जीवन पुनर्जन्म-2 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए

Ma Jivan Shaifaly

भाग-1 से आगे (जीवन पुनर्जन्म-1 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए)

चार

घर लौटी तो किसी ने कोई सवाल नहीं किया. मेरी सामान्य अवस्था होती तो घर की इस खामोशी से मैं शर्मिन्दगी के मारे ही मर जाती, लेकिन वो मैं कहाँ थी… घर लौटकर चुपचाप अपने काम में लग गयी…

इन्होंने भी कोई विशेष बात नहीं कही, बस मुझसे टुकड़ों-टुकड़ों में यात्रा के किस्से सुनते रहे… कितनी ही बातें तो मुझे याद ही नहीं थी… और इनके चेहरे पर नितांत शांति और मुस्कराहट देखकर मैं और विचलित हो रही थी…. क्योंकि मैं जानती थी… किसी ज़रूरी काम के लिए दो दिन की यात्रा पर भी जाती थी तो ये खुद को बहुत अकेला अनुभव करते थे… घर में रहते हैं, तब भी एक पल के लिए अकेला नहीं छोड़ते… घर के बाहर का काम हो, चाहे बैंक का हो या, सब्ज़ी खरीदने का मेरा साथ होना आवश्यक है…

कई बार पूछा भी, क्यों मुझे ऐसे चिपकाए रहते हो?

कहने लगे, स्नान और शौच के लिए भी अकेले कैसे जाता हूँ मैं जानता हूँ… एक दिन आप भी जान जाएँगी… आपको क्यों ऐसे साथ साथ रखता हूँ…

और अभी जिस तरह से जाकर लौटी हूँ… कैसे इन्होंने चार दिन निकाले होंगे… और मेरे बच्चे… मैं सच में अपना अस्तित्व खो चुकी थी… मेरे लौटकर आने के बाद भी मुझे दिन भर बांहों में भरकर ये समझाते रहते… मुक्त हो जाओ अपने भय से…

कैसे? उपाय तो बताओ…

सब आपके हाथ में है…

नहीं, सब तुम लोग कर रहे हो, मैं जानती हूँ…

जानती हो तो क्यों फंसती हो इस माया में… जानती हो ना सब तुम्हें मुक्त करने के लिए रची गयी माया है… तो निकल क्यों नहीं जाती, तोड़ क्यों नहीं देती इस मायाजाल को…

आप लोग क्यों नहीं मुझे मुक्त कर देते…

देवी आपकी मुक्ति आपके ही हाथ में है… मैं तो बस मदद कर सकता हूँ… जो कर रहा हूँ…

मदद? जिस व्यक्ति से मुझे भय लग रहा है, आप दिन रात मेरे सामने ‘उससे’ बातें करते हैं…

मानती हो ना? सब आपके सामने ही हो रहा है… सारी बातें आपके सामने होती है, आपकी उपस्थिति में होती हैं… एक पल के लिए भी आपसे अलग नहीं होता हूँ इसलिए आपको भी पता है कि मैं छुप कर नहीं करता कोई काम…. कुछ नहीं छुपा है आपसे. छुपाया वो जाता है जब आप कुछ गलत, या दुनिया के डर से चोरी से करते हो… और ये आप समझकर भी स्वीकार करने से डर रही हैं कि सब आपकी मदद के लिए ही है… आप एक बार समर्पण कर दो… स्वीकार भाव ले आओ… आप खुद देखेंगी ये जो दिखाई दे रहा है वो सिर्फ और सिर्फ रेगिस्तान में दिखने वाली मरीचिका है, और कुछ नहीं…

मैं सब जानती थी… प्रकृति के छोटे छोटे जादू से अभिभूत होकर खुश हो जाने वाली मैं, सबको अध्यात्म की बातें बताने वाली मैं, आज मुझे अपनी ही परछाई नहीं मिल रही थी जिसके पीछे छुपकर मैं इस भय के राक्षस से पीछा छुड़ा सकूं…

अस्तित्व चारों ओर से जादू बरसा रहा था, ऐसे ऐसे जादू घटित हो रहे थे जो इस भौतिक जगत में किसी को बताऊँ तो मुझे सच में पागल समझे…. चीज़ों का अपने आप प्रकट हो जाना, अपने आप गायब हो जाना, हम दोनों के बीच हुई बातों का कोई हिस्सा ही हमारी स्मृति से गायब कर देना… कभी मुझे याद होता इनको नहीं और कभी इनको याद होता और बताते कि कल रात यह घटित हुआ तो मुझे याद नहीं होता… क्योंकि इस जन्म में मेरी स्मृति में ऐसी कोई बात अंकित नहीं की जानी थी जो मुझे आगे जाकर मुक्ति में बाधक बनें… ऐसी बहुत सारी घटनाएं घटित हुई जिसको लिखने की मुझे अनुमति गुरुओं से नहीं मिली है… जो भी लिख पा रही हूँ वो इस यात्रा का केवल छोटा सा हिस्सा है…

इस बीच ध्यान की गहराइयों में उतरना प्रारम्भ किया, इन्होंने जो उपाय बताया किया, कुछ प्रयोग मैंने खुद इजाद किये… घर के सामने हो रहे कंस्ट्रक्शन के लिए रेत का ढेर लगा हुआ था… रात को अक्सर बच्चों के साथ हम लोग जाते और उस ढेर पर मैं अपनी पूरी ताकत से मुक्के बरसाती… जैसे अपने उस भय को परास्त कर देना चाहती हूँ… यही भाव ध्यान के समय भी लाती जैसे मैं किसी मजबूत पत्थर की दीवार में कैद हूँ और जैसे ही मैं उस दीवार पर मुक्के बरसाती वो रेत के ढेर की तरह भरभरा का गिर जाता… और एक प्रकाश मुझे पूरी तरह से ढँक देता…

फिर एक दिन मैंने एक चित्र देखा, रक्तबीज… माँ दुर्गा और माँ काली…

पूरा दृश्य मेरे सामने जीवंत हो गया था… मेरा भय रक्तबीज की तरह लहू के हर कतरे के साथ अपने भयानक स्वरूप में मेरे सामने प्रकट हो रहा था… मैं उसे जितना ख़त्म करने की कोशिश करती वो उतना ही भयानक होता जा रहा था… तब मुझे समझ आया ‘उसका’ काली के मंदिर से लगाव और मेरा काली के मंदिर से भय… मेरे भय रूपी रक्तबीज के राक्षस को ख़त्म करने के लिए ‘उसे’ माँ काली की ऊर्जा के रूप में भेजा गया था, ताकि मेरे भय का वो राक्षस सदा के लिए ख़त्म हो सके और मेरा वास्तविक स्वरूप दोबारा से प्रकट हो सके…

कहते हैं हर व्यक्ति की व्यक्तिगत चेतना ब्रह्माण्ड की किसी न किसी दैवीय ऊर्जा की वाहक होती है… ‘उसे’ काली की ऊर्जा का वाहक बनाकर मेरे पास भेजा गया था, और मैं माँ दुर्गा की शक्ति के निकट अपने स्वरूप को पाती थी…

इस बीच माँ काली के मंदिर में भी ये बार बार ले जाते… भय थोड़ा कम हो गया था लेकिन पूरी तरह से नहीं निकला था… फिर एक दिन उसी मंदिर के प्रांगण में मुझे माँ दुर्गा के दर्शन हुए… माँ की आँखों से जैसे कोई प्रकाश किरण निकल कर मेरे हृदय में प्रवेश कर गयी…

उसके बाद मैंने ध्यान का नया प्रयोग शुरू किया. हृदय में माँ दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर दी और हमेशा यह भाव बनाए रखने की कोशिश की कि अब हृदय में माँ को विराजित कर दिया है तो अब मेरे अन्दर कोई दुर्भावना प्रवेश नहीं कर सकेगी… मेरे अन्दर अब कोई नकारात्मकता नहीं आयेगी… कोई भय मुझे अब नहीं डरा सकता…

कुछ बेहतर होने लगी थी तो एक दिन इन्होंने फिर टोक दिया… दुर्गा की आँखों से आपको रोशनी की किरण निकलती अनुभव हुई क्योंकि आप माँ काली के भय से मुक्त होना चाहती थीं, यह आपकी आँखों का भ्रम था… दोनों एक ही माँ के स्वरूप हैं और ये दोनों शक्तियां आपके अन्दर ही उपस्थित हैं. आप कब तक बाहरी चीज़ों में सहारा ढूंढती रहेगी, बाहर से ली गयी कोई भी मदद कितने दिन काम आएगी… आपको अपनी मदद खुद करना है…

मुझे लगा जैसे इन्होंने मेरा इकलौता सहारा भी छीन लिया… मैं फिर उदास रहने लगी, खाना पीना सब लगभग छूट गया था, जो खाती थी वो भी देह को लगता नहीं था… धीरे धीरे मेरा वज़न कम होने लगा… चेहरे पर अजीब सी मलिनता छा गयी थी, जो कभी कभी मेरे चेहरे को बहुत ही बदसूरत बना देती… अक्सर रात के समय मेरा चेहरा बिलकुल बदल जाता… ये रात को कई बार मेरी फोटो लेते और सुबह दिखाते तो मुझे यकीन ही नहीं आता था कि बीती रात ये मैं ही थी….

पांच

इस बार मैंने उस आध्यात्मिक गुरु से संपर्क किया जिनकी बताई ध्यान विधियों से मैं आमिष से निरामिष बनी थी… उन्होंने मुझे गायत्री मंत्र का जाप करने को कहा, और फिर इन्होंने भी मुझे फिर से उन्हीं ध्यान विधियों का प्रयोग करने को कहा…

भय से मुक्ति के लिए एकमात्र साधना है हनुमान तत्व को ग्रहण करना… मैंने हनुमान साधना शुरू की…. कुछ दिनों तक मैं इस भय से मुक्त रही… एक दिन सुबह-सुबह इनसे कहा मुझे हनुमान मंदिर जाना है आज…

ये हमेशा की तरह मुस्कुरा दिए… आपको हनुमान मंदिर जाने का आज ही ख़याल क्यों आया?

मैंने कहा – पता नहीं यूं ही…
आपको पता है आज क्या है?
नहीं… क्या है?
बूढ़ा (बुढ़वा) मंगल..
ये क्या होता है?
वो आप लौटकर इन्टरनेट पर पढ़ लीजियेगा, पहले जो आपको आदेश मिला है उसका पालन कीजिये… देखिये शायद कोई आपकी प्रतीक्षा कर रहा हो वहां…

ये मुझे हनुमान मंदिर में छोड़ गए… आज भी मेरी अवस्था वैसी ही थी जैसी वहां उस मज़ार पर थी… मैं अन्दर गयी तो आरती शुरू हो गयी थी… सब लोग ज़ोर ज़ोर से ताली और घंटे बजाते हुए हनुमान चालीसा गा रहे थे… मुझे तो हनुमान चालीसा आती भी नहीं थी… जीवन में कभी कोई मंत्र, आरती, पूजा पाठ कुछ किया ही नहीं तो कहाँ से आता… गायत्री मंत्र भी बच्चों के स्कूल में सिखाया गया था तो उनको सुनते हुए आ गया… बस आँखें बंद किये हनुमान के सामने खड़ी हो गयी… मेरे पीछे से सबकी आवाज़ें मेरे अन्दर ऐसे प्रवेश कर रही थी जैसे मेरी प्रार्थना को बल देने के लिए ही सब लोग आरती गा रहे हों… मेरी आँखों से झर झर आंसू बह रहे थे और मन में एक ही प्रार्थना, मुक्त कर दो मुझे इस भय से… मुक्त कर दो मुझे इस भय से… प्रभु….

आरती ख़त्म हुई तो मैंने धीरे से आँखे खोली…. और थोड़ा सा पीछे की ओर खिसकी ताकि बाकी लोग भी आगे आकर माथा टेक सके… पीछे खिसकते समय मेरा पैर मेरे पीछे खड़े एक व्यक्ति के पैर से टकरा गया… मैंने बिना देखे ही उनसे माफी माँगी फिर आगे देखने लगी.

थोड़ा सा किनारे होकर फिर पीछे की ओर खिसकी… मुंह मेरा हनुमान की तरफ ही था… मैं फिर उसी व्यक्ति से टकरा गयी.. क्योंकि किनारे में खिसकते हुए मैंने उसके कपड़ों की हल्की सी झलक पाई थी… उसने सिंदूरी रंग का टी शर्ट पहना हुआ था… इस बार मैं पूरी तरह से किनारे हो गयी तो वो व्यक्ति आगे की ओर बढ़ गया…

उसको चलते हुए देखा तो मेरी धड़कने एकदम से तेज़ हो गयी वो ऐसे चल रहा था जैसे कोई वन मानुष या बंदर चलता है… अपने हाथ पैर चौड़े कर, पैर थोड़े से मोड़कर… मैं उसे ऐसे चलते हुए गौर से देख रही थी… उसने धीरे से गर्दन पीछे की ओर घुमाई और मुझे देख कर मुस्कुरा दिया… उसका चेहरा देखकर मैं पूरी तरह कांपने लगी… मैं कभी हनुमान की मूर्ति को देखती कभी उस आदमी की सूरत… जैसी उसकी चाल थी वैसा ही उसका मुंह… बड़े बड़े होंठ और फूली सी नाक… एकदम बन्दर नुमा चेहरा…

मैं मूर्तिवत वहीं खड़ी रह गयी… वो गर्भगृह के एक बार चक्कर लगाकर सीधे मेरे सामने खड़ा हो गया और फिर वही परिचित सी मुस्कान देकर उसी बंदरनुमा चाल के साथ बाहर निकल गया… मैंने पलटकर देखा तो वो मुझे भीड़ में फिर कहीं दिखाई नहीं दिया…

मैं वहीं धम्म से बैठ गयी और कृतज्ञता और अहोभाव से भरकर हनुमान के उस साक्षात स्वरूप को प्रणाम किया… फिर वहां दीवाल पर लिखी हनुमान चालीसा पढ़ने लगी… मुझे यकीन हो गया कि अब मैं इस भय से पूरी तरह मुक्त हो जाऊंगी…

अब मैं दिन भर ठीक रहने लगी थी… इस बीच वज़न और कम होता जा रहा था… एकदम दुबली, मरियल सी हो गयी, चेहरे पर अजीब सा पीलापन आ गया था… चेहरे का सारा ओज ख़त्म हो गया था…

भय तो थोड़ा कम हुआ था लेकिन फिर अक्सर सीने में अजीब सी जलन रहने लगी… इस बीच इनके पास भी एंड्राइड फोन आ गया जो पहले नहीं था… अब इनका whatsapp चालू हो गया… इनके फोन पर whatsapp मैसेज की घंटी बजती और मेरे सीने की जलन आग का रूप ले लेती… मैंने इनसे बहुत बार निवेदन किया आप इस मोबाइल की मैसेज की घंटी को साइलेंट कर दो… तो मुझे पता ही नहीं चलेगा कि ‘उसका’ मैसेज आपके पास आ रहा है…

और ये समझाते… मेरा धर्म आपको आपके भय से मुक्त करना है, भय के कारणों से छुपाना नहीं… अब भी आप जान लो सारे आयोजन आपकी मुक्ति के लिए हो रहे हैं, वर्ना इसके पहले ही क्यों नहीं आ गया मेरे पास ये फोन… आप जानती हैं मैं अपने लिए कभी कोई वस्तु नहीं खरीदता… ये फोन मुझ तक किसी योजना के तहत ही तो पहुंचा है… आप घटनाओं को साक्षी भाव से देखना शुरू करो आपको खुद ही कहानी समझ आने लगेगी… और फिर आप समझ जाएँगी कि कौन किस रूप में कैसा अभिनय कर रहा है और इस नाटक में आपकी भूमिका क्या है…

मैं सब कुछ समझने के बावजूद कुछ भी समझने को तैयार नहीं थी… मेरे सीने की जलन दिन ब दिन बढ़ती जा रही थी… लगता था जैसे किसी ने आग लगा दी हो… फिर जब मौसम की पहली बारिश हुई तो आँगन के आम के पेड़ से आमों की भी बरसात हो गयी…. प्रकृति का स्पर्श बहुत सुकून दे रहा था… हर बार की तरह प्रकृति के आगे हाथ फैला दिए… इस आग को ठंडा करो… मुझे मुक्त करो इस अग्नि से… लगा प्रकृति का कोमल स्पर्श सब कुछ ठीक कर रहा है… मैं खुश थी… इतने में एक बार इनसे नज़र मिली… कुछ भाव आये लेकिन मैंने जानबूझ कर नज़र अंदाज़ कर दिए ताकि फिर इनके किसी प्रयोग में ना फंस जाऊं…

मैं इस सुकून को जी लेना चाहती थी… लेकिन नियति का खेल बंद नहीं हुआ था, या मेरा तथाकथित भय प्रकृति के स्पर्श से अधिक ताकतवर था… तो आम उठाते हुए उस टेसू के पेड़ के करीब जाना पड़ा… मैं जैसे नज़रें चुरा रही थी उस ओर देखने से भी… पहली बार आकर ‘वो’ इसी पेड़ पर चढ़ी थी फिर ‘उसके’ तोड़े हुए फूल इन्होंने ‘उसके’ दूसरी बार आने तक संभाल रखे थे…

लगा जैसे ‘वो’ घूर रही है मुझे… और ताना दे रही है हुंह… अगले साल फिर फूल उग आएँगे इसमें तब क्या करोगी… मैं दौड़कर वापस आँगन तरफ आ गयी, बड़ी उम्मीद से इनसे कहा, आओ आँगन के आम भी उठा लें… लेकिन इन्होंने जैसे तेवर दिखाते हुए कहा- हाँ जाओ बटोर लाओ…

पिछले आम के मौसम में इसी तरह के तूफ़ान और बारिश में हम दोनों ने मिलकर आम उठाये थे… लेकिन आज मैं आँगन में आम बटोरते हुए रो पड़ी… बारिश के पानी में किसी को पता नहीं चला कि दो जगह से बारिश हो रही है… लगा जैसे इस बार ये इन आमों को छुएंगे भी नहीं, बटोरना और खाना तो दूर की बात… क्योंकि ‘उसने’ मज़ाक में एक इच्छा ज़ाहिर की थी कि इस पेड़ के आम इकट्ठे कर वो घर के बाहर बोरी बिछाकर बेचेगी… अप्रत्यक्ष रूप से ‘वो’ आम के मौसम में भी आने की इच्छा ज़ाहिर कर रही थी… लगा जैसे मेरा भय का श्राप मेरे आम के पेड़ को भी लग गया… उसी आम के पेड़ को जिसके छाँव में बैठकर मैंने इनके साथ जीवन बिताने के सपने देखे थे…

तुरंत अन्दर आ गयी… कुछ पल के लिए जो सीने की आग ठंडी हुई थी… अपने दोगुने रूप से मेरे अन्दर समा गयी थी… मैं अन्दर अपने ही घर में परायों की तरह एक कमरे से दूसरे कमरे में घबराई घूम रही थी.. बाहर बच्चे पानी में खेलते हुए किलकारियां मार रहे थे…

मेरी एक एक शंका का समाधान मेरी आँखों के सामने मौजूद था लेकिन जैसे मैंने ही आँखें बंद कर रखी थी.. फिर मैंने सारी उम्मीदें छोड़ दी… आध्यात्मिक स्तर पर तो अब कोई गुंजाइश मेरी तरफ से नहीं बची थी… मानसिक स्तर पर मैंने अभिनय करना शुरू कर दिया है… मैंने ये मान लिया है कि जीवन बस अब ऐसे ही चलना है…

इसलिए तय कर लिया कि जो चीज़ें अफ़सोस बनकर जीवन से चिपकी रहने वाली है, उसको सर पर लादे रहने के बजाय विस्मृत करने का प्रयास करना चाहिए…

छह

तो अब मैं ‘उसकी’ बात तक नहीं करती, इनसे ‘उसकी’ क्या बात हुई ये बताने की कोशिश करते तो मैं ध्यान नहीं देती… लेकिन मेरे पास अब कोई उपाय नहीं था… मुझे उम्मीद थी समय के साथ इसका भार कम हो जाएगा… हाँ वास्तव में नहीं होगा… लेकिन मैं इस भ्रम में जीना सीख जाऊंगी… समय बहुत बड़ी दवा है… साल-दो साल में अपनी कोख के जायों से दूर होने का सदमा कम हो गया था… छः महीने में पिछले जन्म की एक बेटी के साथ हुए कड़वे अनुभव फीके पड़ गए थे… वैसे ही समय के साथ इस घटना को भी मैं किसी पुराने कडुए अनुभव और अफ़सोस की तरह विस्मृत कर दूंगी…

और हर बार की तरह प्रकृति ने एक बार फिर जादू दिखाया… जैसे सब कुछ मेरे लिए ही रचा आयोजन हो और मैं आँखें बंद किये उस भय की भयानकता के पीछे खड़ी हूँ…

एक मित्र की कविता मुझ तक पहुंचाई गयी
“क्या प्यार भी बहरूपिया होता है ?”

वे दो थे,
ना-ना वे दो होकर भी एक थे!
साथ-साथ रहते थे,
प्यार को जीते थे।

“….तुम्हीं ने तो कहा था
मिलकर चलेंगे साथ
अनजानी डगर पर,
लेकर हाथों में हाथ
दूर उस सहर पर।”

एक लंबी लड़ाई लड़ी थी दोनों ने,
अपने-अपने परिवेश से।
बचपन से ही अकेली थी वो।
और लड़का भी भीड़ में,
तनहा सा रहता था।

“तुम्हीं ने तो कहा था ….
उदासी अच्छी नहीं
जब-तब हो चेहरा नम,
ऐसी बे-मौसम की
बारिश अच्छी नहीं।”

उनका मिलना जैसे एक जादू था।
नज़रें जब मिलीं
तो एक पुंज बन गया,
दर्द की नमी सारी
भाप बन के उड़ गयी।

चैन-ओ-सुकूँ की छांव तले
वो रात-दिन रहने लगे।
“तुम्हीं ने तो कहा था …
अनंत तक दौड़ो
मेरे साथ मिलकर,
अनजानी राहों को
मंज़िल तक मोड़ो।”

सबकुछ जब बिलकुल
बाधा से परे हो,
क्यों तब ही कोई
अड़चन आ जाती है !

एक दिन वो लड़की
उसके कांधे लगकर
ज़ोर से सिसक पड़ी
फिर संभलती हुई
रुक-रुक कर बोली।
“सुनो…
मुझे एक बात से डर लगने लगा है।”

“डर….
कैसा ?
किससे लग रहा है !”
लड़के ने पूछा।

“कैंसर !”
वो बोली ।

उस समय तो लड़का चुप रह गया
मगर उसके बाद
हर गुज़रते दिन से सतर्क होता गया।
मिट्टी का मटका
सादा भोजन
तुलसी का अर्क
हल्दी और गोमूत्र !

उस दिन की बात को
लड़की भूल गयी पर
वो न भूल पाया कभी,
…. प्यार जो करता था !

जंक-फूड तज दिया
स्वाद भी बदल दिये।
प्लास्टिक-नानस्टिक छोड़
प्राकृतिक और ऑर्गनिक, घर ले आया।

लड़की जब उससे
इसका कारण पूछती
तब-तब वो हँसकर, बात टाल देता।
सुबह उसे उठाता, सैर पर ले जाता
हर कोशिश करता
ताकि ‘वो’ दुःस्वप्न, सच हो ना पाये !

एक दिन मगर….
उसकी बदली आदतों से परेशान होकर
लड़की ने उसको उलाहना दे डाला।
जाने क्या-क्या बोल दिया
अनजाने में ही।

उसी रात लड़के को
बाहों के रास्ते
सीने से सटा हुआ दर्द उभर आया।
अजीब सा कसैला, जलन भरा दर्द !
जैसे-तैसे उठकर
वो ख़ुद ही चला गया
इलाज़ के लिये, पास वाले अस्पताल !

अगली सुबह जागकर
लड़की ने देखा तो लड़का नहीं दिखा उसे।
चंद पन्ने दिखे बस…
एक छोटी डायरी के
…..फड़फड़ाते छटपटाते
और सांस लेती दिखी
एक अधूरी कविता ….

“तुम्हीं ने तो कहा था …
सपने तो देखा करो
तितली के रंगों से,
जीवन रंगने के लिये
तुम भी तो मचला करो।

किसे क्या हासिल हुआ
ये समझ का फेर है,
तुम्हें कहने का जुनून था
और मुझे तुम्हारा जुनून !”

अचकचा गयी वो,
कविता को पढ़कर
कुछ समझ न पायी
समझकर भी मगर।
डायरी को बंद कर
हौले से फिर
लड़की ने उस पर डोरी लपेट दी।

सुनो…
एक बात पूछनी है तुमसे
क्या प्यार भी बहरूपिया होता है ?
अगर जो ऐसा है
तो आओ मिटा दें….
सारे ओढ़े हुये रूप !
ताकि बाहर आ सके
सच्चा स्वरूप !!
बोलो हाँ ….

– तुम्हारा देव

पूरी कहानी इस कविता में बंद थी… और मैं पता नहीं कहाँ…. बस एक बात याद आई, इन्होंने कहा था – कभी मैं यदि कहीं ना मिलूँ तो समझना मैं ऋषिकेश में हूँ…. और इस कविता के कवि का नाम ऋषिकेश ही है…

ऐसे ही अस्तित्व के रचे इस मायाजाल से जूझती हुई रसोई में काम कर रही थी… बड़ा बेटा आया, कहने लगा… पता है माँ सारे पेड़ सबसे पहले तो खूब लम्बे और सीधे ही होते हैं, लेकिन जब उनमें फल लग जाते हैं तो वो झुक जाते हैं….

मैंने उसे खींच कर गले लगा लिया, उसके मुंह से प्रकृति संकेत दे रही थी… फलदायी वृक्ष हो जाओ… कौन सा अहंकार है जो तुम्हें झुकने नहीं दे रहा? प्रेम को हर रूप में स्वीकारने वाली और बांटने वाली आज किस भय से हृदय को संकुचित किये हुए है???

मैं खुद नहीं समझ पा रही थी… मैं खुद लड़ते लड़ते थक चुकी थी… वो कहते हैं – ‘उसके’ साथ पिछले जन्म का कोई कड़वा अनुभव है जिससे तुम मुक्त नहीं हो पा रही और अस्तित्व ने तुम्हें एक मौका दिया है कि तुम उससे मुक्त हो जाओ.. तुम दोनों में से किसी एक से दूसरे के प्रति कोई गुनाह हुआ है… एक ने माफ़ कर दिया है, दूसरा माफी मिल जाने के बाद भी ग्लानि से ग्रस्त है… मैं समझ गयी थी, गुनाह यकीनन मुझसे ही हुआ होगा तभी ये भय और कुंठा मेरे पूरे अस्तित्व को निगली जा रही थी.

मैं खुद मुक्त होना चाहती थी… कैंसर ही तो कहा था एक दिन मैंने इस भय को… जो दवाई से ठीक नहीं हो पा रहा और मुझे प्रतीक्षा है उस दिन की जब मेरा डॉक्टर मुझे कीमो थेरेपी देगा और मैं ठीक हो जाऊंगी…

बस कीमोथेरेपी को बर्दाश्त कर सकूं उतना ठीक करने का प्रयास है उनका…. जिसमें मेरा सहयोग भी नहीं मिल रहा उनको…

क्रमश:

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