जीवन पुनर्जन्म-3 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए

Ma Jivan Shaifaly

भाग-1, 2 से आगे

जीवन पुनर्जन्म-1 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए

जीवन पुनर्जन्म-2 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए

सात

बहुत नियंत्रण के बाद और इनके आध्यात्मिक प्रयोग और ध्यान विधियों को अपनाने के बाद आक्रामकता कम हो गयी थी… लेकिन हृदय का वो डर पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुआ था… लगता था इनके साथ साथ मुझसे मेरा यह घर भी छीना जा रहा है… मैं घर की दीवारों को दोनों बाहों में थामकर रोने लगती… ऐसे जैसे वो सच में कोई चैतन्य वस्तु हो… और सच में हर निर्जीव वस्तु में चेतना तो होती ही है… आप उसे थामों तो वो भी आपको थाम लेती है… ऐसे ही आम के पेड़ के नीचे खड़े होकर मैं बार बार रो पड़ती… और वो मुझ पर अमृत वर्षा कर देता…

(आम, पीपल, नीम, बरगद जैसे वृक्षों के नीचे आप उनके प्रति प्रेमपूर्ण होकर खड़े हो जाओ तो वो आप पर पानी की बौछार करते हैं, ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव है. इनसे मिलने से पहले जब इंदौर में इनसे फोन पर बात कर रही थी, तब इन्होंने बिना देखे ही बोल दिया था आप जिस झाड़ के नीचे खड़ी हैं उस पर एक पीला फूल लगा है, मैंने ऊपर देखा तो सच में उस पर एक पीला फूल था, इन्होंने कहा तोड़ लो, मैंने गर्दन उठाकर दोनों हाथ ऊपर किये और जैसे ही फूल तोड़ने लगी उसका रस टपक कर सीधा मेरे होठों पर गिरा… इतना मीठा मानों सच में अमृत हो… मैंने तब ही कह दिया था… आप तो सच में साक्षात “जादू” हो)

मैंने फिर आम बटोरने वाली घटना के समय उपजे भाव इनको बता दिए… ये मुस्कुराते हुए कहने लगे… भाई अभी अभी हृदयघात से बचकर आया हूँ, बारिश में भीगकर आम उठाने की रिस्क नहीं लेना चाहता, खांसी हो गयी तो दर्द बढ़ जाएगा…. फिर क्या अपने घर के आमों की आपके हाथों से बनी चटनी नहीं खाई, लौंजी नहीं खाई.. पना नहीं पिया क्या? इन रूपों में आम तो खाया ही है… मेरे ही हाथ का लगा आम है मैं क्यों नहीं खाऊंगा… हाँ यह बात अलहदा है कि मैं कोई भी फल नहीं खाता और ये बात तो आप नौ वर्षों से जानती हो… फिर…

मैंने कुछ नहीं कहा… आगे बात करने का मन नहीं था… अपने ही वहम के कीड़े को बड़ा कर कर के उसे राक्षस का रूप दे देती हूँ फिर खुद ही उससे भयभीत घूमती रहती हूँ…

चुपचाप टीवी वाले कमरे में आकर बैठ गयी… पिछले कई महीनों से टीवी नहीं देखा था… सोचा मन बहल जाएगा… टीवी ही देख लूं… टीवी चालू करते ही गाना बज उठा… ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर, तो पहले आके मांग ले, तेरी नज़र मेरी नज़र…

मैं सुनते सुनते ही रो दी…. पूरा ब्रह्माण्ड मुझे मेरे डर से मुक्त करने के लिए पल पल में जादू दिखा रहा है और मैं… आत्म समर्पण करने को तैयार नहीं… क्यों? मैं नहीं जाती… ये जानते हैं… लेकिन कहते हैं समय से पहले कोई बात मालूम हो जाना भी घातक होता है…

घातक???…

इससे अधिक घातक कोई परिस्थिति मेरे लिए हो सकती है क्या, कि जिसे मैं सबसे ज्यादा प्यार करती हूँ… उस पर हमला कर देती हूँ… उसको गाली देती हूँ… उसको प्रताड़ित करती हूँ …

और वो हर बार मुझे अपनी बांहों में थाम कर कहते… मुक्त हो जाओ जल्दी से इस डर से… और मैं इनकी बाहों में छुप कर फूट फूट कर रो देती… मुझे कभी छोड़ना नहीं, मुझसे कितना भी तंग आ जाओ… मुझे छोड़ना नहीं…

वो माथे पर हाथ रखकर समझाते रहते…. नहीं… कभी नहीं… कुछ भी हो जाए आपको थामे रखेंगे… आपके बिना मैं हूँ ही नहीं… आपको यह बातें मज़ाक लगती है… लेकिन यही सच है.. आप हो तो मेरा अस्तित्व है… आपकी शक्ति के बिना आपका यह शिव सच में शव है…

इन सारी बातों के बीच आस्था की अंतिम डोर मैंने थाम रखी थी… मुझे यकीन था ये मुझे उबार लाएंगे… इसलिए मेरे मन में जो भाव आते जाते मैं इनको बताती जाती क्योंकि इन सारी घटनाओं के बावजूद मेरा इस बात से यकीन ख़त्म नहीं हो रहा था जो इन्होंने मुझे हर बार बतायी कि कोई ऊपरी शक्तियां हैं जो मुझे किसी विशेष और महती कार्य के लिए तैयार कर रही हैं, मैं यदि खुद इस जन्म के मानवीय दुर्गुणों और आत्मा में अंकित पिछले जन्मों के गुनाहों और डर से मुक्त नहीं हो पाऊँगी तो इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी कैसे सम्भालूँगी…

पहले भी कई बार नकारात्मकता के तांडव, भय के आक्रमण, और शारीरिक मानसिक यातनाओं के बीच इनसे याचना कर चुकी हूँ कि कह दो उन लोगों से, उन्होंने गलत पात्र चुन लिया है, मैं जब इतने छोटे से डर से इतनी भयभीत हूँ, मेरे अस्तित्व को ही जो निगल गया, मैं कैसे कोई ज़िम्मेदारी उठा सकूंगी… मुझ पर रहम करो… मुझे निकालो इस माया से… मैं बहुत थक गयी हूँ…

और ये हर बार प्रेमपूर्ण होकर समझाते… आपके अन्दर जो भी दबा पड़ा है उसे बाहर निकालने के लिए ही ये सारे आयोजन है… एक बार इस खेल से पर्दा उठेगा आप कृतज्ञ हो जाएँगी…

और इस बात पर मेरा विश्वास दृढ़ हो गया कि “संसार में मात्र गुरु ही शिष्य के लिए हृदय में सबसे अधिक प्रेम, दया और प्रार्थना रखनेवाला सबसे क्रूर व्यक्ति होता है.” और इसका साक्ष्य आगे आने वाली इस हृदयविदारक घटना से मिलेगा..

ऐसी ही एक रात एक छोटे से नकारात्मक विचार ने फिर मेरे आभामंडल में प्रवेश किया… मैं इनकी तरफ देखती रही… कदाचित साक्षी भाव से देखना सीख गयी थी… मुझे लग रहा था ये जानबूझकर मुझे उकसा रहे हैं… फिर भी मैंने बहुत कोशिश की मैं खुद पर नियंत्रण रखूँ… लेकिन जैसे ये ही नहीं चाहते थे कि मैं नियंत्रित रहूँ… और फिर नकारात्मक शक्तियां एक बार फिर अपने पूरे वर्चस्व के साथ मुझ पर सवार थी… मैं लड़ते झगड़ते… बिस्तर तक पहुँची…

मैं डर के चुप हो भी जाऊं तो ये फिर कोई ऐसी बात कह दे कि मेरी पूरी देह जैसे जलने लगती… और ऐसे में छोटे बेटे का ज़िक्र निकला… और अचानक मेरे मुंह से निकला… मैं इसे भी मार डालूँगी… ‘वो’ इसे बहुत प्यार करती है ना!!!!!!!!!!!!!!

इसके बाद इनकी क्या प्रतिक्रिया थी मैं नहीं जानती… मैं अपने होश पूरी तरह से खो चुकी थी और बस एक दृश्य मेरी आँखों के सामने था कि मैंने ‘उसके’ बेटे को मार डाला है!!!!

मेरे मुंह से अचानक निकला – मैंने ‘उसके’ बच्चे को मार डाला!!! मैंने ‘उसके’ बच्चे को मार डाला!!!

पिछले जन्म का मेरा गुनाह साक्षात मेरी आँखों के सामने था… मेरे भय का कारण आज पता चल गया था…. मुझे उस जन्म की अपनी वो सूरत दिखाई दे रही थी जिस जन्म में मुझसे यह गुनाह हुआ था… मैं उस रात पूरी रात रोती रही….

उन दो-तीन महीनों में मैं कई बार फूट फूट रोई थी… लेकिन उस रात का रुदन मैं खुद देख सुन पा रही थी…. वो आत्मा का रुदन था… वो रुदन एक प्रायश्चित था… मुझे यकीन नहीं हो रहा था… मैं चाहे जैसी भी रही हूँ पिछले जन्म में, लेकिन किसी बच्चे को कैसे मार सकती हूँ…. मैंने उस रात असीम वेदना के साथ अपनी तीनों माँओं को पुकारा… अपनी जन्म देने वाली माँ, मेरे हाथ में कलम थमाने वाली मेरी मानस माँ और जगत जननी जगदम्बा….. वो रात मेरे लिए क़यामत की रात थी…

लग रहा था कि अब मैं सुबह का सूरज नहीं देख सकूंगी… बस कैसे भी अपनी माँ की कोख में फिर से समा जाऊं हमेशा के लिए…

उस गुनाह के बदले में कदाचित ‘उसने’ मुझे माफ़ कर दिया था लेकिन मेरा ग्लानि भाव और डर इस जन्म तक मेरी आत्मा में अंकित रहा… इसलिए जब हम पहली बार रूबरू मिले तो पिछले जन्म का कोई रिश्ता है ये तो समझ आ गया था… लेकिन मेरा वो भय भी साथ में उभर आया था…

Past life regression theory क्या होती है मैं नहीं जानती… लेकिन उस रात समझ आया कि जिसे मैं अभी तक नकारात्मक शक्तियों का आक्रमण समझती रही वो उन सर्वोच्च शक्ति द्वारा किये जा रहे प्रयोग थे जिससे मुझे पिछले जन्म की झलकियां मिले, चेतना में जो भी स्मृति और संस्कार अंकित है वो बाहर सतह पर आ सकें और साथ ही उस गुनाह और भय से मुक्त हो सकूं…

मैं इस बच्चे को मार डालूँगी, ‘वो’ उसे बहुत प्यार करती है ना!! यह वाक्य इस जन्म में नहीं कहा गया था… पिछले जन्म की स्मृति से उभर कर आया था… इसलिए सुबह होते से ही मैंने कोशिश की कि पिछली रात वाली घटना पर कोई ग्लानि भाव उत्पन्न ना हो, इसलिए मैं बहुत सामान्य तरीके से रोज़ की तरह उठी, बच्चों को उठाया, ना रोज़ के दिनों से अधिक दुलार दिखाने की चेष्टा की, ना अधिक क्रोध… क्योंकि मैं इस बात को जान गयी थी.. कि आपका किया हुआ एक एक कर्म और उस कर्म से उत्पन्न भाव आपकी आत्मा में टंकित हो जाते हैं…

पिछले किसी जन्म के गुनाह ने इस जन्म में मुझे इतना भयभीत कर दिया था तो इस जन्म का छोटे से छोटा ग्लानि भाव मुझे आगे भी परेशान कर सकता है… आज गीता में श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए अकर्म का अर्थ समझ आ रहा था… साक्षी भाव से कर्म करने का अर्थ समझ आ रहा था….

(कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।

तेरा कर्म में ही अधिकार है ज्ञान निष्ठा में नहीं। वहाँ (कर्म मार्ग में) कर्म करते हुए तेरा फल में कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी अवस्था में कर्मफल की इच्छा नहीं होनी चाहिये।
यदि कर्मफल में तेरी तृष्णा होगी तो तू कर्मफल प्राप्ति का कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफल प्राप्ति का कारण तू मत बन।
क्योंकि जब मनुष्य कर्मफल की कामना से प्रेरित होकर कर्म में प्रवृत्त होता है तब वह कर्मफल रूप पुनर्जन्म का हेतु बन ही जाता है।
यदि कर्मफल की इच्छा न करें तो दुःखरूप कर्म करने की क्या आवश्यकता है इस प्रकार कर्म न करने में भी तेरी आसक्ति प्रीति नहीं होनी चाहिये।)

मुझमें कोई ग्लानि भाव ना आने पाए इसलिए प्रकृति भी अपना जादू दिखाना नहीं छोड़ रही थी… छोटे बेटे और मेरे बीच के रिश्ते पर प्रकृति, ममता की मोहर लगाती हुई ऐसी जादुई घटनाएं मेरे सामने प्रस्तुत कर रही थी कि मैं प्रकृति की इस अचम्भित कर देने वाली शक्ति के आगे बार बार अहोभाव से भर जाती हूँ…

धीरे धीरे मैं काली के मंदिर जाने लगी थीं.. वहां जब भी जाती बस माँ के सामने यही प्रार्थना करती कि मुझे मुक्त कर दो… इन सबसे… फिर एक दिन ऐसा भी आया जब मैं माँ काली के सामने बैठी थी… और मैंने प्रार्थना की कि वही करो जो सबके हित में हो…

और उस दिन एक चमत्कार हुआ… उस मंदिर के प्रांगण में माँ दुर्गा का मंदिर भी था जिस पर मेरा कभी ध्यान ही नहीं गया… उस दिन प्रार्थना का रूप बदलते ही जैसे मुझ पर माँ की कृपा बरसी… मैं अचानक जगत जननी माँ जगदम्बा के सामने खड़ी थी… और माँ की आँखों से ऊर्जा का कोई रूप मैंने अपने तक आते महसूस किया… मेरे आत्मिक बदलाव की शुरुआत हो गयी थी…

मैंने इनसे पूछा, मुझे क्या करना है, आप लोग क्या चाहते हैं मुझसे.. इन्होंने कहा हम कुछ नहीं चाहते आपसे, हम बस इतना चाहते हैं आप अपने वास्तविक रूप में प्रकट हो जाओ… पूर्वजन्म के सारे अनुभवों और इस जन्म की जो भी मानवीय कमजोरियां आत्मा में गहरे तक धंसी है, उसे मिटा कर फिर निर्मल निश्छल हो जाओ… तभी आपका मोक्ष संभव है…

और उसके लिए मुझे क्या करना होगा…

सिर्फ और सिर्फ ध्यान… एक स्वीकार भाव के साथ… जो कुछ भी है सही है गलत है आप फैसला ना करें… जो कुछ भी है, जैसा है, उसे पूरे मन से स्वीकार करें… आँख बंद करके कूद जाइए… बहुत सारे हाथ प्रकट हो जाएंगे आपको संभालने के लिए…

मैं भय से तो मुक्त हो गयी थी लेकिन एक अजीब गहरी उदासी ने मुझे घेर लिया था…

इस बीच एक कविता लिखी –

वो अंतिम निश्छल और निर्मल हंसी थी उसकी
जब तक उसे पता न था
कि उसे किसी की पीड़ा के लिए
निमित्त बनना है

वो बाद में बहुत दिनों तक रोती रही
कि काश उसका बालसुलभ रुदन
निमित्त बन सके किसी की खुशी के लिए भी

लेकिन समय अंतराल के पहाड़ की
दो जन्मों सी कठिन चढ़ाई को पारकर
उस खुशी को देख पाना उसके भाग्य में नहीं था

तो वो इस जन्म की अपनी पीड़ा की बाड़
लगा आई बची हुई हंसी के चारों ओर
कि नियति फिर किसी की हंसी का
ऐसा दुरूपयोग ना कर सके

ध्यानी लोग कहते हैं
ईश्वर की योजना को क्रियान्वित करने
उसके हाथ बन सकी आप
यह सौभाग्य हज़ारों जन्मों में
किसी एक को मिलता है

वो कल्पना करती है अब
उस ईश्वर की
कि कटे हाथ के साथ
वो इतना बदसूरत भी न लगता
जितना इस सूरत से उसकी सीरत छीनकर बना दिया..

मैंने तय कर लिया था अब मैं कोई सवाल नहीं पूछूंगी… हर बार किसी ना किसी बात से आहत होते रहने से मेरा आत्मविश्वास दिन ब दिन कम होता जा रहा था… और मेरे भय की गुत्थी सुलझ जाने के बाद कुछ नए रहस्य चारों और बिखेर दिए गए थे मेरे सामने…

मैं इस बार उलझना नहीं चाहती थी… सब कुछ साक्षी भाव से देख रही थी… प्रश्न का उत्तर मिलता है तो ठीक, नहीं मिलता है तो भी मैं राजी हूँ… गुरु दुनिया का सबसे कोमल हृदय रखनेवाला सबसे क्रूर मनुष्य होता है… शिष्य को पाताल में गिरता हुआ देखकर भी वो हाथ नहीं बढ़ाता, उसे ऊपर खड़े होकर आदेश देता रहता है – मूर्ख आँख खोल, जहां तू गिरने से डर रहा है, वहां कोई खाई है ही नहीं, ज़रा हाथ तो छोड़ मेरा, नीचे समतल भूमि है…

लेकिन शिष्य बाकी सारी बातें नहीं सुनता… बस वो उस “मूर्ख” शब्द पर अटक कर रह जाता है… मैं इस बार इन शब्दों के मायाजाल में फंसना नहीं चाहती थी…

हर दूसरे दिन वो ऐसा कुछ कह देते… जो मेरे अन्दर नए सवाल पैदा करता… पूछती तो जवाब ऐसे होते जैसे किसी बच्चे को किसी और बात में उलझाकर बहला दिया गया हो… नहीं पूछती तो उसी पर मन अटका रहता.

बस मन की इस अटकन से छुटकारा पाने का एक ही तरीका होता है वो है “ध्यान”

मैं जान गयी थी कि अब ये जीवन भर चलने वाली प्रक्रिया है, किसी विशेष काल में ख़त्म हो जाने वाली नहीं है, जब तक शिष्य को अपने ज्ञान का अहम बना रहता है, गुरु अपना सर्वस्व उसे नहीं सौंप सकता… शिष्य में पहले ही सबकुछ भरा है, जब तक वो खाली नहीं होगा, नई चीज़ें कहाँ से जाएँगी… गुरु को वास्तव में पाना है तो पूर्ण समर्पण के अलावा कोई चारा नहीं… गुरु के सामने इस बात को स्वीकार करना कि हाँ मैं अज्ञानी हूँ… यही शिष्य की शिक्षा का हिस्सा होता है.. इस बीच गुरु जो भी सिखा रहा है वो बस उस बात को स्वीकारने की तैयारी भर होती है…

जिस दिन शिष्य स्वीकार कर ले, हाँ मैं अज्ञानी हूँ, गुरु उसी क्षण पूरा ज्ञान शिष्य में उड़ेल देता है..

इतना सब कुछ जानने के बाद भी मेरे ‘मैं’ ने मुझे इतनी और से जकड़ रखा था कि उसे अपने से अलग करने के सारे प्रयास असफल हो रहे थे… बस अब तो आँख बंद कर ध्यान में यही भाव रहता है… हाँ मैं अज्ञानी हूँ… लेकिन इस भाव में भी अहम होता है… अज्ञानी होने का अहम… इस स्वीकारोक्ति में भी तो अपने अज्ञानी होने का ज्ञान बघारा जा रहा है…

फिर क्या किया जाए..

कुछ नहीं.. कुछ भी नहीं… बस साक्षी भाव बना रहे… जो आ रहा है उसे आते हुए देखो… जो जा रहा है उसे जाते हुए देखो… और इस देखने को भी साक्षी भाव से देखो… शब्दों में साक्षी भाव को कैसे उतारा जाए… जैसे उन्होंने मेरे पिछले सवाल के जवाब में कहा था… आपकी जिज्ञासा आपकी अपनी है… कोई और कैसे उसको शांत कर सकता है… कोई और आपको जवाब देगा भी तो वो उस हिसाब से देगा जिस हिसाब से आपकी जिज्ञासा को समझा होगा… और वो समझ आपके प्रश्न से अलग भी हो सकती है…

आठ

शब्दों का मायाजाल…. बस यही बिखरा पड़ा था मेरे चारों ओर मैं अपने ही विचारों से उपजे शब्दों में उलझती जा रही थी… मैं चुप हो जाना चाहती थी… हर तरह से मौन… विचारों से शब्दों से….

कारण पता चल जाने के बाद भी ‘उसके’ प्रति मेरा विकर्षण कम नहीं हो रहा था, पहले तो मैं औपचारिकतावश ‘उससे’ बात कर भी लेती थी लेकिन ‘उसे’ भी एहसास हो गया था कि मेरी तरफ से कोई भाव ऐसा है जो ‘उस’ तक सकारात्मक रूप से नहीं पहुँच रहा था… धीरे धीरे मुझसे ‘उसकी’ बातचीत बंद हो गयी थी… लेकिन इनके पास ‘उसका’ फोन आता या इनके फोन पर Whatsapp मैसेज की घंटी बजती तो मेरे चेहरे की रंगत उड़ जाती… ये हर समय मुझे इन्फॉर्म करते रहते अभी फलाने दोस्त का सन्देश है, अभी बहन का सन्देश है.. फिर ‘उसका’ आता तो भी बता देते अब ‘उसका’ सन्देश है…

मेरे हृदय में एक सागर मंथन शुरू हो जाता… खुद को बहुत समझाती… इस मंथन में निकलने वाला विष तुम पहले ही निकाल चुकी हो, अब अमृत निकालने का समय है…

मैं याचना के भाव से इनकी तरफ देखती… मैं ‘उसे’ बहुत प्रेम करती हूँ, मैं ‘उसका’ अहित नहीं चाहती, मैं चाहती हूँ ‘उसको’ हमारी तरफ से पहले जैसा प्रेम मिलता रहे… लेकिन मुझसे नहीं हो पा रहा मैं क्या करूं???

भय से मुक्ति के बाद अब मुझे इस ग्लानि भाव ने घेर लिया था कि मैं इनको कैसे ‘उससे’ बात करने से रोक सकती हूँ जब मैं खुद दुनिया भर के लोगों से इतनी स्वच्छंदता से बात करती हूँ… इसी ग्लानि भाव के चलते मैंने अपने सारे करीबी दोस्तों सखियों से बात करना बंद कर दी… खुद को पूरी तरह से अकेला कर लिया… लेकिन ‘वो’ चौबीस घंटे मेरे ख्यालों में रहती… सुबह आँख खुलने से लेकर रात में नींद लगने तक… ‘उससे’ प्रेम और विकर्षण का मंथन मुझे पूरी तरह से मथ चुका था…

इस बीच एक बार इन्होंने मेरे स्वर्गीय पिता की उपस्थिति का अनुभव करवाया और कहा आपको किसी पर यकीन नहीं तो अपने पापा पर यकीन करो, वो हमेशा आपके साथ है, मृत्यु के पश्चात् उन्होंने एक पल के लिए भी अकेला नहीं छोड़ा….

ये कहते, आपके लिए जो भूमिका लिखी गयी है आप बिलकुल उसी अनुसार काम कर रही हैं, अच्छी-बुरी, सामाजिक-असामाजिक पैमाने हमने बनाए हैं, अस्तित्व में ऐसी कोई वस्तु नहीं होती… आपकी जो भूमिका है उसे आप बिना ग्लानि भाव के साक्षी भाव से निभाइए. क्या मैंने आपसे कभी शिकायत की कि आप मुझे ‘उससे’ बात करने से क्यों रोकती हैं, या क्यों नाराज़ होती हैं? आप जब कहती हैं, बात कर लो तब कर लेता हूँ… जब आप कहती हैं, मत करो तो नहीं करता, आपकी इच्छा ही मेरे लिए सर्वोपरि हैं.. आप चाहती हैं मैं ‘उसका’ ख्याल रखूँ तो रख रहा हूँ… ‘वो’ अपनी यात्रा के अच्छे बुरे अनुभवों से गुज़र रही हैं… आप अपनी… ना मैं ‘उसकी’ यात्रा में हस्तक्षेप कर सकता हूँ ना आपकी… बस मदद कर सकता हूँ मुक्ति के द्वार तक पहुँचाने के लिए… तो कर रहा हूँ.. आपका मोक्ष इसी जन्म में होना है… और उसके लिए ही आपको इस पीड़ा को भोगना है लेकिन कृतज्ञ भाव से ग्लानि भाव से नहीं…

इनकी बातें समझ आ रही थी लेकिन भय, ग्लानि, ‘उसको’ तकलीफ पहुँचाने का दुःख, घर के अन्दर की घुटन… सबकुछ मिलजुल कर मुझे अन्दर से खाए जा रहे थे… मेरी उदासी अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुकी थी… जिसकी परिणति हुई आत्महत्या के विचार पर… फिर एक दिन मैंने सुसाइड नोट लिखा… और तय कर लिया कि मैं अब जीना नहीं चाहती… डायरी में नोट लिखकर मैं जैसे ही कम्प्युटर वाले कमरे में आई, जहां ये बैठकर काम कर रहे थे.. मुझे देखते से ही अपने उसी चिर परिचित अंदाज़ में बोले- “मौत से मिलने की इतनी बेताबी?”

मैं एकदम से सकपका गयी… इन्हें कैसे पता चला? फिर खुद ही सोचने लगी ऐसा क्या है जो इन्हें नहीं पता?

मुझे याद आया जब मैंने इनको देखा नहीं था और पहली बार फोन पर भेजे गए मेरे सन्देश के बदले इनका जवाब आया था- “मौत से मिलने की इतनी बेताबी!” तब तो मैं समझ नहीं पाई थी इस बात का मतलब… लेकिन अब नौ साल पहले इनकी कही गयी एक एक बात का अर्थ जीवंत होते देख रही हूँ…

मृत्यु के कगार पर पहुँचते ही इन्होंने नए जीवन के दर्शन करवाए… – आपको याद है नौ साल पहले की वो घटना, आप जब मुझसे नहीं मिली थी तब आपने अपनी एक सहेली का फोटो भेजा था जिससे आप बहुत प्रेम रखती थी लेकिन उसकी आदतों के कारण आपका जीना मुश्किल हो गया था… तब मैंने बताया था… वो आपके पिछले किसी जन्म की बेटी है, जो किसी कारण वश आपका दूध नहीं पी सकी थी जिसकी वजह से शिशु अवस्था में ही उसकी मृत्यु हो गयी थी… जो भी पीड़ा आपने इस जन्म में उससे पाई, वो उसी पीड़ा के फलस्वरूप थी जो उस जन्म में आपके कारण मिली थी… लेकिन फिर भी उसको लेकर आप बहुत दुखी रहती थीं…

आपको याद है दो साल पहले की आपकी यात्रा, जब आपको कहा था आप जिससे मिलने जा रही हैं, वो पिछले किसी जन्म में आपके पिता थे, और आपके कर्मों के फलस्वरूप आपको उनसे सिर्फ बदनामी मिलेगी… और आपकी ज़िद थी कि आप अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से सब ठीक कर देंगी… आप जब लौटकर आईं तो आपके पीछे पीछे उनकी तरफ से आप पर सिर्फ इलज़ाम, और बदनामी के अलावा कुछ नहीं था… याद कीजिये तब आपकी हालत क्या हुई थी… प्रेम के बदले में बदनामी पाकर तब भी आप पीड़ा से गुज़री थीं….

आपको याद है पिछले वर्ष गणेश विसर्जन के दौरान आपको एक बच्चा मिला था… तब तो आपने खुद उसे पहचान लिया था और आपके एक स्पर्श से ही आप दोनों को पिछले सम्बन्ध से मुक्ति मिल गयी थी… तब भी मिलने के सुकून से अधिक आपके मन में अजीब सी उदासी थी.. क्योंकि आप बहुत जल्दी पिछले जन्मों के रिश्तों के साथ मोह में पड़ जाती हैं…

आपको याद है पिछले वर्ष मई में जब “वो” आया था और अपनी वेबसाइट का काम पूरी तरह से उसने अपने हाथ में ले लिया था… तब भी आपने उसे देखते से पहचान लिया था और मुझसे पूछा था आपने – ये आपके पिछले जन्म का बेटा है ना?

और उसके जाने के बाद मैंने आपको बताया था कि मुझ पर इसका पिछले जन्म का क़र्ज़ है, वो लेने आया है…

तो क्या देना होगा हमें – आपने पूछा था..

मैंने कहा था अपनी वेबसाइट…

आप तब भी दुखी हुई थीं, और तब भी आपने प्रयास किया था कि आप अपने प्रेमपूर्ण व्यवहार से उसका वो इरादा बदल देंगी…

तब भी मैंने समझाया था, वो ऐसा कोई इरादा लेकर नहीं आया था, उसको तो पता भी नहीं उसके हाथों क्या होने वाला है… आप नहीं मानी फिर आपने प्रेम से उसका दिल जीतने का प्रयास किया और आपका यह प्रयास ही उस घटना के लिए कारण बना, जिसे आप रोकना चाहती थीं… और फिर अक्टूबर आते आते वही हुआ जो तय था, हमने अपनी वेबसाइट उसके कारण खो दी. आप तब भी कितनी दुखी हुई थीं याद है?

हम घटनाओं को टाल नहीं सकते लेकिन पूर्वाभास हो जाने पर हम उसके लिए खुद को तैयार कर सकते हैं… पुरानी वेबसाइट खोने के साथ ही हम नई वेबसाइट के साथ तैयार थे, लेकिन हमने वो सब कुछ खो दिया था जिस के बल पर हम उस मुकाम पर पहुंचे थे… हमने दस हज़ार लेख खो दिए, और इस कारण हमने उन लेखों के कई लेखक खो दिए, उनकी नाराजगी सही… लेखकों के लेख के साथ बेईमानी के इलज़ाम सहे, पैसा खोया जिसको बनाने के लिए आपने अपनी जीवन भर की पूंजी लगा दी थी… आपने वेबसाइट ऐसे समय पर खोई जब आपकी मेहनत के बदले में पूंजी वापस आना शुरू ही हुई थी… फिर भी हमने हार नहीं मानी फिर से शून्य से काम शुरू किया… मैंने रातों रात नई वेबसाइट तैयार की… जितने लेख बन पड़े रातों रात उसमें भर दिए…

क़र्ज़ तो मेरा था क्योंकि वो मेरा बेटा था… फिर भी आपने भी अपना सबकुछ खोया… क्योंकि मैं हमेशा कहता हूँ हम दो देह के अन्दर एक ही चेतना है… हम अलग नहीं… इसलिए हमारे सुख दु:ख साझा है, हमारे पिछले जन्मों के कर्मों के कारण मिलने वाले सुख दुःख भी साझा है…

इसलिए यदि आप इस बार दुखी हैं तो विश्वास कीजिये मेरी पीड़ा तो आपसे दोगुनी है, आपकी पीड़ा तो है ही, आपको पीड़ा में देखकर क्या मैं खुश रह सकता हूँ… आपको सिर्फ अपनी पीड़ा दिखाई देती है… अपनी पीड़ा में आपने कभी मेरी पीड़ा पर ध्यान ही नहीं दिया… तो मैं यदि ‘उसे’ थामा हुआ हूँ तो सिर्फ इसलिए क्योंकि ‘वो’ मेरा नहीं, पिछले जन्म का आपका रिश्ता है, ‘वो’ तो उसी दिन अपने पिछले जन्मों के कर्मों से मुक्त हो गयी थी जिस दिन पहली मुलाक़ात आपने ‘उसका’ माथा चूमकर आशीर्वाद दिया था… ‘उसकी’ भूमिका तो उसी दिन समाप्त हो गयी थी… बाद में जो कुछ भी आपने भोगा, वो आपकी आत्मा पर पड़े संस्कारों के कारण है… जो न जाने कितने जन्मों से आप सहेजे चली आ रही थी…

मैं फूट फूट कर रो दी…. मुझे बताओ मैं क्या करूं…
बस ध्यान की गहराइयों में उतर जाओ… इस “ध्यान” की भी… उसके अलावा ना आपके पास कोई है, ना इस “ध्यान” के पास आपके सिवा कोई है… और अस्तित्व के प्रति इस अहोभाव और कृतज्ञता से भर जाओ कि आप खुशकिस्मत हैं जो अस्तित्व ने इस पीड़ा के लिए आपको चुना, करोड़ों में कोई एक ऐसा होता है जिसको यह सौभाग्य मिलता है, आप बहुत सौभाग्यशाली हैं, और आपसे अधिक मैं, कि आपकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए अस्तित्व द्वारा मुझे चुना गया…

और हाँ, जो जैसा आ रहा है जीवन में उसे वैसे ही स्वीकार करते जाओ… आपका विरोध अस्तित्व की योजना को बदल तो नहीं सकता लेकिन आप खुद उससे दुखी होते रहे हैं… इस सुख दुःख के चक्र से बाहर आकर सिर्फ और सिर्फ साक्षी भाव से घटनाओं को स्वीकार करेंगी तो आप जिसे जादू कहती हैं, वो सच में आप खुद भी कर सकेंगी…

और अभी तो 17 लोग और आने वाले हैं, आप हर बार इतनी विचलित होंगी तो कैसे चलेगा… इन सब बातों में आप एक सबसे महत्वूर्ण बात क्यों भूल जाती हैं, आपको अस्तित्व द्वारा किसी विशेष योजना के तहत चुना गया है… जब तक आप खुद मुक्त नहीं होंगी पिछले जन्मों के कर्मों से, तब तक आप दूसरों को मुक्ति का मार्ग कैसे दिखाएंगी…

नौ

मैं अर्जुन की भाँति एक बार फिर कई प्रश्नों के साथ इनकी शरण में थी, लेकिन इस बार इन्होंने वास्तव में श्री कृष्ण की भांति अपना विराट रूप दिखाया… मेरी आँखों के सामने कई दिनों तक जैसे एक फिल्म चलती रही… वो सारी घटनाएं जिनकी वजह से मैं पीड़ा में थी उसका रूप बदल चुका था, एक एक घटना के पीछे रचे गए मायाजाल को मेरी ही आँखों के सामने तोड़ा जा रहा था… मैं अपने सामने साक्षात जादू घटित होता देख रही थी…

सबसे पहले ‘उसको’ दी हुई दोनों अंगूठियों के टूटने की खबर आई, घर में अचानक से खूब बड़े बड़े चूहे हो गए… फिर ‘उसके’ आने पर इन्होने विशेष रूप से जो ‘काला’ शर्ट निकलवाकर पहना था, जिसको पहनकर वो काली के मंदिर गए थे, जिसको देखकर मुझे भय लगता था… और जो भी शर्ट इन्होने उन दिनों पहने थे जब ‘वो’ घर आई थी… वो तीनों शर्ट चूहों ने पूरी तरह कुतर दिए… बावजूद इसके कि इनके उन कपड़ों के साथ मेरे और बच्चों के कपड़े भी टंगे थे, उनमें से किसी को भी उन चूहों ने नहीं छुआ…

और भी ऐसा बहुत कुछ घटित हुआ जिसको देखकर मैं अचंभित होती रही… वो सारी घटनाओं के रहस्य मेरे सामने एक एक करके खुलते गए जिसकी वजह से मुझे भय था… मुझे यकीन नहीं आ रहा था भौतिक रूप से दिखाई देने वाली वस्तु, जिसे आप छूकर देख पा रहे हो ऐसी वस्तु भी माया हो सकती है…

हमारे ऋषियों ने संसार को माया कहा है, जीवन को माया कहा है… और मैंने इस माया को साक्षात महामाया के रूप में देखा… जब उस रात इन्होंने मेरी अंतिम प्रार्थना सुनी कि मेरे मन में जो भी भय, जो भी कुंठा, जो भी नकारात्मक भाव, जिस जन्म के गुनाह के कारण है उसे मेरे अन्दर से निकालकर सतह पर ले आइये… उसके बाहर निकले बिना मेरी पूरी तरह मुक्ति संभव नहीं…

मैंने इनके चरणों पर सिर धर दिया… प्रभु आपके अलावा और कोई नहीं मेरा इस दुनिया में, ना मातापिता ना बच्चे… आप ही मेरा जीवन हो आप ही संसार हो… इस स्थिति से मुझे मुक्त करो स्वामी…

मैंने दोनों हाथ याचना भाव से इनके सामने फैला दिए और आँखें बंद कर ली… इन्होंने मेरे दोनों भौहों के बीच अपना अंगूठा लगाया… मेरे चारों तरफ, अन्दर-बाहर रोशनी फूट पड़ी…. अचानक मैंने अपने चेहरे को फूलते हुए अनुभव किया… मैं न जाने कितनी देर तक इसी अवस्था में बैठी रही.. जब आँखें खोली तो इन्होंने कहा, जाओ शीशे में अपना चेहरा देख कर आओ…

मैं उठी और दूसरे कमरे में लगे शीशे के सामने जैसे ही खड़ी हुई… मैं बहुत ज़ोरों से डर गयी…

ये मेरे पीछे आकरे खड़े हो गए… जितना भयानक चेहरा है उतने ही भयानक आपके कर्म रहे हैं पिछले जन्म में, लेकिन इससे डरना नहीं है… इससे उबरना है… और ये सारा आयोजन आपको आपके पिछले जन्म की भयानकता से मुक्त करने के लिए ही था…

लेकिन इसे ठीक होने में एक हफ्ता लग जाएगा…

क्या!! मैं घरवालों को कैसे दिखाऊंगी चेहरा… ये मुस्कुराते हुए बोले… जिसने ये चमत्कार दिखाया है वो आगे भी इंतज़ाम कर देगा… अभी आप निश्चिन्त होकर सो जाइए…

और आप?

मैं तो पिछले तीन महीने से सोया ही नहीं, जाग रहा हूँ आपके साथ .. आज की रात और जागना है… लेकिन आप सो जाइए निश्चिन्त होकर…

मैंने आदेश का पालन किया.. अपना चेहरा टटोलते हुए मैं सो गयी… सुबह काफी जल्दी उठ गयी थी लेकिन चेहरा रात जैसा ही बड़ा सा था… मैं सर पर पल्लू डाले एक कमरे में कम्प्युटर पर काम करने के बहाने छुपे रही…

सूरज चढ़ने के साथ मैंने अपने चेहरे की त्वचा एक जगह से फटते अनुभव किया, हाथ लगाकर देखा तो उसमें से खून निकल रहा था… मैंने सुबह अपना चेहरा देखने के लिए मोबाइल का कैमरा चालू किया तो फोटो ले लिया था, खून निकलता अनुभव किया तो मैं फिर कैमरा चालू किया इस बार चेहरे पर घाव के साथ नील उभर आया था… मुझे याद आया पिछले महीने घर में बुआ सास आँगन में जब गिर पड़ी थी तो बिलकुल ऐसा ही घाव उनके चेहरे पर उभर आया था…

तब मैंने इनसे पूछा भी था… आप कहते हैं ना बिना कारण के कोई घटना घटित नहीं होती उसका कोई न कोई उपयोग आगे पीछे अवश्य होता है, तो फिर ये बुआ का बिना किसी कारण यूं खड़े खड़े गिर जाने के पीछे क्या कारण हो सकता है…

तब इन्होने मज़ाक बनाते हुए कहा था.. अरे आप हर बात के लिए मुझे ज़िम्मेदार क्यों समझती है… भाई मेरा कोई हाथ नहीं इसमें… आज उस घटना का कारण समझ आ रहा था..

दिन चढ़ने के साथ घर के बाकी लोग भी जागने लगे.. मैंने फिर यही कारण बताया कल रात को खाना खाने के बाद मैं और बड़ा बेटा रेस लगा रहे थे, और मेरा पाँव उसके पाँव में उलझ गया और उसको बचाने के चक्कर में मैं गिर पड़ी…

चूंकि पिछले महीने ही बुआ सास को बिलकुल ऐसी ही चोट लगी थी तो इस कहानी पर सबको यकीन हो गया… आस पड़ोस रिश्तेदार सबको यही पता है कि आँगन में रेत पर फिसल कर गिरने के कारण चोट लगी है… बड़े बेटे को भी यही पता था लेकिन उसने एक बार भी किसी के सामने यह सवाल नहीं किया कि आप कब मेरे साथ खेलते हुए गिरीं? फिर एक दिन जब उसके साथ खेल रही थी तब उसने कहा आप दौड़ो नहीं वरना उस दिन जैसे फिर गिर जाओगी…

मैंने पूछा पिछली बार कब गिरी थी?
कहने लगा मुझे ये तो याद नहीं लेकिन आपके चेहरे पर चोट तभी लगी थी ना..

तभी ये पीछे से आकर कहने लगे… चिंता मत करो… कुछ भी हो जाए हम लोग आपकी मम्मा को कभी गिरने नहीं देंगे…

मेरी आँखों में फिर कृतज्ञता के आंसू थे… पिछले जन्म में चाहे जितने कुकर्म किये होंगे जिसकी वजह से ये पीड़ाएं मैंने झेलीं, लेकिन ज़रूर कोई एक ऐसा पुण्य का काम अवश्य किया होगा जिसकी वजह से मैंने इनको पति के रूप में ही नहीं गुरु, पिता, पुत्र और मित्र के रूप में पाया..

बहुत सारी ऐसी घटनाएं इस दौरान हुई जिसको लिखने का आदेश मुझे अभी गुरुओं से नहीं मिला है. लेकिन जिस दिन आदेश होगा वो पुस्तक के रूप में प्रकट हो जाएँगी.

एक हफ्ते के अन्दर चेहरे में अद्भुत परिवर्तन आये, चोट ठीक होने के साथ साथ पिछले तीन महीनों की भयानकता, क्रूरता, ईर्ष्या, कुंठा जिस भी नकारात्मक भाव के कारण चेहरे में बदलाव आया था वो जा चुका था… इससे पहले मेरे चेहरे पर ना इतना ओज था ना जादुई चमक… जो दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है…

और फिर इस पूरी घटना का चक्र ख़त्म हुआ सत्य से साक्षात्कार के साथ. और एक बार फिर इनके जीवन का सिद्धांत मेरे सामने मूर्त रूप में प्रकट हुआ … सत्यम शिवम् सुन्दरम…

और अंत में मुझे याद आए.. 2008 में इनसे मुलाक़ात से पहले के दिन जब इन्होंने अपने ब्लॉग का नाम रखा था “विघ्नकर्ता”… तब भी मैंने पूछा था “विघ्नहर्ता” तो ठीक है विनय+नायक अर्थात विनायक, लेकिन आप खुद को विघ्नकर्ता क्यों कहते हैं…

और इनका जवाब था “विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए”…. सच कहा था … ये सच में विघ्नकर्ता ही है… और मैं खुद इस बात की साक्षी हूँ.. खुद ने अनुभव किया पिछले चार महीनों में विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए……नए “जीवन” के लिए.

अम्मा सपने में जो संकेत दे गयी थी उसका अर्थ आज समझ आ रहा था… पिछले जन्म के रिश्ते जीवन में आते हैं मुक्ति के लिए, उनको खुद से गुज़र जाने दो… उसमें उलझो नहीं… चाहे मेरी भूमिका यही लिखी थी नियति ने लेकिन मेरे इस जन्म के स्वभाव के अनुसार मुझे यह बात स्वीकारने में कठिनाई अनुभव हो रही थी कि मैं कैसे किसी के प्रति इतना विकर्षण रख सकती हूँ… वो भी ‘उसके’ प्रति जिसे पुत्री कहा… यह भाव आते ही मैंने ‘उससे’ एक सन्देश में अपने पिछले जन्मों के कर्मों के साथ इस जन्म में दी तकलीफ के लिए माफी माँगी…

मुझे इस बात के एहसास से ही आश्चर्य हो रहा था कि जब मैंने अपने कर्मों के फलस्वरूप इतनी पीड़ा झेली तो पिछले किसी जन्म में मैंने ‘उसे’ कितनी पीड़ा पहुंचाई होगी… लेकिन हम ‘उसे’ कुछ नहीं बता सकते थे, ‘उसकी’ अपनी यात्रा है जिसे ‘उसे’ खुद तय करना है… लेकिन आज मैंने ‘उसकी’ सारी ज़िम्मेदारी इनके कन्धों पर डाल दी क्योंकि मैं अब ‘उसे’ अपने किसी कर्म के कारण उलझाना नहीं चाहती…

वैसे भी ‘वो’ मेरे लिए सिर्फ पुत्री नहीं… पुत्री तत्व है जो मेरी इस जन्म की बेटियों के लिए रास्ता बनाने आई थी… मैं हमेशा के लिए ‘उसकी’ कृतज्ञ रहूँगी…

और ये कहते हैं आपके लिए होगी ‘वो’ पुत्री, लेकिन मेरे लिए तो माँ है… पूरी तरह से तो मुझे भी ज्ञात नहीं हुआ है लेकिन हो सकता है मैं ‘उसका’ वही पुत्र था जिसको आपने पिछले किसी जन्म में ‘उससे’ छीन लिया था…

उपरोक्त घटनाएं लिखने में मुझे पूरे चार महीने लगे… फिर भी बहुत सारी घटनाएं लिख नहीं पाई… मुझे तो इस बात का भी यकीन नहीं था कि अपने जीवन की हर घटना को शब्दों में उतारने वाली मैं, कभी इन घटनाओं को शब्दों में उतार सकूंगी. लेकिन इनके आदेश और गुरुजनों की प्रेरणा से मेरी ऊंगलियों ने यह काम किया… क्योंकि मैं मानती हूँ जो कुछ भी लिखा गया है वो मैंने नहीं लिखा मुझसे लिखवाया गया है…

मैं प्रणाम करती हूँ अपने परम गुरु “बाबाजी” को जो मुझे नेपथ्य से मार्गदर्शन देते रहे, बब्बा (ओशो) को जो समय समय पर मुझे समझाने आते रहे, मेरे पीर श्री एम को जिन्होंने मुझे मदनापल्ली पहुँचने पर भी दर्शन नहीं दिए, पापा को जिन्होंने हमेशा मुझे थामे रखा और “स्वामी ध्यान विनय” को जो मेरा जीवन भी हैं और मोक्ष भी… अब मुझे मोक्ष ना भी मिले तो कोई दुःख नहीं होगा… मेरे जीवन में इन सब का आशीर्वाद ही सारे जन्मों के लिए पर्याप्त है.

  • माँ काली के चरणों में समर्पित माँ जीवन शैफाली

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