अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकार गिरोह को बर्दाश्त नहीं आलोचना

रामचंद्र गुहा जैसे कब पैदा होते हैं? जब मोटी चमड़ी वाले अनेक निर्लज्ज-बेशर्म और कुटिल-कपटी लोग मरते हैं. मुझे यकीन है इसमें से एक भी शब्द गाली नहीं है, बल्कि सभी घोर साहित्यिक है. वैसे इन जैसों को गाली देना गाली का अपमान है. और इन पर कुछ भी लिखना समय की बर्बादी है क्योंकि ये हर हाल में झूठ बोलने, तथ्यों को तोड़ने मरोड़ने और कुतर्क करने से बाज नहीं आने वाले. लेकिन यहां सिर्फ इसलिए लिखना पड़ता है कि पाठक को इन जैसों का असली चेहरा दिख सके.

ये लोग उस कुत्ते की तरह होते हैं जो हर हाल में अपने मालिक के वफादार होते हैं जो उनके सामने हड्डियां फेंकता रहता है. यूं तो कुत्ता भी प्रकृति के दूसरे जानवरों की तरह अपना अस्तित्व रखता है, और इसलिए उसके नाम में अशोभनीय जैसा कुछ नहीं, मगर यह अपनी एक विशेषता के कारण जाना जाता है, वो यह कि इसके लिए इसका मालिक ही सबकुछ है. फिर चाहे वो मालिक उसे चोरी डकैती लूट से ही उसे हड्डियां खिला रहा हो. बदले में वो अपने मालिक की सुरक्षा में भौंकता भी है और पूंछ भी हिलाता है.

उपरोक्त कथन के पीछे आज एक और प्रमाण हाथ लगा. रामचंद्र का आज एक लेख गौरी लंकेश हत्या को लेकर छपा है जिसमें उन्होंने अपने मालिक का नाम एक बार भी नहीं लिया. क्या रामचंद्र को पता नहीं कि गौरी की हत्या जिस राज्य में हुई है, वहाँ किसका शासन है और लॉ एंड आर्डर के लिए राज्य जवाबदार होता है. मगर उन्होंने तो अपने खानदानी मालिक युवराज की तर्ज पर हत्या के लिए सीधे सीधे आरएसएस – भाजपा को जिम्मेवार घोषित कर दिया. और तो और उनसे सवाल भी पूछ लिया. इसको कहते हैं बौद्धिक वफादारी.

रामचंद्र अकेले नहीं हैं, सौ-पचास लोगों का गिरोह है जो हर सेक्युलर घटना पर झुण्ड में होकर भौंकता है. क्या करें, ये सब अपने आदत से लाचार हैं. मजेदार बात यह है कि इनके भौंकने को शहर का हर राहगीर जानता और समझता है.

क्या यही स्वतंत्र पत्रकारिता है कि दुनिया में रोज घट रही आतंक की घटना में इस गिरोह को धर्म का रंग नहीं दिखता मगर अगर 125 करोड़ के देश में, गलती से भी कोई व्यक्तिगत कारणों से भी कोई हिन्दू किसी को सड़क पर चांटा भी मार दे तो पूरे गिरोह को देश खतरे में दिखने लगता है. इनके तर्क भी गजब होते हैं, देश के टुकड़े-टुकड़े कर देने का नारा खुले में लगाने वाले लोग इन्हे ना तो दिखाई देते हैं ना ही सुनायी देते है, मगर अगर कोई आम नागरिक इन आपत्तिजनक नारों के विरोध में अपनी प्रतिक्रिया देता है तो इन्हें लगता है कि देश को तोड़ने वाली शक्तियां अपना सर उठा रही हैं.

इन्हें दुनिया में बिना कोई कारण बेक़सूर लोगों पर हर दिन फूटते बम-गोले नहीं दिखते और काफिर की गला रेतने वाली खबरें भयभीत नहीं करतीं मगर अगर किसी दुर्घटना में जाने अनजाने किसी एक चींटी की टांग भी टूट जाए तो इनके लिए असहिष्णुता बढ़ती नजर आती है और ये असुरक्षित महसूस करने लगते हैं और इन्हें देश खतरे में पड़ा नजर आता है.

रामचंद्र ने आज के लेख में सब कुछ लिखा लेकिन गौरी के कारनामे नहीं लिखे. क्या मरते ही व्यक्ति के अपराध भी खत्म हो जाते हैं? रामचंद्र ने यह तो लिखा कि गौरी पर दबाव के लिए केस डाले गए थे मगर यह नहीं बताया कि कोर्ट ने क्या फैसला दिया था.

उन्होंने यह तो लिखा कि उनकी मौत पर कुछ लोगों ने जश्न मनाया मगर यह नहीं बताया कि गौरी किस-किस के मरने पर कैसे-कैसे जश्न मनाया करती थीं और क्या क्या लिखती थीं.

उन्होंने यह तो बताया कि देश में नफरत बढ़ रही है मगर यह नहीं बताया कि उन्हें और गौरी जैसे लोगों को हिन्दू धर्म से नफरत है. और ये सब षड्यंत्रपूर्वक हिन्दुओं के विरुद्ध काम करते हैं, यही कारण है जो आम हिन्दुओं में इन को ले कर आक्रोश है.

ये गिरोह अपने आप को स्वतंत्र कहता है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है मगर अगर इनकी आलोचना की जाए तो यह इनको स्वीकार्य नहीं. इनका यही कुतर्क सर्वाधिक हास्यास्पद हो जाता है. अगर इनका गिरोह कुछ भी लिखने के लिए स्वतंत्र है तो हम जैसे आम नागरिक भी अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र हैं.

अंत में, एक बात मुझे बहुत हैरान करती है वो यह कि हिन्दू संस्कारों का मजाक उड़ाने वाले अधिकांश लोगों के नाम हिन्दू देवी देवता पर ही क्यों हैं, फिर चाहे वो गौरी से लेकर रामचंद्र, कन्हैया, सीताराम आदि आदि नाम हों. कहीं यह विदेशी धर्म परिवर्तन गैंग की एक सोची समझी चाल तो नहीं?

बहरहाल आखिर में, रामचंद्र गुहा से एक सवाल, कि क्या वो अपनी माता से यह पूछ सकते हैं क्या वे फ्री सेक्स के कारण पैदा हुए थे या रेप के कारण? यह सवाल मेरा नहीं है, ऐसे सवाल पूछने का मेरे संस्कार भी नहीं हैं. मेरे सनातन संस्कार तो देश और नदी को भी माता मानकर पूजने की बात करता है. ऐसे में भला मैं किसी की माता के लिए यह अपमानजनक सवाल नहीं पूछ सकता. मेरे लिए तो रामचंद्र और गौरी की माताएं भी आदरणीय हैं.

हाँ, इस तरह के सवाल और जवाब गौरी किया करती थीं. मुझे यकीन है कि रामचंद्र गुहा, गौरी के लेख पोस्ट और ट्वीट को पढ़ते होंगे. अगर पढ़ते रहे हैं तो उन्होंने इनका जिक्र अपने लेख में क्यों नहीं किया, और अगर वे गौरी को नहीं पढ़ते थे तो उन्हें उन पर लेख लिखने का अधिकार नहीं. कम के कम उनकी मौत पर आंसू बहाने की बजाये राजनीति करने का कोई हक़ नहीं. लेकिन लगता है रामचंद्र अपनी आदत से मजबूर हैं जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया है.

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