विरोध सभा में वामपंथी नेताओं के शामिल होने पर प्रेस क्लब अध्यक्ष ने माफ़ी मांगी

चलिये, आवाज़ उठाने का इतना असर तो हुआ कि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के अध्यक्ष गौतम लाहिड़ी को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी कि क्लब के प्लेटफार्म का इस्तेमाल वामपंथी नेताओं को नहीं करने दिया जाना चाहिए था.

हालांकि हम पत्रकारों का ये क्लब एक कंपनी है और इसका CEO क्लब का जनरल सेक्रेटरी होता है… लेकिन वे महाशय इस पूरे मसले पर खामोश हैं, जबकि बुधवार को हुई विरोध-सभा का संचालन उन्हीं के हाथों में था, और वही ये तय कर रहे थे कि भाषण देने के लिए किसे मंच पर बुलाना है और किसे नही…

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उनकी चुप्पी का रहस्य मुझे तो समझ नहीं आया….हो सकता है,आपमें से कई लोग इसे जानते हों…. कृपया मुझे भी बताइयेगा….

बता दूं कि पिछले दिन टीवी पत्रकार रविश कुमार को संबोधित करते हुए मैंने लिखा था – “रवीश कुमार, बुधवार को आपने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में गौरी लंकेश के बहाने काफी हद तक सच बोला… लेकिन मुझे एक बात समझ नहीं आई कि पत्रकारों और व्यवस्था के बीच छिड़ी इस ज़ंग में मीडिया को वामपंथी नेताओं की बैसाखी की जरूरत भला क्यों आन पड़ी है…

[क्या यह शख्स भी कोई मुखौटा लगाकर विरोध सभा में आया था!]

विरोध-सभा तो पत्रकारों द्वारा, पत्रकारों के लिए और पत्रकारों के क्लब में आयोजित की गई थी… फिर वहां वाम दलों के नेताओं से लेकर कन्हैया कुमार जैसे लोगों को बुलाने की क्या जरूरत थी… औऱ, अगर वे बिन बुलाए आ भी गए थे, तो उन्हें माइक थमाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की इजाज़त किसने और क्यों दी?

जी, जानता हूँ, आप कहेंगे कि मैं ये सवाल प्रेस क्लब के मैनेजमेंट से पूछूं… आपके कहने से पहले ही मैं औऱ मेरे जैसे अनेकों साथी उन्हें इसके लिए सार्वजनिक रुप से कोस चुके हैं… लेकिन भाई, मेरा सवाल आपसे है – आप नैतिकता, निष्पक्षता, ईमानदारी, निर्भीक पत्रकारिता की दुहाई देते हैं, बहुत अच्छी बात है… पर, बुधवार की शाम भाषण देने के लिए जब आपने माइक अपने हाथ में थामा, तो आपको यह अहसास क्यों नही हुआ कि प्रेस क्लब के मंच को तो एक खास या यूं कहें कि वाम-नक्सली विचारधारा के लोगों ने हाइजैक कर लिया है.

मुझे उम्मीद थी कि माइक संभालते ही रवीश के भीतर बैठा बेख़ौफ़ व निष्पक्ष पत्रकार इन वाम नेताओं को लताड़ते हुए बोलेगा कि महानुभावों, हमें आपकी जरूरत नहीं है… ये लड़ाई मीडिया बनाम व्यवस्था की है और हम इसे लड़ने में सक्षम हैं, लिहाज़ा आप इसे अपनी राजनीति चमकाने का ज़रिया न बनाएं और न ही हम पत्रकारों को किसी कंडोम की तरह इस्तेमाल करने का ख्वाब देखिये…

पर, अफसोस रवीश… सब जानते-समझते हुए भी आपके मुँह से ऐसा एक भी लफ्ज़ नहीं निकला… सोच रहा हूँ कि क्या यह शख्स भी कोई मुखौटा लगाकर इस सभा में शरीक होने आया था…”

नरेंद्र भल्ला, वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली

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