सिनेमा के बहाने : प्रतिरोध का सिनेमा, विचार, ‘मंथन’ और ‘अर्धसत्य’

स्थिति इस समय ठीक नहीं. राजनैतिक और धार्मिक हालात चिंताजनक हैं. अख़बार से लेकर टीवी चैनल, सड़क से लेकर बाज़ार, घर-मुहल्ले से लेकर कंपनी-फैक्ट्री तक अस्थिरता है. विचारों की अस्थिरता. इस अस्थिरता ने आम आदमी को थोड़ा तो हिलाया है ही. भीतर से कंपाया भी है. अब भी वह भले कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं पर सोचता तो ज़रूर है.

पर्यावरण, पानी, गर्मी और आज से सौ साल बाद दुनिया कैसी होगी की कल्पना और चिंताएँ गौण हो गई हैं. अब तो सवाल हर अगले दिन का आ गया. प्रतिरोध भी अब एक तरह का नहीं रह गया. सियासी हलक़ों ने अब धीरे-धीरे आम जीवन तक पहुंचना शुरू कर दिया है. हालांकि, ऐसे भी नहीं कि यह सब पहले नहीं था. पर अब सब कुछ खुल कर हो रहा. विद्रोह भी और द्वेष भी और विरोध भी. क्या हम मिलकर एक सकारात्मक परिणाम नहीं ला सकते? क्या हम कुछ बदल नहीं सकते? इसका समाधान भी एक क्या हो? पर क्या किसी भी तरह से एक कोई एक रचनात्मक हल पैदा नहीं हो सकता ?

धर्म एक बड़ा मुद्दा बन चुका है पिछले 25 सालों में. हर विचार का एक पक्ष भी है और विपक्ष भी. ऐसे में किसी एक के साथ कैसे जाया जाये? यहीं राजनीति सामने आती है. कुल मिलाकर हर जगह गुत्थम-गुत्था. चूंकि बात विरोध या प्रतिरोध की है तो अनगिनत फ़िल्मों में मुझे इस वक़्त हिन्दी सिनेमा की दो कमाल की फ़िल्मों की याद आ रही है. दोनों ही फ़िल्में दो ध्रुवों की तरह हैं. उनके अपने रास्ते, और मंज़िलें हैं. पर यह मौजूं है कि वह फ़िल्में हम एक बार फिर देखें. समानान्तर सिनेमा की दो अद्भुत फ़िल्में जो असर भी पैदा करती हैं और समाधान तक पहुँचती हैं वो हैं – 1976 की श्याम बेनेगल निर्देशित ‘मंथन’ और 1983 की गोविंद निहलानी निर्देशित ‘अर्धसत्य’. दो बिलकुल ही अलग तरह की फ़िल्में जो अपनी तरह से परिस्थितियों का सामना करती हैं और अपनी तरह से सुलझती हैं. यह भी कम दिलचस्प नहीं कि हिन्दी में ऐसा सिनेमा बना है.

‘अर्धसत्य’ जिसने भी देखी है उसने सचमुच एक कमाल का सिनेमा देखा है. ओम पुरी के रूप में अनंत वेलणकर हिन्दी सिनेमा के सबसे प्रमुख चरित्रों में एक है. कमाल की बात यह है कि लगभग 30 सालों बाद भी अनंत जितना सशक्त चरित्र आज तक सिनेमा में नहीं आया है. मुझे सच कोई याद नहीं आ रहा. शायद संजय दत्त का किया मुन्ना भाई ही इतना ताक़तवर चरित्र अनंत के आसपास ठहरता है. अगर आज से सौ साल बाद हिन्दी सिनेमा में कोई चरित्र याद रहेंगे तो ये दोनों ज़रूर होंगे.

बहरहाल, ‘अर्धसत्य’ वैचारिक रूप से टकराहट, उलझन वाली और रहस्य से भरी फ़िल्म लगती है. क्या किसी समस्या का इस कदर समाधान हो सकता है? अपने आप में यह एक किरदार के ज़रिये बहुत उथल-पुथल और उत्पात मचाती है. ओम पुरी ने अपनी तरह से इस किरदार को जिया और अमर किया है. अभिनेता के क्राफ़्ट पर बहुत सी बात की जा सकती है पर बात पूरे सिनेमा के प्रभाव और उसके विचार की है.

‘अर्धसत्य’ की कहानी यूं तो किरदार की यात्रा से हो जाती है यानि अनंत की पुलिस अफ़सर की उस वैचारिक अस्त-व्यस्त ज़िंदगी से जिसमें उसके बचपन से लेकर व्यवस्था से असंतुष्टि के बीज हैं. पर उसका द्वंद्व दिलीप चित्रे की इस कविता के बाद मुखर होता है जिसकी अंतिम पंक्तियों में इस किरदार की नियति है और इस फ़िल्म का पूरा विचार समाया हुआ है. “सोया हुआ आदमी / जब शुरू करता है चलना नींद में से उठकर / तब वह देख ही नहीं पाएगा दुबारा सपनों का संसार / उस निर्णायक रोशनी में / सब कुछ एक जैसा होगा क्या? / एक पलड़े में नपुंसकता / दूसरे पलड़े में पौरुष / और तराजू के काँटे पर बीचों-बीच अर्धसत्य”.

एकबारगी देखने पर यह एक अमूर्त कविता ही लगती है और इसके अपने इंटरप्रिटेशन पर ‘अर्धसत्य’ की कहानी. इसके एक छोर पर व्यक्ति है जो अपनी कमियों, ग़लतियों और द्वंद्व के बाद समष्टि तक पहुंचता है. अनंत के साथ इस सिनेमा को देखते हुए हम एक ऐसे तंत्र से टकराते हैं जो हमेशा से रहा है और शायद हमेशा ही रहेगा. तमाम लाचारियों, बेबसी और निर्णायक क्षण के ठीक पहले तक जूझना जैसे कोई सज़ा है.

‘अर्धसत्य’ देखने के बाद बहुत बेचैन करती है. एक ऐसे समय में जब गोली और बोली में चोली-दामन का साथ हो गया है, तब तो यह और सालती है. क्या हम कुछ बदल सकते हैं? क्या हमारे बदल देने से सब कुछ सच में बदल जाता है ? ठीक इसके उलट ‘मंथन’ एक सकारात्मक नतीजे की ओर पहुँचती है. गुजरात के खेड़ा गाँव में सत्तर के दशक में हुई श्वेत क्रान्ति पर आधारित यह फ़िल्म अपनी तरह की ही है. पूरी तरह से क्राउडफंडेड जिसमें इस कहानी से जुड़े हुए दूध यूनियन के लगभग पाँच लाख लोगों ने दो-दो रुपये देकर इकट्ठी की गई लागत से फ़िल्म बनाई.

‘अमूल’ के रूप में बनी सबसे अनोखी दूध प्रदाय और उत्पादन की व्यवस्था की यह कहानी एक मिसाल ही है. इस कहानी में वो सबकुछ है जो एक गाँव में आज भी हो सकता है. जाति आधारित भेद, राजनीति, प्रेम, धोखा, शोषण, न्याय-अन्याय के बीच की बहस, विरोध और एक बड़ा स्वप्न. पर इन सबके बीच भी मंज़िल तक पहुँचते-पहुँचते, व्यवस्था से टकराते हुए हम दूध यूनियन के सपने तक पहुँच जाते हैं. यानि एक ऐसा नेटवर्क जहां दूध के उत्पादन से लेकर उसके दाम, क्रय-विक्रय और प्रचार-प्रसार तक पर उसके उत्पादकों यानि किसानों का हक़.

यही थी श्वेत क्रान्ति जिसने आने वाले बीस सालों में भारत को विश्व में दूध उत्पादन में दुनिया के सभी देशों से आगे लाकर खड़ा कर दिया. वर्गीस कुरियन ने इस फ़िल्म की कहानी श्याम बेनेगल के साथ मिलकर लिखी थी. यही नहीं, फ़िल्म बन जाने के बाद हजारों किसानों ने दूर-दराज के इलाकों से ट्रक भर-भर जाने की संख्या में सिनेमाघर तक पहुँच के इस फ़िल्म को सफ़ल भी बनाया.

यह सब इतिहास है पर हमारे सामने दो स्पष्ट रास्ते भी हैं. ‘मंथन’ सच में समुद्र मंथन की तर्ज पर मथा हुआ ही कुछ था, जिसने शायद सब कुछ बदल डालने का असंभव सपना देखा था. निस्संदेह ‘मंथन’ एक श्रेष्ठ फ़िल्म का उदाहरण है जिसने सकारात्मक चुनाव और सपने देखने का हौसला दिया.

गांधी के इस देश ने हिंसा में जब भी भरोसा किया, ख़ुद के प्रति शंका भाव ही आया. सवाल यह भी कि सिनेमा क्या इस बहस में शामिल हो कर कोई रास्ता सुझा सकता है? चाहे ‘अर्धसत्य’ हो या ‘मंथन’ दो बिलकुल विपरीत तरह के रास्तों की सशक्त प्रतिक्रिया ने सोचने को मजबूर तो किया ही है. तो क्या हुआ कि इन्हें बने तीस साल से भी ज़्यादा हुए. एक छटपटाहट, द्वंद्व, संशय और सपने के बीच मुश्किलें तमाम तरह की हैं. क्यों दुनिया वैसी नहीं जैसी हम सब चाहते हैं? हिंसा का समर्थन तो कोई भी नहीं करना चाहता. किसी भी स्थिति में नहीं क्योंकि अंततः हम सब जीना चाहते हैं. और इस ख़ूबसूरत दुनिया की ख़ूबसूरती को महसूस करना चाहते हैं.

पक्ष का विपक्ष होगा ही, विरोध भी और प्रतिरोध भी. सवाल सिर्फ़ एक संवेदना का है. और उस रास्ते का जिस पर चल कर हम वहाँ पहुँचते हैं जो आगे चलकर इतिहास बनाता है.

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