अभिव्यक्ति डॉ अव्यक्त की : मेरे सेलिब्रिटी ये हैं, निश्छल, मासूम…

पहला केस

2004 एम्स आकस्मिक चिकित्सा कक्ष में मैं सीनियर रेजिडेंट के पद पर था. गंभीर हालत में एक के बाद एक दो बच्चे लाये गए. दोनों को वेंटिलेटर पर रखना था. मैं और मेरा जूनियर MD स्टूडेंट बच्चों को मैनेज करने लगे.

लेकिन तभी एम्स कैसुअल्टी के सीनियर कंसलटेंट जो कि शिशुरोग विशेषज्ञ नहीं थे अन्य सीनियर चिकित्सकों के साथ तेज़ी से मुझ तक आये और कहा “ज़ल्दी चलो ज़ल्दी चलो. हेल्थ मिनिस्टर आयी हैं.”

उस समय सुषमा स्वराज जी केंद्रीय कैबिनेट स्वास्थ्य मंत्री थीं जो कि स्वाभाविक तौर पर स्वतः ही एम्स का भी सर्वोच्च सर्वेसर्वा पद होता है.

ज़ाहिर है उन्होंने किसी को भी पहले से नहीं कहा था शायद अन्यथा स्वयं एम्स निदेशक लेजेंडरी हृदय रोग सर्जन और भारत का प्रथम हार्ट ट्रांसप्लांट करने वाले डॉ वेणुगोपालन सर भी वहां होते.

दरअसल सुषमा जी के किसी करीबी रिश्तेदार के बच्चे को एम्स कैसुअल्टी में बने वीआईपी कक्ष में भर्ती किया गया था. स्वयं डॉ वीना कालरा मैडम जो कि देश की जानी मानी बच्चों की न्यूरोलॉजिस्ट और मेरी टीचर एवं विभागाध्यक्ष भी थीं ने मुझे फोन कर कहा था अव्यक्त उस बच्चे को देख लेना और कोई दिक्कत होने पर बताना.

मैंने उसे एडमिट कर इलाज शुरू तो कर दिया था किंतु साथ ही वह बच्चा स्थिर हालत में था. चिंता जनक बात नहीं थी. मैंने परिजनों से कहा था रिपोर्ट्स आने के बाद मैं दोबारा आपसे बात करूँगा.

लेकिन अचानक कैबिनेट हैल्थ मिनिस्टर उस बच्चे के पास आने से प्रशानिक ज़िम्मेदारियाँ देखने वाले चिकित्सकों में हड़कंप था.

मैंने अपने सीनियर्स से कहा सर दोनों बच्चों को मुझे वेंटिलेटर पर रखना होगा. 20 मिनट या ज़्यादा लग सकते हैं.

“अरे तुम चलो, पहले मैडम से बात कर लो तब तक ये संभाल लेगा” उन्होंने मेरे जूनियर की ओर इशारा कर कहा.

मैंने कहा “नहीं सर वो अकेले मैनेज नहीं कर पायेगा. आप बता दीजिए मैं एक सीरियस मरीज़ को देख तुरंत आ रहा हूँ.”

सीनियर चिकित्सक ने कहा “तुम मरोगे और मरवाओगे हमें.”

मैंने मन में कहा “सर मुझे बच्चों को बचाने की ज़िम्मेदारी मिली है, आप अपना जानो.”

वे उसी तेज़ी से चले गए.

मैं 20 मिनट बाद वीआईपी कक्ष में पंहुचा. सुषमा जी बच्चे के बिस्तर के पास खड़ी थीं अपना हाथ उसके माथे पर रखे. मेरे मन में आशंका तो थी ही सबके सामने बेइज़्ज़त होने की. राजनीतिज्ञ जो ठहरीं.

लेकिन तब भी मैं आश्वस्त था क़ि मैंने कुछ गलत नहीं किया. मेरे पंहुचते ही वही सीनियर चिकित्सक जो हाथ बांधे खड़े थे मिनिस्टर के समक्ष बेहद आदर, सम्मान और उससे ज़्यादा डर की मुद्रा में….. ने कहा, “मैडम यही हैं पीडियाट्रिक सीनियर रेजिडेंट. इन्होंने ही इलाज शुरू किया है.”

डर वाला आदर प्रेम वाले आदर से जुड़वाँ होकर भी भिन्न दिखता है, खड़े अलग ढंग से होता है, पीठ को, रीढ़ को झुका देता है. हाव भाव तो अलग होते ही हैं, जीवनकाल भी कम होता है डर वाले आदर का. जिससे डर लगता हो तो आदर भी मृत्यु शैय्या पर पंहुच जाता है. किंतु प्रेमपूर्ण आदर निरंतर बहता है….. अपितु अमर होता है. और इन दोनों का एक और भाई स्वार्थ वाला आदर भी तो होता है, इसकी महिमा और गुणधर्म फिर कभी. कुछ कुछ चापलूसी सा दिखता है स्वार्थ वाला आदर.

सुषमा जी बोलीं – “बेटा आप व्यस्त थे शायद गंभीर बच्चों में, वे कैसे हैं?

मैंने कहा मैम “गंभीर तो हैं लेकिन वेंटिलेटर पर हैं अभी.”

“और हमारा ये बच्चा कैसा है? इसे क्या हुआ है?

मैंने बच्चे की समस्या मामूली है और ज़ल्द ठीक हो जायेगा समझा दिया था सुषमा जी को.

उन्होंने कहा अपने परिजन से “देखो हमारे एम्स के चिकित्सक कितने अच्छे हैं, तुम लोग क्या अपोलो एस्कोर्ट भागते रहते हो.”

फिर मेरी ओर मुख़ातिब हो बोलीं – “बेटा अब आप जा सकते हैं, उन बच्चों का ध्यान रखिए.”

उनकी बातों में उस युवा चिकित्सक के लिए बेटा शब्द था मिठास, अपनत्व था इसे मैं मात्र विनम्रता कह कर छोटा नहीं करना चाहूंगा. उनमें दम्भ मुझे लेशमात्र भी न दिखा. वे एक परिजन से मिलने आयी किसी सामान्य परिजन सी थीं.

उन्होंने उस दिन एक युवा चिकित्सक के मन में प्रेम वाले आदर को इंजेक्ट किया था जिसे अब तक भी जीवित रहना ही था.

दूसरा केस

राबड़ी देवी की बहन के घर का कोई बच्चा भर्ती हुआ मेरी यूनिट में. 10 दिन भर्ती रहा. प्रतिदिन दिल्ली पुलिस कमिश्नर रैंक का कोई अधिकारी उनसे मिलने आता था.

लेकिन बच्चे के परिजन बिहार, गाँव के रहन सहन के साथ हमारे साथ बेहद सहज, अपनत्व और विनम्रता लिए हुए थे. एक बार भी मैंने उन्हें रुतबा दिखाने की कोशिश करते या हमसे अनावश्यक समय चाहते नहीं देखा. एक चिकित्सक के प्रति जो कृतज्ञता दिखती है किसी ठीक होते मरीज़ में उनमें भी वही कृतज्ञता थी. लालू जी की छवि जो मन में थी उससे सर्वथा भिन्न था उनके परिजनों का मिट्टी से जुड़ा व्यवहार.

तीसरा केस

राजस्थान की वर्तमान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया का पोता गंभीर न्यूमोनिया का शिकार हुआ था. स्वयं मेरे सीनियर कंसलटेंट उन्हें एयरपोर्ट तक लेने गए थे.

वे भी 10 दिन हमारी यूनिट में भर्ती रहे. दुष्यंत, जो कि बच्चे के पिता थे अमेरिका में जॉब करते थे. और उनकी पत्नी किसी राजघराने से ही थी शायद.

दुष्यंत मुझसे घंटों बात करते थे वार्ड में खाली समय में. राजनीति, उनके जॉब, इत्यादि के विषय में मैं उनसे बात करता. मैंने उनसे उस वक्त पूछा था क़ि राजनीति में आप क्यों नहीं आ रहे?

तब उन्होंने कहा था इरादा नहीं. लेकिन बाद में वे सांसद बने तो खुशी हुई.

दुष्यंत भी दम्भ रहित, विनम्र दिखे. उनकी पत्नी अवश्य बच्चे को कैनुला लगने पर रोने लगतीं और हमसे कहतीं एक ही प्रिक में लगना चाहिए डॉक्टर. राजघराने के मोटू से बच्चे को एक प्रिक में कैनुला लगा पाना टेढ़ी खीर होती.

ऐसे में वे बच्चे को छोड़ बाहर भी नहीं ज़ातीं. तब दुष्यंत बड़े काम आये. मैंने उन्हें समझाया हमारे रेजिडेंट बच्चे की माँ के अपेक्षाओं के दबाव में और भी बुरा करेंगे. दुष्यंत किसी तरह उन्हें मना पाते.

लेकिन चिकित्सकों के प्रति सम्मान उनमें भी था उनकी प्रतिक्रियाएं माँ की प्रतिक्रिया ज़्यादा होतीं राजघराने की कम. दुष्यन्त जी की माँ वसुन्धरा जी इस दौरान नहीं आ पायी थीं.

चौथा केस

जबलपुर, मेरे चैम्बर में धड़ धड़ कर प्रवेश…. नेता नुमा इंसान, जिसकी हर कोशिका बताना चाह रही थी क़ि मैं एक नेता हूँ.

मैं एक गंभीर बच्चे को देख रहा हूँ. “डॉक्टर मैं ये हूँ वो हूँ, जनप्रतिनिधि हूँ. मुख्यमंत्री जी से भी मेरे सबंध हैं. मुझे आप बुला ही नहीं रहे. हमारी भी आपको ज़रूरत पड़ेगी कभी न कभी फंसे तो.”

मैं मुस्कुराता हूँ और बस इतना कहता हूँ, आप मुख्यमंत्री को जानते हैं ये कहने से ज़्यादा बड़ा परिचय आप बीमार बच्चे के पिता हैं, इतना काफी होता. सबसे बड़ा वीआईपी एक शिशु रोग विशेषज्ञ के लिए बीमार बच्चा है और आप उसके पिता हैं. और सर जन प्रतिनिधि तो जनता के लिए ही होता है न ऐसे में इन ज़नों के प्रतिनिधि आप, गंभीर बच्चों को पीछे धकेल पहली प्राथमिकता में स्थिर हालत के बच्चे को क्यों दिखाना चाहते हैं?”

इस बीच एक बात और, मेरे अनेकों साथी और छात्र ब्रिटेन, अमेरिका, ऑस्टेलिया में चिकित्सक हैं. वहां वीआईपी जैसा ऐसा अघोषित सिस्टम अस्पतालों में नहीं है. सबके लिए एक से नियम हैं.

यह वही एम्स है जिसमें आम आदमी को बिस्तर मिल पाना बेहद मुश्किल है. और यह वही एम्स है जिसमें कोई एक वीआईपी हो जाये परिवार में तो उसकी कई पीढ़ियों को तक एयरपोर्ट से ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है.

उपरोक्त संस्मरण में मैंने अपने चिकित्सा पेशे की एक बात के विरुद्ध कार्य किया है वह है, मरीजों और उनके परिजनों की आइडेंटिटी बताना. लेकिन क्योंकि ये बातें 13 वर्ष पुरानी हैं साथ ही पहले से ही पब्लिक फिगर लोगों की है. ऐसे में बिना नाम लिखे संस्मरण संस्मरण न बन पाता.

आपका
अव्यक्त

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