आप को शर्मिंदा करने की ही मिलती है उन्हें रोटी

गौरी लंकेश की हत्या पर हिंदुओं की जो प्रतिक्रिया दिख रही है वो हमेशा की तरह है. लेकिन यह हत्या की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि हत्या की बेशर्म मार्केटिंग की प्रतिक्रिया है. दुर्भाग्य यह है कि हिंदुओं में यह समझ कम है कि वे किस बात पर किससे लड़ रहे हैं. हो सकता है इस लेख पर भी आपत्ति करते लोग आ जाएँ।

आइये देखते हैं कि ये हत्या की मार्केटिंग का विरोध कैसे है. सब से पहले हत्या की मार्केटिंग को समझते हैं.

जैसे ही हत्या की खबर आई, अचानक गौरी लंकेश एक वरिष्ठ पत्रकार करार दे दी गई. कोई जानता नहीं था जिसे, वो मर कर अचानक इंटरनेशनल प्रसिद्धि पा गई. साथ साथ यह वामी मार्केटिंग शुरू हुई कि इसकी हत्या हिन्दुत्ववादियों ने या संघ ने की है. न खाता न बही, जो वामी बोले वो सही. सब लाल सियार एक सुर में हुआं हुआं करने लगे. यह बात उनसे सीखने जैसी है.

आजकल 1962 जैसी स्थिति नहीं रही, लाल सेना हमला करे तो यहाँ जवाब देने को लोग तत्पर हैं. तो, कौन थी गौरी लंकेश उस पर खोजबीन शुरू हुई और प्रत्युत्तर शुरू हुआ. इसमें विशेषता कहें या खामी, वो यह थी कि जिन संस्थाओं का नाम लेकर हमला बोला गया वहाँ से कोई सूत्र संचालन हुआ नहीं, हर कोई अपने अपने हिसाब से उत्तर देने लगा.

गौरी लंकेश की फेसबुक प्रोफ़ाइल खोजी गई. वहाँ काफी कुछ आपत्ति करने लायक मसाला मिल गया. उसमें से जिसको जो मिला उसे लेकर लिखना शुरू हुआ. अचानक वामियों ने पाया कि नायिका बनाने के लिए उन्होंने जिसे उठाया वो तो कुटिला निकली. उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था कि उसकी हत्या का किसी को दुख हो.

हत्या निंदनीय होती है, बस इतनी ही बात थी. इससे अधिक इसके साथ संवेदना देने की किसी को इच्छा नहीं थी. बल्कि इसकी करतूतें जानकर घृणा ही बलवती हुई और वामियों को उलट पूछा जाने लगा कि किसकी वकालत कर रहे हैं आप?

उसके बाद उनका सुर बदला है, अब एक महिला तथा एक मृतक का सम्मान न करने पर वे आप को असंवेदनशील और असंस्कारी ठहरा रहे हैं. “आप एक महिला के बारे में बुरा बोल रहे हैं, आप एक मृत व्यक्ति के बारे में बुरा बोल रहे हैं, आप को शोभा नहीं देता.”…. आदि प्रलाप शुरू हुए हैं. कुल मिला कर ये ‘shame the Hindu’ के धंधे में हैं और आप को शर्मिंदा करने की ही उन्हें रोटी मिलती है.

बाकी जो कुछ अन्यों के tweets थे कि मुख्यमंत्री से संबन्धित भ्रष्टाचार के मामले में वो कोई पोलखोल पर काम कर रही थी और मुख्यमंत्री का CBI को जांच सौंपने से इंकार, यह भी विचारणीय बात है. अब मीडिया इस बात पर चुप है. सब अपने अपने मत रख रहे हैं, संघ पर आरोप कर रहे हैं लेकिन उससे अधिक सबूत तो कोई नहीं देता. वैसे सुबह उनका पेट साफ नहीं हुआ तो उनकी नजर में इसमें भी संघ का हाथ होता है.

और एक बात. वामी किस कदर डेस्परेट हुए हैं यह इस बात से ज़ाहिर होता है कि प्रसिद्ध अस्थिरोग विशेषज्ञ और विद्वान् डॉ त्रिभुवन सिंह की एक फेसबुक पोस्ट के आधार पर किसी पोर्टल ने उन पर रविश कुमार को जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाया है. इसी प्रकार दिल्ली में एक वामियाइन पत्रकार ने किसी पर FIR लिखाई है. भाषा संयत रखें.

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