गोरक्षपीठाधीश्वर परमपूज्य महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि

गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ जी का जन्म 18 मई,1919 को देवभूमि पौढ़ी गढ़वाल के काण्डी नाम गांव में हुआ. आपका सांसारिक नाम कृपाल सिंह विष्ट था. आपके पिता श्री रायसिंह विष्ट तीन भाई थे. महन्त जी अपने माता-पिता की इकलौती सन्तान है. बाल्य अवस्था में आपके माता-पिता जी की अकाल मृत्यु हो गयी. परिवार के संरक्षण में आपकी दादीमाँ ने आपका लालन पालन किया.

उच्चतर माध्यमिक की शिक्षा पूर्ण होते ही आपकी दादीमाँ का भी स्वर्गवास हो गया. बाल्य मन पर लगे आघात-प्रतिघात ने आपको संसार के प्रति उदासीन बना दिया. आपके मन में वैराग्य भाव ने गहरी पैठ बना ली. परिणामस्वरूप आप गृह त्याग करके ऋषिकेश चले आये. जहां किशोरवय कृपाल सिंह विष्ट जी का सम्पर्क अनेक साधु-महात्माओं से हुआ. वैराग्य से जाग्रत चेतना के कारण आपका रूझान भारतीय धर्म-दर्शन एवम् मानव जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने में रम गया. इससे उत्पन्न जिज्ञासा को शान्त करने के लिए किशोर कृपाल सिंह विष्ट ने देवभूमि उत्तराखण्ड के बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री तथा काशी सहित अनेक स्थानों का भ्रमण किया.

इस दौरान आपको अनेक उच्च कोटि के साधु-सन्तो का सानिध्य मिला. किशोरावस्था में ही आपने कैलाश मानसरोवर की यात्रा की. वह यात्रा उनके सन्यासी जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुई. उस समय कैलाश मानसरोवर का मार्ग अत्यन्त ही दुर्गम था. पैदल यात्रा में लगभग बीस दिन लगते थे. तीन अन्य सन्यासियों के साथ आप मानसरोवर की यात्रा पर चल पड़े. कैलाश मानसरोवर की यात्रा से वापस आते समय अल्मोड़ा से कुछ आगे आपको ‘हैजा’ हो गया. अत्यधिक उल्टी-दस्त के कारण आप अचेत हो गये. साथी सन्यासियों ने आपको मृत मानकर उसी दशा में छोड़कर आगे चले गये. दैवी कृपा से आपके शरीर में चेतना का संचार हुआ परन्तु अपने आपको अकेला पाकर इस नश्वर संसार का मर्म समझ में आया और मन विरक्ति और वेदना से भर गया.

कैलाश-मानसरोवर की यात्रा से आपको एक अलग तरह की आध्यात्मिक अनुभूति हुई. आप अकेले धीरे-धीरे चलते हुए हरिद्वार पहुंचे. जहां आपकी भेंट नाथ पंथ के महात्मा योगी निवृत्तिनाथ जी से हुई. योगी निवृत्तिनाथ जी के योग, आध्यात्मिक दर्शन तथा नाथपंथ के विचारों से प्रभावित होकर, आपका झुकाव नाथ पंथ के सामाजिक समन्वयवादी दृष्टिकोण एवं हठयोग-साधना की ओर बढ़ा. वर्ष 1940 में योगी निवृत्तिनाथ जी के साथ आपको मेमन सिंह बंगाल जाते समय श्रीगोरक्षनाथ मन्दिर में एक रात विश्राम का अवसर प्राप्त हुआ. तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज से आपकी पहली भेंट हुई. आप दूसरे दिन बंगाल जाने हेतु तैयार हुए तो महन्त जी ने आपको अपना शिष्य एवं उत्तराधिकारी बनाने की इच्छा व्यक्त की. आप बड़ी विनम्रतापूर्वक अपनी अनिच्छा प्रकटकर निवृत्तिनाथ जी के साथ मेमन सिंह के लिए निकल पड़ा. वहां पर आपकी भेंट विद्वान एवं दार्शनिक श्री अक्षय कुमार बनर्जी जी से हुई. जिनके सानिध्य में आपको भारतीय-दर्शन और नाथपंथ के बारे में विस्तार से ज्ञान प्राप्त हुआ.

ऋषिकेश लौटकर आपने योगी शान्तिनाथ द्वारा लिखित ‘प्राच्यदर्शन समीक्षा’ का अध्ययन किया जिससे आपके मन में शान्तिनाथ जी से मिलने की उत्सुकता बढ़ती गयी. योगी निवृत्तिनाथ जी से ज्ञात हुआ कि शान्तिनाथ जी भी योगी गम्भीरनाथ जी के ही शिष्य हैं और वे कराची से करीब 10 मील दूर एक आश्रम बनाकर रहते है. वे दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान और नाथपंथ के ज्ञाता होने के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानी भी है.

युवा कृपाल सिंह विष्ठ योगी शान्तिनाथ जी के यहाँ पहुंचे और उनके आश्रम में रहने लगे. उसी दौरान आपको गम्भीरनाथ जी महाराज एवं दिग्विजयनाथ जी महाराज के बारे में विस्तृत ज्ञान मिला. नाथपंथ के सामाजिक क्रान्ति के विविध पक्षों ने आपको बहुत प्रभावित किया. योग के प्रति गूढ़ जानकारी आपको गुरु श्री गोरक्षनाथ द्वारा प्रतिपादित ‘योग दर्शन’ और ‘गोरखवाणी’ के अध्ययन से मिली. योगी शान्तिनाथ जी ने आपको गोरक्षपीठ के तत्कालीन पीठाधीश्वर महन्त दिग्विजयनाथ जी के पास गोरखपुर जाने का निर्देश दिया.

आप निवृत्तिनाथ जी के साथ गोरखपुर आये और महन्त दिग्विजयनाथ जी के साथ रहने लगे. 8 फरवरी सन् 1942 को तत्कालीन गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त दिग्विजयनाथ जी ने आपको विधिवत दीक्षा देकर अपना शिष्य एवं उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया. 23 वर्ष की अवस्था में युवा कृपाल सिंह विष्ट योगी अवेद्यनाथ बन गये. महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज हिन्दू महासभा के माध्यम से स्वतंत्रता में सक्रिय आजाद हिन्द फौज की सहायता कर रहे थे. परिणामतः अवेद्यनाथ जी को श्रीगोरक्षनाथ मन्दिर की व्यवस्था की पूर्ण जिम्मेवारी आरम्भ से ही उठानी पड़ी.

स्वतंत्रता के पश्चात् महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई. महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता से घबड़ाई सरकार ने महन्त जी को उनकी हत्या के तथाकथित षड्यंत्र में गिरफ्तार कर उन्नीस महीने जेल में बन्द कर दिया तथा श्रीगोरक्षनाथ मन्दिर की समस्त चल-अचल सम्पत्ति जब्त कर ली. उसी दौरान अवेद्यनाथ जी महाराज ने नेपाल में रहकर गोपनीय ढंग से श्रीगोरक्षनाथ मन्दिर की व्यवस्था एवं महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज को निर्दोष सिद्ध करने हेतु सफल प्रयास किया. स्वातन्त्रयोत्तर भारत में महन्त दिग्विजयनाथ जी ने हिन्दू समाज की एकता तथा सामाजिक-शैक्षिक पुनर्जागरण के साथ-साथ राजनीतिक मंच पर हिन्दू समाज के पुनर्जागरण का अभियान आरम्भ किया. उनके उत्तराधिकारी महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज उनके सक्रिय सहयोगी एवं अनुगामी बनें.

‘धर्म की रक्षा के लिए राजनीति’ महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज को अपने गुरुदेव से विरासत में प्राप्त हुई. 1962 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मानीराम विधानसभा से विजयी होकर महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज पहली बार विधानसभा के सदस्य बनें और लगातार 1967, 1969, 1974 और 1977 के विधानसभा चुनाव में मानीराम विधानसभा से विजयी होते रहे. लोकसभा चुनाव में महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर वर्ष 1970 के उपचुनाव में महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज को गोरखपुर की जनता ने ससम्मान संसद में भेज दिया. तत्पश्चात् लोकसभा के 1989, 1991 के मध्यावधि चुनाव तथा 1996 के लोकसभा चुनाव में महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज विजयी होते रहे. लोकसभा में महन्त जी 1971, 1990 एवं 1991 में भारत सरकार के गृहमंत्रालय की परामर्शदात्री समिति के सदस्य रहें. 1986 की नयी शिक्षा नीति में जब ‘त्रिभाषा’ के अन्तर्गत समाहित संस्कृत विषय को बाहर किया गया तो महन्त अवेद्यनाथ जी ने विरोध किया.

1980-81 में मीनाक्षीपुरम् (तमिलनाडु) और उसके आस-पास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कराये गये धर्म परिवर्तन ने महन्त जी को अन्दर से व्यथित कर दिया और आप राजनीति से सन्यास लेकर हिन्दू समाज की एकता और सामाजिक समरसता के यज्ञाभियान पर निकल पड़े. आपने धर्मान्तरण को राष्ट्रान्तरण की संज्ञा दी और गाँव गाँव जाकर छुआछूत के विरुद्ध अभियान छेड़ दिया. आपने हिन्दू समाज की विकृति के कारण घोषित तथाकथित अछूतो के साथ बैठकर सहभोज के कार्यक्रम के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का अध्याय प्रारम्भ किया.

महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज के नेतृत्व में श्रीरामजन्मभूमि पर बनने वाले भव्यतम मन्दिर के शिलान्यास की पहली ईंट एक दलित ने रखी. आपने जातिवादी राजनीति को धता बताकर पटना स्थित महावीर मन्दिर में सूर्यवंशी लाल उर्फ फलाहारी बाबा नामक हरिजन को पुजारी नियुक्त किया. 26 अप्रैल 1992 को गोरखपुर महानगर के मानसरोवर मन्दिर स्थित रामलीला मैदान में बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर की मूर्ति का अनावरण किया. पुरी के जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द जी सरस्वती ने कलकत्ता विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित समारोह में एक विदुषी महिला को वेदपाठ करने से रोक दिया. महन्त जी ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए महिला द्वारा वेदपाठ का कार्य सम्पन्न कराया. आपका मत है कि अनेक वैदिक ऋचाओं की रचना विदुषी महिलाओं ने ही की है और भारतीय धर्मशास्त्र में नारी सर्व-शक्ति-सम्पन्न मानी गयी तथा विद्या, शील, ममता, यश और सम्पत्ति की प्रतीक समझी गई है.

श्री रामजन्म भूमि को मुक्त कराने के लिए महन्त अवेद्यनाथ जी ने सर्वप्रथम मत-श्रेष्ठतावाद का खण्डन किया और भारत के लगभग सभी पन्थों शैव-वैष्णव इत्यादि के धर्माचार्यों को एक मंच पर खड़ा किया और श्रीरामजन्म भूमि मुक्ति यज्ञ-समिति का गठन हुआ. 21 जुलाई 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में सर्वसम्मति से महन्त जी को इस समिति का अध्यक्ष चुना गया. श्रीरामजन्म भूमि की मुक्ति और उस स्थान पर भव्य मन्दिर निर्माण के लिए महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज के नेतृत्व में अत्यन्त योजनापूर्वक जनान्दोलन की रूपरेखा बनीं. 7 अक्टूबर 1984 को भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या में सरयू के तट पर श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त कराने के पवित्र संकल्प के साथ प्रारम्भ ‘धर्मयात्रा’ 14 अक्टूबर को लखनऊ पहुंची जहाँ बेगम हजरत महल पार्क में ऐतिहासिक सम्मेलन सम्पन्न हुआ, जिसमें लगभग दस लाख की संख्या में हिन्दू जनता ने हिस्सा लिया.

22 सितम्बर 1989 को महन्त जी की अध्यक्षता में दिल्ली में वोट-क्लब पर विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन हुआ. इस सम्मेलन में आपने 9 नवम्बर 1989 को श्रीरामजन्म भूमि पर शिलान्यास कार्यक्रम घोषित किया. देशभर में शिलान्यास समारोह हेतु श्रीरामशिला पूजन अभियान प्रारम्भ हो गया. निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रस्तावित श्रीरामजन्म भूमि मन्दिर का शिलान्यास समारोह प्रारम्भ हुआ. शुभ घड़ी के अनुसार 10 नवम्बर को एक बजकर पैतीस मिनट पर वर्तमान गर्भगृह से 192 फीट दूर पूर्व निधारित स्थान पर हवन और भूमि पूजन के पश्चात् महन्त जी ने सांकेतिक रूप से नींव खोदने के पश्चात शिलान्यास हेतु पहली शिला हिन्दू समाज में तथाकथित अछूत दक्षिणी बिहार के श्री कामेश्वर प्रसाद चैपाल (हरिजन) से रखवाकर एक और नये भविष्य की शुरुआत कर दी. इसके पश्चात् सरकार के उपेक्षात्मक रवैये से दुःखी महन्त जी ने घोषणा कर दी कि अब अयोध्या में श्रीरामशिलाएं ही नहीं श्रीराम भक्त भी आयेंगे. इस घोषणा के पश्चात् हरिद्वार के सन्त सम्मेलन में श्रीरामजन्म भूमि पर मन्दिर निर्माण की तिथि 30 अक्टूबर 1990 घोषित कर दी गई.

इस सन्दर्भ में आपने 5 अक्टूबर 1990 के दिन महाराणा प्रताप इन्टर कालेज के मैदान में श्रीरामभक्तों की ऐतिहासिक रैली आयोजित की. महन्त जी 30 अक्टूबर को अयोध्या में प्रस्तावित कार्य सेवा में भाग लेने के लिए 26 अक्टूबर को दिल्ली से अयोध्या के लिए प्रस्थान किये. गुप्तचर संस्थाओं की सूचना पर सरकार ने महन्त जी को पनकी, कानपुर में ट्रेन रूकवाकर गिरफ्तार कर लिया गया.

7 दिसम्बर,1990 को महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज ने जगद्गुरु रामानुजाचार्य सहित लगभग एक हजार कारसेवकों के साथ अयोध्या कारसेवा हेतु जाते हुए अपनी गिरफ्तारी दी. अयोध्या में श्रीरामजन्म भूमि पर भव्य मन्दिर निर्माण के लिए जनजागरण अभियान चलाते हुए महन्त जी ने दर्जनों सभाएं की. 27 फरवरी 1991 को गोरखपुर में महाराणा प्रताप इन्टर कालेज के मैदान में एक बार फिर महन्त जी के आह्वान पर हिन्दू समाज जुटा. सभा में महन्त जी ने आह्वान किया कि 11 से 15 मार्च तक देश के सभी प्रान्तों में जिला मुख्यालयों पर हिन्दू जनता प्रदर्शन करे और वर्ष प्रतिपदा (17मार्च) को सभी हिन्दू अपने-अपने घरों पर भगवा ध्वज फहराएं. 30 अक्टूबर 1991 के दिन अयोध्या में शौर्य दिवस का आयोजन हुआ. इस समारोह की अध्यक्षता महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज ने किया. 23 जुलाई 1992 को श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण हेतु महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमण्डल प्रधानमंत्री श्री पी.वी.नरसिंहराव से मिला.

30 अक्टूबर 1992 को दिल्ली में महारानी झांसी स्टेडियम में पाचवें धर्म संसद का आयेाजन हुआ. धर्म संसद में 6 दिसम्बर 1992 से श्रीराम मन्दिर निर्माण हेतु कारसेवा प्रारम्भ करने का निर्णय लिया गया. संत महात्माओं के आह्वान पर 6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में एकत्रित कारसेवकों ने महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज सहित देश के प्रतिष्ठित सभी पंथों के प्रमुख धर्माचार्यों, सन्त-महात्माओं तथा भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं की उपस्थिति में निर्णायक कारसेवा प्रारम्भ की और देखते-देखते विदेशी आक्रमणकारी द्वारा मन्दिर तोड़कर बनाया गया विवादित ढांचा मलवे में तब्दील हो गया तथा मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मभूमि अपमानजनक ढांचे के कलंक मुक्त हो गयी तथा वहाॅ श्रीरामभक्तों ने श्रीरामलला का एक छोटा सा मन्दिर बना दिया और श्रीरामलला की प्रतिष्ठा कर पूजन-अर्चन प्रारम्भ कर दिया.

महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज के नेतृत्व में स्वाधीनता आन्दोलन के समय से श्रीगोरक्षपीठ ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का दीप जलाया. वर्ष 1932 में महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की स्थापना की गई थी जिसको आपने वृहत्तर स्वरूप प्रदान किया. महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् के अन्तर्गत 1949-50 में महाराणा प्रताप महाविद्यालय स्थापित किया गया था. गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु वर्ष 1958 में महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने इसी विद्यालय को समर्पित कर गोरखपुर विश्वविद्यालय की नींव रखी. अवेद्यनाथ जी महाराज ने पुनः वर्ष 2005 में जंगल धूसड़, गोरखपुर में महाराणा प्रताप महाविद्यालय तथा वर्ष 2006 में गोरखपुर महानगर के रामदत्तपुर में महाराणा प्रताप महिला महाविद्यालय की स्थापना की. शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी गुरु श्री गोरक्षनाथ चिकित्सालय, गुरू श्री गोरक्षनाथ योग संस्थान तथा महन्त दिग्विजयनाथ आयुर्वेदिक चिकित्सालय की स्थापना एवं उनका उत्तरोत्तर विकास महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की जन-सेवा के क्षेत्र की उल्लेखनीय उपलब्धि है, जिनके माध्यम से उनकी यशगाथा पुष्प के सुगन्ध की तरह प्रसारित है.

सम्पूर्ण विश्व के नाथ पंथ के साधुओं को एकत्रित करके हिन्दू हित में कार्य करने के लिए ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज ने अखिल भारत वर्षीय अवधूत भेष बारह पंथ-योगी महासभा का गठन किया और बड़ी सफलतापूर्वक भारत सहित पूरे विश्व में नाथ पंथ के योगियों को एकत्रित किया और जीवन पर्यन्त अखिल भारत वर्षीय अवधूत भेष बारह पंथ-योगी महासभा के अध्यक्ष रहें. उनके ब्रह्मलीन होने के पश्चात् वर्ष 1969 से अबतक गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज इसके अध्यक्ष है. काफी लम्बे समय तक आप अखिल भारत हिन्दु महासभा से जुड़े रहे. राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने अखिल भारत हिन्दू महासभा का नेतृत्व किया. अनेक बार आप हिन्दु महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री रहें.

देवपुरुष व क्रांतिकारी संत परमपूज्य गोरक्षपीठाधीश्वर परमपूज्य महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन व श्रद्धांजलि.

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