धर्मान्तरण के छल – 2

गांधीजी ने लिखा था – “5000 विदेशी फादर प्रतिवर्ष 20 करोड़ रुपए भारत के हिन्दुओं के कन्वर्जन पर खर्च करते हैं. अब विश्वभर के 30,000 कैथोलिक आगामी  नवम्बर (1937) में मुम्बई में इकट्ठा होंगे, जिनका उद्देश्य अधिक से अधिक भारतीयों पर विजय पाना है. (देखें, हरिजन, 6 मार्च 1937)


गांधीजी ईसाइयत को बीफ एण्ड बीयर बोटल्स क्रिश्चियनिटी कहते थे. उन्होंने भारत में ईसाई मिशनरियों के प्रयास  का उद्देश्य हिन्दुत्व को जड़मूल से उखाड़कर उसके स्थान पर एक दूसरा मत थोपना कहा. उन्होंने यह भी कहा कि यदि मेरे पास विधान बनाने की शक्ति होती तो मैं निश्चय ही सभी
प्रकार के कन्वर्जन पर प्रतिबंध लगा देता.

जिस प्रकार इस्लाम में गैर-मुस्लिमों को ‘काफिर’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है, उसी प्रकार ईसाईयों द्वारा सनातन धर्मियों को ‘पैगान’ कह कर नीचा दिखाया जाता है. वास्तव में इन दो पंथो जैसा विस्तारवादी विश्व में कोई अन्य पंथ नहीं है.

ईसाई मिशनरियों ने सबसे पहले यूरोप और उत्तरी अफ्रीका की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का विनाश किया जिनमें यूनानी, मिस्री, कैल्टिक, गोथिक, वाइकिंग और रोमा सहित सैकड़ों सभ्यताएं हैं. यूरोप की औपनिवेशवादी ताकतों ने जब विश्व के तमाम हिस्सों में कब्जा करना शुरू किया तो उनके साथ चर्च की रणनीति और सभ्यताओं का विनाश करने और इस कृत्यों को सही साबित करने का बहाना भी साथ था.

दक्षिणी अमेरिका की माया सभ्यता और अटजेक सभ्यताओं का समूल विनाश करने का काम तो ईसाई मिशनरियों ने खुद स्वयं किया और वहाँ के मंदिरों से सोना, चाँदी व बहुमूल्य मूर्तिओं को लूटा व मंदिरों को तोड़ दिया. इसी प्रकार चर्च ने मेक्सिको और उत्तरी अमेरिका के मूल इंडियन निवासियों की जनसंख्या और सभ्यता को भी विनष्ट किया गया. सभ्यता का ही बहाना बना कर यूरोपीय ईसाइयों ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को तो पूरी तरह से ग़ुलाम बना लिया और उनकी एक पूरी पीढ़ी को खतम कर दिया. हमारे देश में भी इनके मंसूबे ऐसे ही लगते है.

भारत में इन फरेबियों ने एक क्रिस्चियन ब्राह्मण सेवा समिति भी बना रखी है, ताकि ब्राह्मणों की सामाजिक प्रतिष्ठा का उपयोग धर्मान्तरण हेतु किया जाए. ईसाइयों में जाति व्यवस्था नहीं है तब भी कुछ पादरी स्वयं को क्रिश्चन ब्राह्मण कहते हैं और स्वामी दयाप्रकाश, आत्मानंद टाईप के नाम रख लेते हैं. गेरुआ या पीला वस्त्र पहन, रुद्राक्ष की माला धारण कर लोगों को ईसा-दीक्षा देते हैं. इन्होने चेन्नई में क्रिश्चन ब्राह्मण समिति रजिस्टर्ड भी करा रखी है.

गौर से देखिए यह हिन्दू संत नहीं पादरी है , लेकिन यह दलित भी धोखा खा गया आपकी तरह –

कर्णाटक का चर्च जिसमे ईसामसीह को तीन सिरवाले ब्रह्मा के रूप में दिखाया गया है

झारखंड के सिंहभूम जिले के सिंगपुर इलाके में ‘सरना’ जनजाति के बंधु निवास करते हैं. यहाँ पर एक चर्च बनाया गया है जिसमें मदर मेरी की मूर्ति को सरना स्त्री जैसी परंपरागत साड़ी में दिखाया गया है. जनजातीय समाज इससे भ्रमित होकर चर्च जाने लगा और वहां उसे झूठी कहानियां सुनाकर धीरे धीरे ईसाई धर्म में परिवर्तित किया जाता है.

यही नहीं इन पादरियों ने माँ मरियम्मा के स्तुति भजन बना लिए हैं जो ऊपरी स्तर पर हिन्दू भजन लगते हैं लेकिन इनके अर्थ में मदर मेरी की उपासना है.
देखें यू ट्यूब
अम्मा अम्मा माँ मरियम्मा https://www.youtube.com/watch?v=SzuhNKIMzm4

जननी मरियम्मा https://www.youtube.com/watch?v=s-UVZzX-VdQ
अम्मा ओ मरियम्मा https://www.youtube.com/watch?v=lNSrzVEGQDw

क्या बाइबिल में मदर मेरी के साड़ी पहनने, मुकुट लगाने या उनका नाम मरियम्मा होने का वर्णन है? क्या बाइबिल में ईसा मसीह के भगवा वस्त्र पहनने, तीन सिर या चार हाथ वाला होने, शेषनाग पर बैठने, तपस्या या योग करने का वर्णन है? यदि नहीं तो भारत में ईसाई मिशनरियाँ यह सब क्यों कर रहीं हैं? इस चर्च की बाहरी दीवार देखिये, हिन्दू प्रतीकों का उपयोग भ्रमित करने के लिए किया गया है.

पादरियों द्वारा रचित कुछ बेसिरपैर की कहानियां देखिये जो अशिक्षित व वनवासियों को सुनाई जाती हैं :

गणेश अर्थात गण + ईसा. प्रभु ईसा के गण है भगवान गणेश. माँ मेरी ने माँ गौरी के रूप में गणेश को पाला.

प्रभु ईसा ने अपना क्रूस शिव को दिया, जिससे शिव ने त्रिशूल बनाया.

गौतम बुद्ध और शिव के गुरु प्रभु ईसा थे. बोधगया में तपस्या के फलस्वरूप बुद्ध को प्रभु ईसा ने दर्शन दिए और कहा जो मुझको पूजेगा वह तुमको भी पूजेगा. ईसा ने शिव की भक्ति से प्रसन्न हो कर त्रिशूल प्रदान किया.

[इसे भी पढ़ें- धर्मांतरण के छल -1]

हिन्दू धर्म में विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता की पूर्ण गारंटी दी गई है. कोई भी व्यक्ति विवेक, नैतिक तथा सैद्धांतिक चिंतन के आधार पर व्यक्तिगत रूप से अपनी आस्था के अनुसार कोई भी सम्प्रदाय, मत, पंथ उपासना एवं पूजा को अपना सकता है. भारत में प्राय: हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख आदि मतों, पंथों में यह प्रवृत्ति ही दृष्टिगोचर होती है.

परंतु कन्वर्जन किसी योजना या संगठित प्रयास द्वारा छल-कपट, प्रलोभन, भय या आतंक से किया जाता है तो यह अवैध, अपराध तथा अभिशाप बन जाता है. यह राजनीतिक स्वार्थों से युक्त तथा मानसिक विकृतियों का पोषक बन जाता है.

भारत की सुदृढ़ शिक्षा तंत्र से अंग्रेज ईर्ष्या करते थे. यूरोप के ईसाइयों ने हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने का षड्यंत्र रचा जिसमें उद्देश्य हिन्दू धर्मग्रंथों की भ्रमात्मक व्याख्या कर गलत साबित करना था. मैक्समूलर ने इस काम की शुरुआत की. मैकाले द्वारा स्थापित अँग्रेजी शिक्षा को श्रेष्ठ बता कर नव शिक्षित भारतीयों को हिन्दू धर्म से घृणा करना सीखाया गया. आज भी यह प्रवृति जारी है.

ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारम्भिक दिनों में ही ईसाई मिशनरियों को चार्टर एक्ट 1813 द्वारा लोगों को क्रिश्चियन बनाने और अँग्रेजी पढ़ाने की अनुमति दी गयी. इसके बाद तो अंग्रेजों ने भारत की जनता के पैसों पर ही एक इक्लेज़्टिकल डिपार्टमेंट बनाया, जिसके अधिकारी आर्चबिशप और बिशप होते थे. इस डिपार्टमेंट ने भारत के लगभग सभी नगरों के सामरिक और प्रमुख स्थानों पर कब्जा कर चर्च बनवाये.

यह डिपार्टमेंट भारत की स्वतन्त्रता तक बना रहा. स्वतन्त्रता के पश्चात भी सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद की आपत्तियों को दरकिनार करते हुये नेहरू और संविधान रचनाकारों ने हिंदुओं के सांस्कृतिक अधिकारों का अतिक्रमण कर ईसाइयों को धर्म प्रचार के असीमित सांस्कृतिक अधिकार दे दिये. ईसाई मिशनरियों के भारत में प्रवेश और अँग्रेजी शिक्षा के नाम पर धर्म प्रचार और धर्मांतरण के प्रावधानों को समाप्त नहीं किया जा सका है.

कथोलिक सोनिया गांधी के हाथों भारत की अप्रत्यक्ष सत्ता आने पर ईसाई विस्तारवादी मिशन को पूरा समर्थन मिलता रहा. लेकिन अब हमें इनके षड्यंत्र को समझते हुये अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा, साथ ही अपनी मूल संस्कृति पर ईसाइयत के छल कपट रुपी अद्रश्य हमले का प्रतिकार भी करना होगा.

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