पूछो, खोजो, जानो, सिर्फ सूखा विश्वास करना तो मूर्खों का काम है

मुझे उन भारतीय बच्चों के लिए बहुत चिंता होती है जो भारत से बिल्कुल कटे भी नहीं है… और जुड़ने का कोई कारण भी नहीं खोज पाते. मेरे बच्चे भी कुछ कुछ इसी वर्ग में आते हैं… हमारे सारे प्रयासों के बावजूद…

नहीं, मैं उन लोगों की बात नहीं कर रहा जो भारत से और अपने मूल से एक घृणा के साथ बड़े होते हैं. जिन्हें हिन्दू संस्कारों से वितृष्णा है… जो कृष्ण का क्रिस और विकास का विक कर लेते हैं… पहचान छुपाने के लिए.

मैं उनकी बात कर रहा हूँ जो हिन्दू संस्कारों के बीच, हिन्दू रीति रिवाजों को मानते हुए, हिन्दू पहचान के साथ बड़े होते हैं… पर एक ऐसे प्रतिकूल माहौल में जहाँ हर तरफ से हिंदुत्व विरोधी बातें होती हैं… सनातन को एक पिछड़ा, रूढ़िवादी, अप्रगतिशील और स्त्री-विरोधी, जातिवाद और अन्याय का प्रतीक चित्रित किया जाता है…

उसमें ये बच्चे अपनी हिन्दू पहचान के साथ असहाय, अरक्षित खड़े होते हैं. इन्हें पता नहीं होता हिन्दू धर्म क्या है… कैसे यह दूसरे धर्म-पंथों से अलग है… ये बच्चे सभी धर्म समान है सुनकर बड़े होते हैं. तो अन्य धर्मों का जेनेरिक, अंतर्निहित पिछड़ापन और रूढ़िवाद अपने आप हिन्दू धर्म पर आरोपित हो जाता है. उसके बीच ये बच्चे अपनी हिन्दू पहचान के साथ खड़े तो होते हैं… लेकिन थोड़े सहमे सकुचाये… अपोलोजेटिक…

कल एक भारतीय लड़की मिली. कोई 24-25 साल की. नई इंटर्न थी. एक ग्रुप में बातें कर रहे थे. मैंने पूछ लिया, कहाँ से हो, पेरेंट्स क्या करते हैं, कहाँ कहाँ समय बिताया…

फिर पूछा, अपनी रिलीजियस आइडेंटिटी को सब्सक्राइब करती हो?

उसने कहा – हाँ, मैं कल्चरली हिन्दू हूँ. दीवाली होली मनाती हूँ….

और जैसा कि मैं करता हूँ…एक “पर” का इंतज़ार किया. ….पर हिंदुइज्म में बहुत कुछ है जिसपर मैं विश्वास नहीं करती…

मैंने पूछा – हिंदुइज्म में क्या है जिसपर तुम्हें “विश्वास” करने को कहा जाता है? “विश्वास” करना हिंदुत्व का स्वभाव है ही नहीं. अगर आप “विश्वास” करने की आदत रखते हैं तो आप गलत धर्म में हैं.

उसने कहा – क्यों? हिन्दू धर्म के अपने धर्म ग्रंथ हैं… भगवद्गीता है…

मैंने कहा – तुमने अच्छा उदाहरण चुना है…कुछ पता है भगवद्गीता के बारे में? भगवद्गीता का स्ट्रक्चर क्या है जानती हो? 18 चैप्टर तक भगवान कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते रहे… और अर्जुन सवाल पूछता रहा… यहाँ विश्वास करने का स्कोप तो खुद भगवान की बोली हुई बात में भी नहीं है… पूछो, खोजो, जानो… सिर्फ सूखा विश्वास करना तो मूर्खों का काम है…

क्यों? कुछ लोग तो क्या अजीब अजीब बातें करते हैं…

अरे छोड़ो ना…बेवकूफ कहाँ नहीं होते हैं…

उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गयी… फिर लोग खाना खाने लगे… बातें होने लगीं… मुझे लगा, उस बच्ची को मैंने एक आर्गुमेंट दे दिया, एक सकारात्मक तर्क दिया…एक कारण दिया हिन्दू होने पर गर्व करने का…

बच्चे अकेले छूट गए हैं… उन्हें हिन्दू होना स्वीकार है, गर्व करना भी चाहते हैं…पर उन्हें कोई बताता नहीं है कि गर्व किस बात पर करना है… बच्चों से बात करना जरूरी है… पर भारी भरकम ज्ञान की बातें नहीं, उनकी भाषा में….

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