मुआवज़ा पुलिसकर्मी का हक़, दंगाई को मिले ही क्यों : दो बोधकथाएँ – एक लिखित, एक वीडियो

दो किस्से बता रहा हूँ. दोनों सच हैं. एक मेरे चचेरे भाई का है, दूसरा हम सरेआम जहां तहां होते देखते रहते हैं. फिर भी मिसाल के तौर पर एक लिंक देता हूँ. पहले बात करते हैं हमारे भैया की. हॉस्टल में रहते थे. आज वे 67 साल के हैं तो समय का अंदाज लगा लीजिये, तब सब जगह रैगिंग जमकर होती थी. इनका कॉलेज कुछ ज्यादा कुख्यात था. इनके ममेरे भाई वहाँ पढ़कर गए थे, तो इनको वहाँ के किस्से पता थे.

इसलिए इन्होने सभी फ्रेशरों को इकट्ठा कर के प्लान बनाया. तब कोई मोबाइल तो नहीं होते थे इसलिए स्टील की प्लेट-चम्मच से बजाकर सब को सावधान करने की योजना बनी. वैसे भैया काफी खुराफाती दिमाग के धनी थे तो कुछ और भी आइडिया रखे, जो सब को स्वीकार हुई, आगे पढ़िये, समझ जाएँगे.

रात होने से पहले ही सभी लड़के शहर जाकर स्पोर्ट्स शॉप खोजकर हॉकी ले आए. भैया जी तो एड्मिशन फॉर्म में ही अपना हॉकी में इंटरेस्ट जाहिर कर चुके थे और सामान में ही साथ ले गए थे. वैसे कोई ढंग के प्लेयर तो थे नहीं लेकिन खेल के नियम जानते थे और दौड़ने का दमखम था. याने कोई खेल को लेकर सवाल पूछे तो जवाब दे सकते थे.

रात को जिसके दरवाजे पर दस्तक हुई उसने पहले थाली बजाई. फटाफट सब फ्रेशर अपने अपने दरवाजे खोलकर कंधे पर हॉकी उठाए चले आए. सीनियर्स झेंप गए, इन्होंने बाकायदा सब का अभिवादन किया, स्वागत किया और गपशप कर के विदा किया. कोई मार पीट नहीं हुई, सब शांति से निपटा.

सीनियर्स की खुजली मिटी नहीं थी. दूसरे दिन सब के दरवाजे बाहर से बंद किए और एक के दरवाजे पर दस्तक दी. यह भी अपेक्षित था और इसका भी इलाज सोचा हुआ था. उन दो लड़कों ने बेड, स्टडी टेबल सरका कर दरवाजे से भिड़ा दिये और खिड़की खोलकर न्यूजपेपर जला दिये. आग-आग चिल्लाना शुरू किया. उनके साइड वाले और भी लड़कों ने यही किया, सभी आग-आग चिल्लाने लगे और खिड़कियों में खड़े रहकर थालियाँ हॉकी से पीटने लगे. झख मारकर वार्डन को आना पड़ा, सीनियर्स को जाना पड़ा.

इसके बाद की रात, फ्रेशर तीस लड़कों में से छह लड़के हॉकी लेकर फ्लोर के कॉरिडॉर में पहरा देने लगे. दो दो घंटे की शिफ्ट. किसी सीनियर की हिम्मत नहीं हुई. ऐसा हफ्ता भर चला. सीनियर्स की खीज बढ़ती जा रही थी. साला हमने तो हमारे सीनियरों से मार खाई थी, ये जूनियर हमसे मार काहे नहीं खा रहे.

नाक का सवाल बना लिया और एक दिन भैया को दस-बारह सीनियरों ने घेर कर पहले उद्दंडता की, फिर गाली गलौज और उसके बाद बहुत थप्पड़-घूंसे मारे. भैया वैसे 6 फीट 3 इंच और काठी के भी मजबूत तो जितना लौटा सके उतना लौटाया लेकिन इतनों के सामने अकेला कहाँ तक टिकता.

लंगड़ाते हुए रूम पर आए पर वार्डन से कम्प्लेंट नहीं की. लेकिन नाइट वॉच बरकरार रखा. तीन दिन में ठीक हुए तो सब से दबंग सीनियर को और उसके साथ घूमते दो चेलों को अचानक घेरकर भरपूर कंबल कुटाई कर दी. वे लंगड़ाते भी न जा सके, उनका कराहना सुनकर औरों को उन्हें उठाना पड़ा.

दूसरे दिन भैया पूरी टोली के साथ फूलों का गुच्छा और ‘गेट वेल सून’ के कार्ड लेकर उनके रूम पर जा धमके. शांति से बात की. इससे किसी का भी भला नहीं होनेवाला. हम सभी अच्छे घरों से आए हुए मेहनतकश छात्र हैं, अच्छे और ऊंचे नंबरों से पास हुए है तभी नेशनल श्रेणी के इस संस्थान में दाखिला ले पाये हैं. ऐसे मामलों से कोई अपना भविष्य नहीं खराब करें, यह बात यहीं रुके, क्या खयाल है? इस पर बियर से चीयर्स कर लें?

और झोले में हाथ डाल कर बॉटल से बॉटल खनकाई. सुलह हो गयी और बाद में कोई लफड़ा नहीं हुआ.

दूसरा किस्सा हम रोज कहीं न कहीं होते देखते हैं. मिसाल के तौर पर एक वीडियो लिंक दे रहा हूँ. विशुद्ध सीनाज़ोरी वाला किस्सा है. थोड़े या बहुत फर्क से यह किस्सा हर जगह होता है. हर नया किस्सा इस फर्क को और बढ़ाता है.

लेकिन हमारे नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ता, पुलिस के आला अफसरों को भी फर्क नहीं पड़ता. वे सुरक्षित हैं, बच्चों का करियर और उसके बाद की लाइफ विदेश में ही करने का इंतजाम कर चुके हैं आम तौर पर.

फर्क पड़ता है आम पुलिस कर्मी को. दंगाई उसे जान से मारे तो उस हुतात्मा पुलिस कर्मी को मिलने वाला मुआवजा, पुलिस के हाथों मारे गए दंगाई को मिलने वाले मुआवजे से बहुत कम होता है. और मूल बात तो यह है कि पुलिसकर्मी का मुआवजे पर हक़ है, दंगाई तो गुनहगार है; उसे मुआवजा मिले ही क्यों?

हमें सामान्य पुलिसकर्मियों का साथ देना चाहिए. अगर बीस पुलिस वाले पांच सौ की भीड़ का सामना कर रहे हों तो घर से निकल आयें. आप दो हजार लोग उन बीस पुलिस के साथ होंगे तो भीड़ को दुम दबानी पड़ेगी. रक्तपात भी नहीं होगा और भविष्य में आप के घर भी सुरक्षित रहेंगे.

और सब से बड़ी बात, नेता वहीं जाता है जहां बड़ी भीड़ होती है. जिसके पीछे भीड़ नहीं वो नेता नहीं होता. आप की आवाज़ सुनी जाएगी.

नेता के साथ न देने से आप का भविष्य धूसर होने का रोना मत रोईये, वही होगा. आप का साथ न मिलने से नेता का भविष्य धूसर होना चाहिए. यही वास्तव है और यही होना चाहिए. अपनी शक्ति को जानिए, लेकिन इसके लिए एक होना होगा, एक-दूसरे से मिलना होगा. संवाद बढ़ाना होगा.

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