जीवन पुनर्जन्म-1 : विनाश और विध्वंस नए सृजन के लिए

Ma Jivan Shaifaly

एक

मेरे हाथों की ऊंगलियों के पोरों पर रखा था उसका नाम लेकिन मैं की-बोर्ड पर ‘उस’ नाम को टाइप कर फाइल को ‘उसके’ नाम से सेव करने में भी डर रही थी… पांच मिनट तक की-बोर्ड पर भय से भारी हो चुकी ऊंगलियों को रखे रही… नाभि से कोई हवा का गुबार उठ रहा था… लगा जैसे ये गुबार मेरे पूरे अस्तित्व को निगल जाने वाला है… मैंने झट से फाइल को नाम दिया “जीवन”… और लिखना शुरू कर दिया.

पिछले चार महीने से इस भय से लड़ रही थी… भय किसका, मैं नहीं जानती… बस ‘उसका’ नाम या ‘उससे’ सम्बंधित कोई बात सुनते ही सीने में अजीब सी जलन होने लगती… हाथ पाँव ढीले… कंपकपी… अपने मन मस्तिष्क की डोर जैसे मेरे हाथ से छूटती जाती… आँखों में आंसू मिश्रित क्रूरता, क्रोध इतना अधिक हावी हो जाता कि फिर जो सामने आये उस पर आक्रमक हो जाती…

ऐसी स्थित में ये किसी और को मेरे सामने पड़ने नहीं देते… खुद खड़े हो जाते… और इस कोशिश में कई बार मेरे हाथों से घायल भी हो जाते… कभी इनके होठों से खून रिसने लगता, कभी हाथों की उंगलियाँ दर्द से कई दिनों तक दुखती रहती… इतनी कि रोटी के कौर भी नहीं तोड़ पाते थे…

होश आने पर मैं खुद ही तीमारदारी करती रहती, खाना खिलाते समय रोटी के कौर हाथ से तोड़कर थाली में रख देती… कभी होश खो देने पर मुझे आक्रमण से रोकने के लिए वो मुझे अपने बलशाली हाथों से बंधक बना लेते… उनकी ऊंगलियों के निशान कई हफ़्तों तक मेरी बांहों पर पड़े रहते… जिसे रोज़ वो चेक करते कि ठीक हुए कि नहीं…

कौन सा भूत मुझ पर सवार हो गया था मैं नहीं समझ पा रही थी… और वो कहते… सब तुम्हारे भले के लिए ही आयोजित है…

मैं कहती – ये कैसा भला कर रहे हो तुम लोग?

हमारे शहर में एक काली का मंदिर है… कहते हैं तांत्रिक क्रियाओं का गढ़ है, ऊर्जा का केंद्र… एक बार मैं वहां गयी थी… तब तो पता नहीं चला, लेकिन मुझे लगता था जैसे वहां जाने के बाद से मुझ पर कोई प्रयोग शुरू हुआ है… क्योंकि बाद में जब भी वो मुझे उस काली के मंदिर ले जाते तो मुझे माँ काली से भय होने लगता.. मैं बिना प्रणाम किये दौड़ कर मंदिर से बाहर आ जाती… जैसे कोई है जो मेरा अस्तित्व निगल जाने को आतुर है…

फिर लगता, नहीं… इसकी शुरुआत तो उस दिन हुई थी जब एक महिला संगीत के कार्यक्रम में काली के भयानक नृत्य को देखकर अभिभूत हो गयी थी… उस रोज़ पूरी रात सपने में आसमान से छलांग लगाते हुए सिंह दिखे थे… काली के मंदिर तो उसके बहुत दिनों बाद जाना हुआ था…

लेकिन माँ काली से डर? जिसे मैंने हमेशा अपने अस्तित्व से जुड़ा पाया, जिसका विग्रह देख कर कभी मोहित हो जाती थी, लगता था मुझे सारी ऊर्जा माँ काली ही देती है… उस काली से डर!!!!

लगा जैसे, जिस काली में मैं अपना ही स्वरूप देखती थी, मेरा वही स्वरूप अपनी पूरी भयानकता के साथ प्रकट होकर मुझे ही भयभीत कर रहा है. ये महामाया का कैसा प्रकोप था, मैं समझ नहीं पा रही थी क्योंकि कभी मैं बहुत क्रोधित या आक्रामक हो जाती तो वो मुझे कुर्सी पर बैठाकर मेरे दोनों पाँव अपनी छाती पर टिका देते… जैसे माँ काली के क्रोध को शांत करने के लिए शिव को चरणों में लेटा दिया गया था…

दो

पूर्व जन्म का बहुत करीबी रिश्ता, जो इस जन्म में ‘उसके’ साथ सिर्फ और सिर्फ माता-पिता के साथ पुत्री जैसा है लेकिन… पूर्वजन्म का कौन सा गुनाह मुझे भयभीत किये हुए था, मैं समझ नहीं पा रही थी…

हमने एक दूसरे के सारे मित्रों और उनसे प्रेमिल संबंधों को सहजता से स्वीकार किया है… ईर्ष्या जैसी कोई बात ही नहीं … शिव और शक्ति सा हमारा रिश्ता कभी किसी के आने से विचलित नहीं हुआ… लेकिन इस रिश्ते में न जाने पूर्वजन्म का मेरा कौन सा गुनाह मुझे दीमक की तरह चाट रहा था, मैं जान नहीं पा रही थी…

हमने तो वैसे भी ‘उसका’ पुत्री के रूप स्वागत किया था, मेरा हृदय ‘उसके’ लिए हमेशा ममता से भरा रहा… ‘उसे’ अपने हाथों से खाना बनाकर खिलाया… हम दोनों के पास देने के लिए प्रेम के अतिरिक्त कुछ था भी नहीं, तो जब जाने लगी तब हम दोनों ने अपनी ऊंगली से अपनी-अपनी अंगूठी निकालकर ‘उसकी’ उँगलियों में पहना दी और कन्या की तरह ‘उसके’ पैर छूकर विदा किया…

प्रक्रिया तो ‘उसके’ रहते ही प्रारम्भ हो गयी थी लेकिन ‘उसके’ प्रति मेरा प्रेम कभी कम नहीं हुआ… ‘उसके’ जाने के बाद लेकिन मेरा स्वरूप बदलने लगा… पहले मुझे लगा मैं Split Personality का शिकार हो गयी हूँ, जो सुबह कुछ और होती है, और रात गहराने के साथ भयानक होने लगती हूँ… कभी लगता किसी प्रेतात्मा ने मुझे आविष्ट कर लिया है…

वो मुझे ध्यान की गहराइयों में उतरने को कहते, मन में सकारात्मक विचारों को लाने के लिए उन्होंने अपनी जान की बाज़ी तक लगा दी थी… लेकिन मुझे पता नहीं क्यों लगने लगा था मैं उन्हें खो रही हूँ, कोई है जो उन्हें मुझसे छीन रहा है… और मैं जैसे उनको खो देने के डर से मुक्त नहीं हो पा रही थी…

ये जानते हुए कि वो मुझसे कभी अलग नहीं होंगे… हम एक चेतना और दो देह की तरह हैं… वो पूरे समय यही कहते रहे… आप अतुलनीय है, आप खुद से किसी की तुलना मत कीजिये… कोई और आपकी जगह नहीं ले सकता… और मैं यह सच जानते हुए भी, न जाने किस खाई में उतरती जा रही थी जहां अँधेरे के सिवा और कुछ दिखाई नहीं देता…

मैं अपने आप से डरने लगी थी… दिन भर सब ठीक रहता, सूर्यास्त होने साथ नकारात्मकता के काले बादल जैसे मुझे घेरने लगते और मैं कहीं खो जाती और सारी बागडोर उस नकारात्मकता के हाथ में आ जाती…

महीने भर तक यही सब चलता रहा… रात भर हम उस भयानकता से जूझते रहते और दिन में मैं रोते हुए, और वो हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए, एक-दूसरे को बाहों में जकड़े रहते… मैं उन्हें कहती, मुझे किसी तरह का ध्यान करने की आवश्यकता नहीं, बस आप मुझे ऐसे ही अपनी बाँहों में जकड़े रहो… मैं यहाँ आकर सारी पीड़ा, सारा भय भूल जाती हूँ…

वो हंस देते. एक दिन कहने लगे, तुम आतंकवादी हो गयी हो किसी चीज़ का आतंक तुम पर हावी हो गया है… मैंने कहा, नहीं मैं पाकिस्तान हो गयी हूँ तुम हिन्दुस्तान, जो कभी एक ही थे, लेकिन विभाजन की रेखा ने जैसे पाकिस्तान को आतंकवाद की चपेट में ले लिया है और आज पाकिस्तान हर समय भारत पर आक्रमण के लिए चोर रास्ते ढूंढता रहता है और भारत की चेतना वसुधैव कुटुम्बकम के अपने सिद्धांत से डिगने को तैयार नहीं….

कहने लगे, नहीं मैं हिंदुत्व हूँ और तुम इस्लाम… इसलिए तुम्हें मुसलमान लोग इतने प्रिय है… तुम्हें लाहौर पुकारता है… तुम्हें इस्लाम आकर्षित करता है…

हाँ यह सच था… क्योंकि एक दिन अपनी उसी दुर्दशा के साथ मैं सच में जैसे पाकिस्तान पहुँच गयी… भारत की सीमा रेखा से चुपके से… एक पीर की तलाश में जो मुझे ठीक कर दे… पाँव में घर की चप्पल, तन पर साधारण कपड़े, सब्जी लेने के बहाने घर से सुबह-सुबह निकली.. सब्जी का थैला और चंद रुपये लेकर…. लेकिन फिर घर नहीं लौटी…

जीवन में तीसरी बार घर से भागी थी… किसी की तलाश में… पहली बार माता पिता को छोड़ा… दूसरी बार कोख के जायों को… आज तीसरी बार घर छोड़ा था लेकिन पूरी तरह नहीं… लौट आने के लिए… ठीक होकर लौट आने के लिए…. मुझे पता नहीं क्यों ये विश्वास था कि बस अब वो पीर ही मुझे ठीक कर सकता है… तो उसकी तलाश में बिना किसी को कुछ बताये घर से निकल पड़ी…

ये जो बार-बार का भागना होता है ना, वो परिस्थितियों से उत्पन्न असंतुष्टि के कारण नहीं होता, ये किसी तलाश की प्यास होती है… जो हमें बार-बार ये कदम उठाने को मजबूर करती है, ये जानते हुए कि ये भागना अर्थहीन है… जो हम खोज रहे हैं वो बाहर कहीं नहीं है… फिर भी भागना नियति होती है क्योंकि अन्दर कैसे खोजा जाए ये नहीं आता हमें…

बस तो घर से निकल पड़ी उस पीर की तलाश में जो बार-बार मुझे स्वप्न में आते थे और बर्फीली पहाड़ियों के बीच किसी गेरुआ रंग के आश्रम की झलक दिखलाते थे…

घर से स्टेशन… एक शहर से दूसरे शहर… उस पीर के शहर तक पहुँचने के लिए… रास्ता नहीं जानती थी… लेकिन लोग जादुई रूप से मिलते गए और आगे का रास्ता बताते गए… एक फ़ौजी तो मुझे ट्रेन में अपनी सीट यह कहकर देने को तैयार हो गया कि आप अधिक आवश्यकता में लग रही हैं, आप मेरी टिकट पर चले जाइए… लेकिन फिर जब उसे पता चला कि मुझे कहाँ पहुंचना है तो अपने दोस्त से फोन पर बात कर सीधे वहां तक पहुँचने के लिए ट्रेन का अता पता करवा दिया, अपना फोन नंबर तक दे दिया ताकि कोई मुसीबत आए तो मैं उससे संपर्क कर सकूं…

बस अब मुझे यकीन हो चला था कि हो न हो वह पीर मुझे देख पा रहा है और मेरा मार्ग दर्शन कर रहा है… ताकि मैं उस तक पहुँच सकूं… मेरा विश्वास, मेरी आस्था, मेरा समर्पण बढ़ता जा रहा था….

क्योंकि मैंने पढ़ रखा था कि ये संत, पीर लोग और उनके सिद्ध अनुयायी अदृश्य रूप में हमें मार्गदर्शन देने के लिए हमारे बीच ही रहते हैं और इनके पास इतनी सिद्धि होती है कि ये जो चाहे रूप धर सकते हैं… तो मुझे विश्वास हो चला था कि हो न हो ये वही लोग है… मैं उनकी आँखों को गौर से देखती और जब वो मुझे ऐसे देखते हुए देखते तो मैं मुस्कुरा देती जैसे मैंने उनको पहचान लिया है कि वे कौन हैं…

दो दिन की कठिन यात्रा के बाद मैं उस पीर के आश्रम पहुँच ही गयी लेकिन रात को दो बजे…. स्टेशन से आश्रम का रास्ता… रात का समय… अंधेरी गलियाँ… लेकिन मुझे विश्वास था इन सब के बावजूद मुझे कोई अड़चन परेशानी नहीं आयेगी…

उस सड़क तक पहुँचने के बाद आश्रम और अन्दर था… तो जिस ऑटो में बैठकर स्टेशन से आश्रम तक आई वो ऑटो चालक मुझे अन्दर तक छोड़ने आया, और जब तक आश्रम का कोई रहवासी नहीं दिखा तब तक मेरी सुरक्षा में खड़ा रहा…

मैं जब अंधेरी गलियों से होते हुए आश्रम के दरवाज़े तक पहुँची तो आश्रम का पालतू कुत्ता मुझे देखकर मेरी ओर दौड़कर आया… मैं कुत्तों से इतना डरनेवाली, इस बार बिलकुल नहीं डरी… वो कुत्ता मेरे पैर चाटने लगा… मेरे हाथ की तरफ बार-बार अपना मुंह उठाकर अजीब सी आवाज़ निकालता जैसे मुझसे कुछ कहना चाह रहा है… तभी वहां का चौकीदार आया और कुत्ते को आवाज़ लगाकर वापस आने को कहने लगा…. चौकीदार को देखने के बाद ऑटो चालक वहां से चला गया…

लेकिन वो कुत्ता जैसे मुझे पहचान रहा था और मुझे छोड़ने को तैयार नहीं था… इतने में आश्रम की एक सेविका अपने घर से निकलकर मुझ तक आई… मेरे इतनी रात को आने का कारण पूछने लगी…

मैंने उसे पीर के बारे में बताया और कहा मेरा मिलना बहुत ज़रूरी है…

उसने कहा वो अभी आश्रम में नहीं है… कुछ दिन के लिए अपने घर गए हैं… मैंने घर का पता माँगा उन्होंने देने से मना कर दिया… मैं बहुत गिड़गिड़ाई मुझे एक बार मिलने दीजिये… उन्होंने कहा नहीं, वो अभी कहीं नहीं है… वो इस समय किसी से नहीं मिलेंगे… उनका जीवन इतना सार्वजनिक नहीं है कि कोई भी आकर मिल ले…

मैंने उनको बहुत समझाया कि मैं उनके आध्यात्मिक जगत से सम्बन्ध रखती हूँ.. मुझे एक बार मिलने दीजिये वो खुद बता देंगे… वो नहीं मानी.. आधी रात का समय था, मेरे पास लौटने के लिए कोई साधन नहीं था… रात मुझे वहीं बिताना थी तो मैं आश्रम के बाहर बनी एक छोटी सी बेंच पर लेट गयी… मानों पीर के चरणों में लेटी हूँ… पिछले एक महीने के भयावह अनुभव के बाद वो पहली रात थी… जब पीर के दर्शन न होने के बावजूद मन में इतना सुकून और शान्ति थी… कोई भय नहीं था…

रात भर वो कुत्ता मेरी रखवाली करता हुआ उस आश्रम के बाहर बैठा रहा… सुबह छः बजे सूरज की पहली किरण और ठंडी हवाओं के बीच आँख खुली तो सामने मैंने एक अन्य स्त्री को खड़ा पाया… उसके हाथ में दो छोटे छोटे अमरुद थे… उसने बड़ी आत्मीयता से प्रसाद की तरह अमरुद देते हुए कहा… ये तुम्हारी अपनी यात्रा है… चाहो तो तुम उस शहर चली जाओ जहां आजकल वो पीर निवास कर रहे हैं… लेकिन मैं उनका पता तुम्हें नहीं दे सकती.. वो अभी किसी से नहीं मिलेंगे…

मेरा मन नहीं मान रहा था… मैंने अमरुद लिए और उस शहर की ओर जाने वाली बस में बैठ गयी… बस का सफ़र मुझे अभी तक याद नहीं… क्योंकि मुझे एक जगह से दूसरी जगह ऐसे ले जाया जा रहा था जैसे मैं कोई स्वप्न में यात्रा कर रही हूँ… मुझे बिलकुल याद नहीं मैं किस तरह से बस का सफ़र तय करके पीर के शहर पहुँच गयी…

शहर के बस स्टैंड पर उतरकर मैं सबको पीर का पता पूछती रही… लेकिन दुनिया भर में प्रसिद्ध उस पीर को जैसे दुनिया की याददाश्त से भी मिटा दिया गया था… ताकि मैं उन तक पहुँच ना सकूं… क्यों? मैं नहीं जानती… मेरी नियति शायद यही थी… मैं पूरी तरह निराश हो चुकी थी… मेरे पास अब एक ही रास्ता बचा था और वो रास्ता घर की ओर लौटने का था… घर लौटने के लिए मुझे रेलवे स्टेशन तक आना पड़ा…

दोपहर से पहले ही मैं स्टेशन पहुँच गयी थी… लेकिन मेरे शहर को जाने वाली ट्रेन रात की थी…

किसी को यकीन नहीं आयेगा… लेकिन इन तीन दिनों की यात्रा में मुझे पानी तक नहीं खरीदना पड़ा… खाने की व्यवस्था तो ऐसे हो रही थी जैसे वो पीर दिखाई न देते हुए भी मेरे साथ थे और मुझे संभाले हुए थे… रेल के सफ़र में एक सहयात्री ने मुझे अपना आधा खाना देते हुए कहा आप खा लीजिये मेरी माँ ने बहुत सारा खाना रख दिया है मेरे लिए… मैं आश्चर्य से उसका मुंह देखने लगी… मुझे नहीं पता क्या सोचकर वो मुझे अपना खाना दे रहा था… मेरे ऐसे देखने पर उसने कहा चिंता मत कीजिये मैं मुस्लिम ज़रूर हूँ लेकिन हम शुद्ध शाकाहारी लोग हैं, हम अंडा तक नहीं खाते…

मैंने अपने दोनों हाथ उसके सामने फैला दिए और कहा – नहीं मेरे दिमाग में ऐसा कोई विचार नहीं था… मैं उसे कैसे बताती कि ये हमेशा मुझसे कहते थे, दो समय की सिर्फ आठ रोटी का तो सवाल है जहां खड़े हो जाएंगे लोग प्रेम से खिला देंगे… उनकी बातों को आज तक सिर्फ बातें समझने वाली मैं उन बातों को सच होता देख रही थी…

मैं उलझन में पड़ गयी थी… मेरे लिए ये सारी व्यवस्था कौन कर रहा है… वो पीर या ये.. अक्सर तो कहते हैं… आप मुझे तो पहचान नहीं पाई अभी तक, पीर को क्या पहचानोगी… मैं वो सारे जादू याद करने लगी जो इनके मेरे जीवन में प्रवेश के बाद हुए थे, जिसकी वहज से मैंने इनका नाम ही “जादू” रख दिया था…

एक तरफ यही जादू है, दूसरी तरफ इसी जादू के कारण हो रहा भय… अचानक मेरी सोचने की क्षमता ख़त्म हो गयी… मैं फिर उसी भय के मायाजाल में खुद को घिरा पाने लगी…

मैं वास्तव में तो भारत में ही थी लेकिन मेरे चारों तरफ सिर्फ और सिर्फ मुस्लिम लोग थे, इसलिए मुझे लगा जैसे मैं सच में सरहद पार आ गयी हूँ… शायद मेरे पीर का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ है इसलिए… या किसी जन्म में मेरा इस मज़हब की राह से गुज़रना हुआ है…

वह खाना देनेवाला सहयात्री मुझे जाते हुए में मिला था, और उसे पता नहीं मुझे देखकर क्या लगा उसने मुझे अपना फोन नम्बर देते हुए कहा, आप यदि अपने गंतव्य स्थल तक ना पहुँच पाओ तो मुझे फोन कर दीजियेगा, मैं पास में ही रहता हूँ, मैं पहुँचा दूंगा… फिर बड़े झिझकते हुए उसने मुझे पूछा आपको पैसों की ज़रुरत तो नहीं…

मैनें कहा- नहीं, मुझे पैसों की ज़रूरत नहीं है… जिनसे मिलने निकली हूँ वो देख रहा है सारे इंतज़ाम… हालांकि मुझे नहीं पता था कितने रुपये खर्च होने वाले हैं, मेरे पास सिर्फ 1000 रुपये थे…

खैर इन चार दिनों में सिर्फ एक बार खाना खरीदा मैंने स्टेशन से, 20 रुपये में चार रोटी और दोने में आलू की सब्ज़ी, जिसमें आलू कम और पानी अधिक था… वहीं बैठकर दो रोटी सब्ज़ी से खाई और दो रोटी और साथ में मिले नमक मिर्च को पेपर में बाँध के रख लिया, ये सोचकर पता नहीं अगले भोजन का क्या इंतज़ाम हो… फिर दूसरे भोजन के समय बची दो रोटी उसी नमक और मिर्च से खाई… हालांकि रोटी तब तक पापड़ हो चुकी थीं…

लेकिन भोजन का महत्व और माँ अन्नपूर्णा का आशीर्वाद क्या होता है इन चार दिनों में जाना…. ये मेरी यात्रा का हिस्सा था जिसने जीवन के बहुत सारे सवालों के जवाब दिए… एक चमत्कार यह भी देखा कि इन चार दिनों में कोई व्यवस्था न होने के कारण भी नित्यकर्म के लिए परेशानी नहीं झेलना पड़ी… मेरी इस शंका का समाधान हुआ जो मेरे मन में यह प्रश्न उत्पन्न करता था कि एक महिला की आध्यात्मिक यात्रा किस मायने में पुरुष की आध्यात्मिक यात्रा से अलग होती है.

तीन

उस दिन लौटने की ट्रेन शाम सात साढ़े सात की थी, और मैं दिन के समय स्टेशन के आसपास घूम रही थी… मेरे पास घर पर संपर्क करने का कोई साधन नहीं था… मोबाइल भी नहीं, और मुझे इनका फोन नंबर भी याद नहीं था… फिर मुझे याद आया इन्होंने बच्चों को फोन नंबर याद करवाने के लिए उसे गाकर सिखाया था… मैंने उसी तर्ज़ पर फोन नंबर को गाना शुरू किया… दो तीन बार के अभ्यास के बाद मुझे वो नंबर उस गाने की तर्ज़ पर याद आ गया…

मैंने लगभग गाते हुए फोन नंबर एक पब्लिक बूथ से डायल किया… फोन वाला मुझे आश्चर्य से देख रहा था, शायद मुझे पागल भी समझ रहा हो.. क्योंकि चार दिनों से सर पर कंघी नहीं की थी… मुंह तक नहीं धोया था… कपड़ों की हालत भी बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन मैंने उसे फोन के लिए पहले ही पैसे हाथ में पकड़ा दिए तो उसे संतुष्टि हुई…

मैंने फोन लगाकर इनको बस इतनी खबर दी कि रात को ट्रेन है… सुबह घर पहुँच जाऊंगी… इनको सामने से कुछ मौका दिए बगैर ही फोन रख दिया… फोन वाला मुझे अभी भी उसी तरह घूर कर देख रहा था… इस बार मुझे भी यकीन हो चला था कि शायद मैं पागल हो गयी हूँ, वरना ऐसे कोई बिना बताये घर से इतनी दूर निकल कर सड़कों पर क्यों मारा मारा फिरेगा… वो भी मेरे जैसा व्यक्ति…

मैं… मैं… लेकिन जैसे मैं अपने मैं को भूल गयी थी… मुझे अपना ही चेहरा याद नहीं आ रहा था… मैं ऐसे ही पागलों की तरह स्टेशन के आसपास के रास्तों पर भटकती रही… इस बीच शायद किसी बस में बैठकर कहीं और भी गयी थी पीर की तलाश में लेकिन मुझे यात्रा का वो हिस्सा याद नहीं आ रहा… बस झलक भर याद है…

बहुत अच्छे से जो याद है, वो किस्सा है स्टेशन के पास बनी मज़ार पर मेरे पहुँचने का… घर फोन करने के बाद मैं जब दोबारा स्टेशन पहुँची तो उस भय और कुंठा ने दोबारा मुझे घेर लिया था… मैं दोबारा उस फोन बूथ को खोजने स्टेशन से निकल पड़ी ताकि घर फोन लगा सकूं और इनसे प्रार्थना कर सकूं कि घर पहुँचने से पहले मुझे ‘उसके’ भय से मुक्त कर देना… अपना फिर कोई जादू दिखा देना… मुझे ‘उससे’ कोई शिकायत नहीं, कोई नफरत या ईर्ष्या भी नहीं, बस हृदय में ज्वालामुखी सा धधकता ये भय और गले तक फंसी हुई कोई कुंठा…. या कुछ और मैं नहीं जानती लेकिन.. पता नहीं क्या हुआ था कि ‘उसके’ जाने के अगले ही दिन मैं घर से यूं निकल पड़ी थी…

खैर टेलिफोन बूथ तो नहीं मिला जैसे उसे भी जादुई रूप से वहां से गायब कर दिया गया था, या मुझे उसी बेहोशी जैसी अवस्था में उस गली में मोड़ दिया गया था जहाँ पर वो मज़ार बनी थी… जैसे जैसे मैं उस मज़ार की ओर बढ़ती वैसे वैसे मेरी साँसों में लोबान की खुशबू भरती जाती… मेरा सारा भय और कुंठा जैसे प्रार्थना में तब्दील हो गयी… मैं अपने दोनों हाथ उठाये उस मस्जिद नुमा इमारत जिसमें मज़ार थी, के अन्दर चलती रही… मुझे होश नहीं था कौन मुझे देख रहा है कौन नहीं… गंदे और उलझे बालों को छुपाने के लिए दुपट्टा मैंने मुस्लिम लड़कियों की तरह सर पर बाँध रखा था, माथे पर बिंदी भी नहीं थी…

मैं जिस तरह से दोनों हाथ प्रार्थना में उठाये अन्दर प्रवेश कर रही थी, कोई भी मुझे देखकर मुझे मुस्लिम ही समझता… मज़ार तक पहुंचकर मैं घुटनों के बल गिर पड़ी, आँखों में आंसू की धार… मुझे क्या कहना है, क्या मांगना है, कुछ नहीं जानती थी… बस अपना दुपट्टा उसके सामने फैला दिया… उसने जो देना था दे दिया…

होश आया तो देखा वहां पर भोजन चल रहा है… बड़े से भगोने में शोरबा था, उसमें मटन था या चिकन मैं नहीं जानती… रुमाली रोटी और चावल बंट रहे थे… सब बाजू में रखी प्लेट उठाकर खड़े हो जाते और देने वाले उसमें खाना भर देते…

मेरे हाथ भी जैसे अपने आप ही उस प्लेट के ढेर की ओर बढ़ गए… एक प्लेट उठाई और परोसने वालों के सामने हाथ बढ़ा दिए…

रोटी चावल शोरबा साथ में जो भी था सब मेरी प्लेट में था… मैं वहीं सबके साथ खाने बैठ गयी… एक बार भी ख़याल नहीं आया कि मांसाहार छोड़े मुझे कई साल हो गए हैं, ये भी ख़याल नहीं आया कि मैं मांसाहार कर रही हूँ… इस समय जिस भाव दशा में थी मेरे लिए मातारानी के प्रसाद और मज़ार पर बंट रहे प्रसाद में कोई फर्क नहीं था.. मैं उसी भक्ति भाव से उसे ग्रहण कर रही थी जैसे किसी भंडारे के प्रसाद को किया जाता है…

वहां से निकलने लगी तो दरवाज़े पर बैठे एक शख्स ने कहा, जाओ उस पेड़ के पीछे अम्मा मिलेगी उनसे मिल लो…

मैं अचंभित सी उस शख्स को देखती रही… उन्होंने दोबारा इशारे से कहा… जाओ…

मैं उस ओर जाने लगी… पेड़ की आड़ के कारण मुझे कोई दिखाई नहीं दे रहा था… हाँ, कुछ मुस्लिम औरतें बुरका पहने आपस में बतिया रही थीं…

मैं जैसे जैसे पेड़ के करीब पहुँच रही थी मेरी दिल की धडकनें तेज़ हो रही थी… पेड़ तक पहुँचते ही एक उजले चेहरे और भूरी आँखों वाली बुर्के वाली महिला सामने खड़ी मिली… उसके एक हाथ में हरे रंग की स्फटिक की माला थी.. आँखों में इतना तेज कि जैसे दो सूरज चमक रहे हो…. मुझे समझ नहीं आ रहा था मुझे क्या करना है… बस मैं उसकी आँखों से सम्मोहित होती जा रही थी… वो मुझे देखकर मुस्कुरा रही थी…

तभी एक मुस्लिम युवक आया, उसने झुककर अम्मा का हाथ थामकर उसे चूम लिया…

मैंने सवाल भरी दृष्टि से अम्मा की तरफ देखा… मैं भी कर लूं ऐसा?

उसने अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिया… मैंने लगभग रोते हुए उसका हाथ चूमा और उठाकर अपने माथे पर रख लिया… मुंह से बस इतना निकला… अम्मा…. इस दिमाग का कचरा साफ़ कर दो…

वो जोर से हंसने लगी… कचरा??? और फिर मेरे माथे पर अपनी ऊँगलियाँ फेरने लगी… मैं लगभग बिलखते हुए वहां से दौड़कर स्टेशन की तरफ लौट आई…

(फिर एक बार मेरे स्वप्न में आई थीं ये अम्मा. मेरी खराब हालत को ठीक करते हुए एक बार इनको माइनर हार्ट अटैक हुआ था… पूरे सीने में अजीब सी जलन थी, मुझे संभालते हुए इनकी पसलियों में भी कुछ चोट आई थीं. उन्हीं दिनों अम्मा ने सपने में आकर समझाया था कि पूर्वजन्मों के रिश्तों से जब मिलना हो तो उनसे बिलकुल सहजता से मिलते हुए उनको अपने से गुज़र जाने दो, उनकी वजह से आप जितना विचलित होंगे, उतना वो आपको दुःख देंगे… और फिर इनके सीने पर हाथ फेरते हुए अचानक जैसे कोई वस्तु निकालकर ज़ोर से फेंक देती है… और मेरे इस सपने के कुछ दिन बाद इनके सीने की तकलीफ और पसलियों का दर्द वास्तव में ख़त्म हो गया था).

क्रमश:

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2 COMMENTS

  1. pranam ma, apke aur swami dhyan vinay ka ye samwad ki jeene ke liya kya chahiye sirf 8 roti hi. jaha khade ho jayege mil jayegi. sach me in sabdo ko kahne ki taqat sabne nahi hoti….ye kahne ki himmat me kai din se juta raha hu..lekin nahi kah pata. kyoki kahne ka matlab hai ap use sweekar karne ko raji ho. ap dono ka astitv ke parti itna viswas dekhkar aankho se aansu aa gaye…
    me osho family se hu… sanasarik name sanjay sen.. aur osho family me mera name- swami dev darshan hai. ap bahut achcha likhti ho. apke lekh kafi prerna dete hai. ahobhaw sahit… pranam

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