तुम लिखती ही क्यूँ हो?

तुम्हें ख़्वाब लिखने की मनाही नहीं है
मगर ये क्या
पंखों वाले ख़्वाब क्यों लिखती हो
रेंगने के ख़्वाब लिखो…

 

तुम्हें नहीं कहना कभी
उम्र के उबाल को
उजलतों को उल्फ़तों को
ख़ामुशी इख़्तियार करनी है
विशाल के सवाल पर

 

पीठ में उमड़ती रेखाओं को
नहीं लिखना
तुम्हे क्या ज़रूरत है
नंगे लफ्ज़ो की…

 

लिखना ही है तो
लिखो रोटी की गोलाई को
बर्तन लिखो आईना लिख लो
अँधेरी रात में जलते फ़ानूस को
और सुब्ह के गुलदानों में
रजनीगंधा के चमेली के फूल लिख लो

 

या घूम आओ तुम कहीं
पति या प्रेमी के साथ वादियों में
पहाड़ नदियाँ झरनों को लिखो
बर्फ़ की सफ़ेद चादरों को
सुहागरात की चादर लिखो
जो तुम्हारे चरित्र का परिचय दे सके

 

लिखना है तो अकादमियों के लिए लिखो
पार्टियों के लिए लिखो
पुरस्कारों की फेरिस्त में आओ
पार्टी धरनों में जाया करो
भाषणों में नाम दो
अच्छी सोसायटी में रहा करो

 

नौकरी क्यूँ करती हो
क्यूँ लिखती हो चिल्लाती ख़बरें
तक़लीफ़ क्यों है जलती औरतों की
सड़ती नालियों से क्या लेना
गुज़रना ज़रूरी तो नहीं टूटी सड़क से
झुग्गियों में झोपड़ियों में
ऐसे ही बच्चे मिलते हैं

 

नामंजूर अर्जियां तुम्हारी तो नहीं
अज़ादियाँ गुलामियाँ
नुमाइश के बाज़ार
बिस्तर के आज़ार
ये रंग बिरंगे झंडों के धब्बे
बेकार के हथियार क्यों उठाती हो

 

क्यूँ मिलती हो वेश्याओं से हिजड़ों से
शर्म क्या हुई तुम्हारी
अच्छे घर की दिखती हो
दलित तो नहीं लगती
नाम से भी माइनॉरिटी से नहीं हो
लिखती ही क्यूँ हो

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