जेएनयू चुनाव : ‘ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा’ से ‘रंग दे तू मोहे गेरूआ’

जेएनयू को ज्यादा दिन तक ‘ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा’ नहीं गाना पड़ेगा. जिस हिसाब से पिछले दो-तीन साल में बापसा और विद्यार्थी परिषद का परफ़ॉर्मेंस लगातार बढ़ रहा है, लग रहा है ‘रंग दे तू मोहे गेरूआ’ दो से तीन साल में हो जाएगा.

बापसा वालों ने ऐसी सेंध मारी है कि लेफ़्ट का ट्रेडिशनल मुद्दा गायब हो गया है. दलित और अम्बेडकर तो गए ही, साथ ही भाजपा ने भी बड़े आइकॉन्स के अप्रोप्रिएशन में कमी नहीं की. दलितों का मुद्दा सब का हो गया है और वहाँ के लेफ़्ट ने ऐसे वाहियात मुद्दों पर अपनी भद्द पिटवाई है कि लोगों का विश्वास उठ गया है. राष्ट्रगान गाने पर डिबेट की गुंजाइश और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के नारे इनकी ताबूत के अंतिम कील होंगे.

सोशल मीडिया पर मोदी के आने के बाद से दक्षिणपंथियों की सक्रियता और काउंटर नैरेटिव के बनते रहने से लेफ़्ट के झूठ को राइट के झूठ से, प्रोपेगेंडा को प्रोपेगेंडा से लगातार काटा जा रहा है. उधर की एक तस्वीर पर इधर की दस के हिसाब से, नो होल्ड्स बार्ड के तर्ज़ पर सामना हो रहा है.

एक राष्ट्रवाद की लहर अलग ही उठी हुई है, वो कितनी सही है या गलत उस पर चर्चा बाद में. हाँ, उसके नाम पर बकवास बहुत हुए हैं, होते भी रहेंगे. ये नॉर्मल है क्योंकि हर विचारधारा के नाम पर अतिवाद होता रहा है, जानें गई हैं, लोग गायब हुए और किए गए हैं.

लेफ़्ट के सारे मुद्दे सेंटर और राइट ने ले लिए हैं. दलितों की बात, पिछड़ों की बात, सबसे अंतिम खड़े व्यक्ति की बात, स्टेज पर रोने से लेकर हर तरह के उपक्रम हो रहे हैं. कड़ी निंदा चल रही है, आतंकियों के मारने को इतनी बार चलाया जा रहा है, लगातार कवरेज होती है कि लगता है सरकार उस फ़्रंट पर बहुत कुछ कर रही है.

विमुद्रीकरण पर सारी पार्टियाँ रोती रही, और मोदी उसको भी भँजा ले गया. आम आदमी इसी से खुश है कि देश का फ़ायदा हुआ और उसके गाँव के अमीरों को दिक्कत हुई है. ये बात और है कि इनकम टैक्स वालों के पास जो पैंसठ हजार लोगों के पास कई लाख करोड़ रूपए वाले आँकड़े हैं उनका वो क्या करने वाले हैं. बात ये है कि मोदी ने सबको भुना लिया है और विपक्ष को गाय, गोबर, गोमाँस, हिन्दू और मुसलमान का झुनझुना समय-समय पर थमाते रहने में कामयाब रहा है.

सारे पत्रकार यही कहते रहते हैं कि गंभीर मुद्दों पर बात नहीं हो रही, लेकिन करते वही हैं. यही बात है कि लेफ़्ट सिमटकर इतना ही रह गया कि उसको बिहार की तर्ज़ पर महागठबंधन की ज़रूरत पड़ी. उनको समझ में आ गया कि मा, ले, मा-ले सबको एक साथ होकर कम से कम एक जगह तो इज़्ज़त बचानी होगी क्योंकि लोक सभा और राज्यसभा में तो इनके आलाकमान को सीट नसीब नहीं हो रही.

रही बात विचारधारा की, तो मेरा मानना है कि विचारधाराओं के दिन लद गए हैं. सब आदमी विकास और पिछड़ों की ही बात कर रहे हैं. आज के दौर में हर देश राष्ट्रवाद के रेटोरिक पर चल रहा है. भारत भी डोकलम आदि के ज़रिए उसको जब-तब हवा देकर जनता को बिजी रखने में सफल रहा है. लेफ़्ट के पास मुद्दे हैं नहीं, फ़ंड सूख गया है क्योंकि लोगों का विश्वास उठ चुका है. बीस हजार एनजीओ के रजिस्ट्रेशन को निरस्त करने से भी फ़ंड गया है. अब तिलमिलाहट में नक्सली और आतंकी जो कर रहे हैं वो भी दिख रहा है.

विचारधाराओं के अंत का ये दौर है. आम जनता की बढ़ती साक्षरता, कनेक्टिविटी, और एक्सपोज़र के कारण लोग अब अपने और समाज के बारे में सोच रहे हैं. जो दोगली बातें करते हैं, वो जा रहे हैं. भाजपा को लगातार मिलती सफलता यही कहती है कि जहाँ लोगों को आशा दिख रही है वहाँ जाएँगे. नहीं जाएँगे तो वहाँ का कैलकुलेशन ऐसा बिठाया जाएगा, काडर को मोबिलाइज़ किया जाएगा कि आँकड़े वोटिंग परसेंटेज के बढ़ने पर उनकी तरफ आएँ.

तो लेफ़्ट की ये यूनिटी अंतिम सालों की है. जब एक से दो साल बाद इनकी यूनिटी की रीढ़ टूटेगी तो ये छूने भर से ऐसे बिखर जाएँगे कि पिछले दशक के एनएसयूआई और एबीवीपी हो जाएँगे. ये संदर्भ से बाहर हो जाएँगे क्योंकि बाकी लोग जान गए हैं कि लेफ़्ट ने बहुत समय तक उनकी बात करने के नाम पर मलाई खाई है. महागठबंधन बहुत दिन नहीं चलते, ये बात ये देश जानता है, देश का युवा भी. लेफ़्ट यूनिटी अपनी लालिमा के साथ अस्तगामी है. ये बात और है कि एक मज़बूत विपक्ष की कमी इस देश को तीन साल से खल रही है.

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