क्या आपने कभी स्कूल में देखी अपने बच्चे की क्लास, टॉयलेट या वहाँ लगे कैमरा!

अगर एक दिन भी आप अपने बच्चे की फीस भरने में लेट हो गये तो स्कूल से रिमाइंडर्स की लाइन लग जाती है. चाहे कोई सा भी बड़ा स्कूल हो. ऐसा एक भी अभिभावक आपको नहीं मिलेगा किसी भी शहर के, किसी भी स्कूल का, जो ये कहे कि एक बार, एक महीने उनके बच्चे का स्कूल फीस लेना भूल गया था. जब फीस की बात आती है तो इनका मैनेजमेंट बहुत ही चुस्त और तगड़ा हो जाता है.

एक महीने की 8-9 हजार या 4-5 हजार फीस की तो बात छोड़िये… किसी एक्टिविटी के लिये मंगाये 200-250 रुपये तक ये नहीं भूलते… यहाँ तक कि किसी फ़ंक्शन में क्लिक की हुई फोटो जब बच्चों को देते है तो उसके भी 20-30 रुपये भूलने की गलती नहीं करते. पैसों के मामले में इन स्कूलों का मैनेजमेंट कोई गलती नहीं करता..

हाँ, जब बात बच्चों की सुरक्षा की आती है तो इनके मैनेजमेंट में कई गड्ढे नज़र आने लगते है. तब जिम्मेदारियों से भागने में इनका कोई जवाब नहीं होता. मेरे एक दोस्त के छह साल के बेटे को पिछले साल स्कूल में चोट लग गई. बच्चे मस्ती कर रहे थे तब एक लड़के ने उसको धक्का दे दिया जिससे चिन (ठुड्डी) पर टेबल का कोना लगा, खून की धार लग गई.

बच्चे का खून लगातार बह रहा था और 8500 रुपये महीना फीस लेने वाले स्कूल ने क्या किया… सुनो… बच्चे की माँ को फोन किया कि आप अरजेंट आ जाओ, आपके बच्चे को चोट लग गई है. ये तो शुक्र था कि वो स्कूल के पास में ही रहते थे तो आधे घंटे में स्कूल पहुँच गये.

वहाँ पहुँचकर वो खुद बेटे को हॉस्पिटल ले गये और टाँके लगवाये. उनके पहुँचने तक खून निकलता रहा और स्कूल मैनेजमेंट तमाशा देखता रहा जबकि उनके स्कूल की 5-6 कैब, 10-12 बस और दर्जनों निजी गाडियां बाहर खड़ी थीं. माँ-बाप ने बाद में जाकर झगड़ा भी किया… बात ख़त्म हो गई. आधे सेशन में से ना वो बच्चे का स्कूल बदल सकते थे और ना ही बदला.

ये लगभग हर बड़े स्कूल का हाल है. गाजियाबाद के जी.डी. गोयनका स्कूल में 8 साल के बच्चे की दूसरी मंजिल से गिरकर मौत हुई तो स्कूल प्रशासन ने बोल दिया… ‘वो तो बस गिर गया. दुर्घटना थी.’.. क्या रेलिंग दो फुट की थी जो साढ़े चार फुट का बच्चा गिर गया? फीस मोटी और सुरक्षा के नाम पर लीपापोती… बस यही कहानी है हर स्कूल की.

ये आपकी भी ड्यूटी है कि आप सिर्फ फीस भरने और कम्युनिकेशन डायरी पढ़ने तक सीमित ना रहें, ना ही सिर्फ बच्चे को स्कूल के बाहर छोड़ने या लाने तक सीमित रहें या बस में बैठाने या रिसीव करने तक खुद को सीमित रखें. बच्चे के स्कूल जायें…

एड्मिनिस्ट्रेशन से या प्रिन्सिपल से बोलकर बच्चे की क्लास देखें, वहाँ लगा कैमरा काम करता है या नहीं… ये चेक करे, टॉयलेट कितनी दूर है, वहाँ बाहर कैमरा है या नहीं, स्वीपर टॉयलेट के बाहर रहता है या वाशिंग एरिया में ही खड़ा रहता है, ये भी जरूर चेक करे. अपने बच्चों को चाहे बेटा हो या बेटी ‘बैड टच’ के बारे में जरूर बताये.

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