कनागत : जो दान करोगे वही तो पाओगे कर्ण

महा दानवीर कर्ण कुरुक्षेत्र में अर्जुन के हाथों प्राण गंवा कर स्वर्ग के द्वार पर थे. स्वयं यमराज ने अपने छोटे भाई को गेट पर आकर रिसीव किया.

अंदर घुसते ही कर्ण को बड़े बड़े और सेंटेड वाटर वाले स्वीमिंग पूल दिखे. कर्ण ने कहा ‘भैया पूरा शरीर और वस्त्र खून से लथपथ हैं जरा यहाँ स्नान कर लूँ’?
लेकिन यमराज ने कहा – ‘नहीं छोटे तुम्हें पृथ्वी लोक पर इतना कुछ दान पुण्य करके यहाँ स्पेशल स्टेटस हासिल किया है …. तुम्हारा यूं जर्नल क्लास में स्नान करना यहाँ के प्रोटोकॉल के खिलाफ होगा. यमराज कर्ण को आलीशान गोल्डन कलर के 11 स्टारर होटलनुमा भवन पर पहुंचा कर आए.

कर्ण अंदर घुसे. अंदर हर तरफ हर वस्तु पर गोल्डन कलर छाया हुया था. थके मांदे कर्ण एक सोफ़े पर धचाक से बैठ गये. लेकिन उनके मुंह से कराह निकल गयी. गोल्डन कलर का वह शानदार सोफ़ा धातु की तरह कठोर था.

तभी वहाँ गोल्डन ड्रेस पहने एक सुंदरी आई उसके हाथ मैं गिलास था …… और उसमें कोई गोल्डन ड्रिंक भरा हुआ था.. प्यास से बेहाल कर्ण ने गिलास ले तपाक से होठों से लगाया लेकिन गिलास के अंदर से कुछ भी बाहर ना निकला. कर्ण अपने होठों पर जीभ फिरा कर रह गये.

हक्के बक्के कर्ण खिड़की के किनारे आये. बाहर से हवा की ताजगी के साथ साथ देशी घी के तड़के की आती खुशबू ने उनकी भूख भड़का दी. पीछे मुड़ कर देखने की देर थी कि वो गोल्डन सुंदरी थाली और गिलास लेकर हाजिर थी. थाल में बेसन के और बूंदी के लड्डू, सोन पपड़ी, गोल्डन कलर की खीर, रसगुल्ला भी गोल्डन, रायता भी गोल्डन, सारी डिश गोल्डन थीं.

कर्ण भूख से बुरी तरह बेहाल थे. थाली पर बुरी तरह टूट पड़े लेकिन पहला कोर मुंह में डालते ही लगा मानो दाँत टूटे, झेंपे कर्ण थाली को परे हटा वहीं निढाल होकर पड़ गये.

कुछ देर पश्चात उनकी नींद टूटी और बाथरूम में गये. युद्ध के चक्कर में कुछ खाया पिया तो था नहीं सो पोटी तो आनी ही नहीं थी. कपड़े उतार शावर खोला शावर से गोल्डन कलर की बारिश सी होने लगी जो कि कर्ण को बहुत चुभ रही थी. फिर कर्ण ने बाल्टी में मग्गा डुबो अपने सर पार डाला तो लगा मानो किसी ने पत्थर पटक दिया हो. थके हारे हलकान कर्ण की हैरानी का कोई ठिकाना नहीं था. उनके पहने हुये कपड़े सारे बेकार हो गए थे. किसी भी प्रकार वहाँ गोल्डन वस्त्रों में से नेट नुमा कपड़े की धोती निकाल के पहनी और पाँवों में गोल्डन खड़ाऊँ डाल रूम की अलमारी में पड़े पर्स को उठा कर बाहर निकाल आए.

बाहर एक भवन के अंदर से म्यूजिक के मधुर स्वर को सुन धुन को सुन के अंदर पहुंचे वहाँ एक अद्भुत सुंदरी को कमर लट्टू की तरह घुमाते लचकाते अरेबियन बेले करते हुये देख कर्ण से ना रहा गया और पर्स से नोट निकाल कर डांसर की ओर उछाले. किन्तु नोटो के प्रहार से वो डांसर लहूलुहान हो गयी और झेंपे झेंपे कर्ण अपने होटल में आ हाँफते हुये बेड पर गिर पड़े. लेकिन यहाँ कहाँ चैन था. बेड की कठोरता ने उनकी कमर तोड़ कर रख दी थी.

दर्द से बेहाल चीख उठे कर्ण….
‘भाई यमराज ये कैसा पुण्य है मेरा, खाने पीने नहाने पहनने शयन हर चीज में ये मुझे सोना क्यों दिया जा रहा है. भैया मुक्त कराओ इस स्वर्ण सुख से.’

चीख सुन यमराज आए. साथ में चित्रगुप्त को भी लेकर आए. चित्रगुप्त ने झोले से लैपटाप निकाल कर टैली खोल एकाउंट चैक किया. बताया ‘महाराज कर्ण हमारे यहाँ आने वाले टॉप मोस्ट डोनर हैं. लेकिन इन्होंने जीवन भर केवल गोल्ड ही डोनेट किया है, सो यहाँ के डिपॉजिट में अकेले गोल्ड ही क्रेडिट बेलेन्स में है.’

यमराज बोले ‘चित्रगुप्त कुछ करो बार्टर एक्सचेंज मे गोल्ड से जरूरत की चीजें छोटे के एकाउंट में ट्रांसफर करो.

चित्रगुप्त ने कहा ” लेकिन महाराज इसके लिए छोटे साब का एकाउंट पेज ओपन करने के लिए नया पासवर्ड चाहिएगा, लेकिन पासवर्ड पृथ्वी लोक छोड़ते ही करप्ट हो जाता है.”

खैर कर्ण के स्पेशल डोनेशन के रिकॉर्ड को देखते हुये उन्हें 16 दिन का लाइफ एक्सटेंशन दे कर पृथ्वी लोक पर वापस भेजा. स्पेशल डाइरेक्शन दिया कि इन सोलह दिन में जितना और जो भी दान करोगे वो सारा का सारा तुम्हारे एकाउंट में जमा हो जाएगा.

तब कर्ण भाद्रपद की पूर्णिमा को पृथ्वी पर आए और अश्वनी अमावस्या तक जम कर खाने पीने वस्त्र और अन्य सांसारिक वस्तुओं का दान कर अपने स्वर्ग में जीने की व्यवस्था की.

और वो ही कर्णागत अब अपभ्रंश हो कनागत बन गया.

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