता जितना नर्वस नहीं हो रही थी उससे ज्यादा ‘अपमानित’ महसूस कर रही थी.

रंगीन तबियत के शौकीन दुर्रानी से एक दिन रहा ना गया. शुरू से ही सफेद साड़ी पहनने वाली लता से अपने लखनवी अंदाज में कहा… ‘लता ये क्या तुम रोज सफेद धोतियां लपेटकर चली आती हो. रेकॉर्डिंग में जरा शोख (रंगीन) लिबास में आया करो.’

लताजी को इस बात पर बड़ा गुस्सा आया कि इस आदमी को मेरे गाने से मतलब है या मेरे कपड़ों से. इस गाने के संगीतकार भी नौशाद ही थे. लताजी ने उनसे जाकर सीधे कह दिया कि “मैं इस आदमी के साथ गाना नही गाऊंगी”… बिना इस बात की परवाह किये कि नम्बर वन गायक के साथ गाने से मना करने पर उसके नये-नये कैरियर पर क्या असर पड़ेगा. उसे आगे काम मिलेगा भी या नहीं, नौशाद साहब भी अगली बार गंवायेंगे या नही.

नौशादजी ने भी लताजी को समझाया कि “बेटी अभी तुम नयी हो. इन बातों को इग्नोर करो. तुम्हारी आवाज इतनी अच्छी है कि तुम्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नही सकता. जब स्थापित हो जाओगी तब अपने मन की करना”. लेकिन इस अपमान से लताजी के रोम रोम में आग लगी हुई थी. उन्होंने नौशाद साब से इतना ही कहा… “ये गाना ना गाने पर आप मुझे माफ़ तो कर देंगे ना”… तब नौशाद साहब ने भी कहा… “हाँ बेटी तुम अपनी जगह सही हो” और रेकॉर्डिंग कैंसिल कर दी.

इस वाक़ये के बाद लताजी को जी.एम. दुर्रानी के साथ गाने नहीं मिले. उन्होंने सोचा शायद उनकी जगह दूसरी गायिका को ले लिया गया होगा लेकिन उन्हे बहुत बाद में पता चला कि इस घटना के बाद पहले से जिन संगीतकारों ने लता-दुर्रानी को ध्यान में रखकर धुनें बनाई थीं, उन्होंनें गायक बदल दिये.

संयोग या दुर्भाग्य की बात है कि इस घटना के बाद से ही जी.एम. दुर्रानी का पतन शुरू हुआ और देखते ही देखते वो गुमनामी की दुनिया में खो गये. घंटों तक संगीतकारों को इंतजार करवाने वाले दुर्रानी… 80 के दशक में रेडियो स्टेशन पर मिलने वाली छोटी मोटी भूमिकाओं के लिये वक्त से पहले पहुँच जाया करते थे, जहाँ कलाकारों को अधिकतम 100 रुपये पारिश्रमिक मिला करता था. अपनी कार में बार लेकर चलने वाले दुर्रानी साब इन रेडियो के दिनो में ही कई बार ‘वरली नाका’ के बस स्टैंड पर बीड़ी पीते हुए बस का इंतजार करते हुए भी देखे जाते थे.

वक्त की मार सबसे तगड़ी होती है. कामयाबी, शोहरत और पैसा सम्भालना बहुत मुश्किल काम है. जितने विनम्र बने रहेंगे उतना इनको साधना आसान होता है. 8 सितंबर 1988 को मुम्बई में जी.एम. दुर्रानी का निधन हुआ. (फोटो में जो प्राण साहब की तरह नज़र आ रहे हैं… यही हैं जी.एम. दुर्रानी)

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