यह सोच आपके पीछे-पीछे चल रहे हैं, कि कभी आपके पास वो लाठी हुआ करती थी

आप रात के 11 बजे कहीं से लौट रहे हैं. बस स्टैंड पर उतर कर पैदल ही घर की ओर जा रहे हैं. रास्ते में 8-10 कुत्ते आपको देख कर भूँकना शुरू कर देते हैं. आप उन्हें इग्नोर कर के आगे बढ़ते हैं तो वे और आक्रामक होकर आपकी ओर बढ़ते हैं. आप एक पत्थर उठा लेते हो और सारे कुत्ते पीछे हट जाते हैं. आप वह पत्थर हाथ में लिए उनकी ओर ताने आत्मविश्वास के साथ बढ़ते रहिये, कुत्ते पीछे खिसके रहेंगे और फिर वापस लौट आएँगे.

आपको शायद वह पत्थर सचमुच चलाना ना पड़े, सिर्फ हाथ में उठाया पत्थर और तानने की मुद्रा ही वह deterrent है जो आपको चाहिए. वरना जरा सोच कर देखिए, अगर सचमुच वो कुत्ते आपको काट खाने को तैयार हों तो आपका उठाया हुआ वह पत्थर किस काम आएगा? पर काम आता है आत्मविश्वास…

अब अगर आप गाँधी बाबा के चेले हैं, और पत्थर उठाने या चलाने में विश्वास नहीं करते… आपका मानना है कि सिर्फ पुचकारने या रोटी दिखाने से इन्हें पालतू बनाया जा सकता है तो आप बेशक इस शहर में नए नए आये हैं… इस शहर के कुत्तों को आप नहीं जानते. और कुत्तों के नाम पर आपका अनुभव आपकी आंटी की पामेरियन कुतिया तक सीमित है जो आपको बहुत क्यूट लगती है…

मोदीजी जब 2014 में चुनकर आये थे तो सारे देशद्रोही कुत्ते डरे हुए थे. पर आवारा हैं तो भूँकेंगे… पर मोदीजी ने पत्थर गिरा दिया है… खड़े होकर पुचकार रहे हैं… टॉमी, सिट डाउन, सिट डाउन… कुत्ते नहीं समझ रहे टॉमी सिट डाउन… वे भूँकते हुए चले आ रहे हैं, दाँत निकाले, गुर्राते, पकड़ कर आपकी पतलून खींच रहे हैं… और आप खोज रहे हैं, वो पत्थर कहाँ गया… डर रहे हैं अब झुक कर पत्थर कैसे उठाऊँ…

अब ये कुत्ते पूरे देश को काटेंगे… नोच खाएँगे… दोष किसका होगा… आपका, या उनका जिन्होंने इन पागल कुत्तों को सड़कों पर रोटियाँ फेंकी है सत्तर सालों में…

दोष की छोड़िए… नुकसान किसका होगा? खून किसका बहेगा? माँस किसका नुचेगा? और हम जो आपके भरोसे आपके पीछे पीछे सड़क पार कर रहे हैं, यह सोचकर कि कभी आपके पास वो लंबी वाली लाठी हुआ करती थी…

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