या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता : बंगाल में दुर्गा महोत्सव की तैयारी

शरद ऋतु के आते ही हल्की-हल्की ठंड के साथ शुरू हो जाती है बंगाल में ख़रीदारी की धूम, दुर्गा महोत्सव की तैयारी.

बंगाल प्रसिद्ध है – “बारो माशे, तैरो पारबोन” ( बारह माह में तेरह पर्व ) के लिए . . . और जग-प्रसिद्ध है यहाँ की दुर्गा पूजा.

बंगाल में दुर्गा पूजा कब से शुरू हुई, इस पर इतिहास के विद्वानों के अनेक मत हैं, फिर भी इस तथ्य से लोकमानस और विद्वान एक मत हैं कि सन् 1790 में पहली बार कलकत्ता के पास हुगली के बारह ब्राह्मणों ने दुर्गा पूजा के सामूहिक अनुष्ठान की शुरुआत की. इतिहासकारों का मानना है कि बंगाल में दुर्गोत्सव पर मूर्ति निर्माण की परंपरा की शुरुआत ग्यारहवीं शताब्दी में शुरू हुई थी.

महालया की भोर में उनींदे कानों से ‘या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता’ चंडी पाठ में महिषासुरमर्दिनी की कथा एक मधुर और लयबद्ध सुर में संस्कृत और बांग्ला में मंत्रोच्चार सुनाते हैं बीरेंद्र कृष्ण भद्र.

कथा कुछ ऐसी है कि असुर महिष ने घोर तपस्या की और ब्रह्मा प्रसन्न हो गए. महिष ने अमरता का वरदान माँगना चाहा, पर ब्रह्मा के लिए ऐसा वरदान देना संभव नहीं था. तब महिषासुर ने वरदान माँगा कि अगर उसकी मृत्यु हो, तो किसी औरत के हाथों ही हो. उसे विश्वास था कि निर्बल महिला उस शक्तिशाली का कुछ नहीं बिगाड़ सकती. वरदान मिल गया और शुरू हो गया महिषासुर का उत्पात.

सभी देवता उससे हार गए और इंद्र देव को भी अपना राजसिंहासन छोड़ना पड़ा. महिषासुर ने ब्राह्मणों और निरीह जनों पर अपना अत्याचार बढ़ा दिया. सारा जग त्राहि-त्राहि कर उठा और तब सभी देवों ने मिलकर अपनी-अपनी शक्ति का अंश दे कर देवी के रूप में एक महाशक्ति का निर्माण किया. नौ दिन और नौ रात के घमासान युद्ध के बाद देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया और वो महिषासुरमर्दिनी कहलाईं.

महालया के दिन ही माँ दुर्गा की प्रतिमा पर आँखें बनाईं जाती हैं, जिसे “चक्षु-दान” कहते हैं.

माना जाता है कि हर साल दुर्गा अपने पति शिव को कैलाश में ही छोड़ अपने बच्चों गणेश, कार्तिकेय, लक्ष्मी और सरस्वती के साथ सिर्फ़ दस दिनों के लिए पीहर आती हैं. उनकी प्रतिमा की पूजा होती है सातवें, आठवें और नौवें दिन. छठे दिन या षष्ठी के दिन दुर्गा की प्रतिमा को पंडाल तक लाया जाता है.

बंगाल का कुमारटुली प्रसिद्ध है दुर्गा की सुंदर प्रतिमाएँ गढ़ने के लिए जहाँ मिट्टी से ये मूर्तियाँ बनाईं जाती हैं. लकड़ी के ढांचे पर जूट और भूसा बाँध कर तैयार होता है प्रतिमा बनाने का आधार और बाद में मिट्टी के साथ धान के छिलके को मिला कर मूर्ति तैयार की जाती है.

उस मिट्टी का भी बेहद महत्‍व होता है, जिनसे ये मूर्तियां तैयार की जाती हैं. ये मिट्टी कई विशिष्‍ठ स्‍थानों से ला कर तैयार की जाती है. जैसे पवित्र गंगा के किनारों से, फिर इसमें गोबर गौमूत्र और थोड़ी सी मिट्टी “निषिद्धो पाली” ( निषिद्ध स्थान ) से मँगा कर मिलायी जाती है. वैश्याओं के घर के दरवाजे के बाहर से मिट्टी लायी जाती है.

कहानी है कि प्राचीन काल में एक वेश्‍या माँ दुर्गा की अनन्य भक्‍त थी. उसे तिरस्कार से बचाने के लिए माँ ने स्‍वंय आदेश देकर उसके आँगन की मिट्टी से अपनी मूर्ति स्थापित करवाने की परंपरा शुरू करवाई.

वैसे देखा जाए तो यह समाज सुधार का प्रतीक है. बंगाल से ही कई सामाजिक सुधार के मूवमेंट भी चले हैं. इन्‍हीं में से एक महिलाओं के सम्‍मान के लिए भी था और इसी लिए ये मान्यता प्रचलित की गयी कि नारी शक्ति का ही एक स्वरूप है, ऐसे में अगर उससे कहीं गलती होती है तो उसके लिए समाज जिम्मेदार है, फिर चाहे वो वेश्‍या ही क्‍यों ना हो! वेश्‍या के घर के बाहर की मिट्टी के इस्तेमाल के पीछे उन्हें सम्मान देने का यही उद्देश्य है.

आएँ, उसी कुमारटुली की करते हैं सैर और देखते हैं दुर्गा और अन्य मूर्तियाँ, निर्माण की विभिन्न अवस्थाओं में . . .

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