क्या वामपंथियों ने फिर एक बार हाथ चूम कर चाँटा जड़ दिया है?

एक रेलगाड़ी में एक सुन्दर लड़की अपनी माँ के साथ यात्रा कर रही थी. डिब्बे में साथ एक बाँका जवान लड़का अपने कार्यालय के वरिष्ठ के साथ किसी काम से यात्रा कर रहा था. समय काटने के लिए हल्की-फुल्की बातचीत हो रही थी.

इतने में रेलगाडी एक सुरंग से गुजरी. दिन का समय था, सो डिब्बे की बत्तियाँ चालू नहीं थी. सो घुप्प अँधेरा छा गया. इस घनघोर अँधेरे में एक चुम्बन की आवाज़ आई, और उस के तुरंत बाद एक झन्नाटेदार तमाचे की आवाज़!

जब अँधेरा छँटा तो लोगों ने देखा, कि लड़के का साथी वरिष्ठ गाल सहला रहा था! बातचीत एकदम शांत हो गई. एक असहज शान्ति छा गई.

आसपास बैठे सहयात्री और लड़की की माँ सोच रही थी कि बड़े मियां का दिल लड़की देख मचल गया और चूमने के चक्कर में थप्पड़ खा बैठे!

लड़की सोच रही थी कि मुझे चूमने के चक्कर में बड़े मियाँ का निशाना मेरी माँ बनी, और उस ने चाँटा जड़ दिया!

और बड़े मियाँ सोच रहे थे कि चुम्मी तो लड़के ने ली और लड़की ने उस के बजाए मुझे ही बजा दिया!

लड़का सीधा मुँह किए तो था, लेकिन उस के मन में लड्डू फूट रहे थे! उस ने अपने कार्यालय में बड़े मियां द्वारा हुए अपमान का बदला लिया था – अपने हाथ को चूम कर बड़े मियाँ को थप्पड़ जड़ दिया था!

नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे, मल्लेशप्पा कलबुर्गी, गौरी लंकेश…. सारे वामपंथी विचारधारा के सितारे! कांग्रेसी शासन में एक-एक कर के मारे गए. एक के भी हत्यारे पकड़ में नहीं आए है.

लोग इनकी हत्या का दोषी किसे मान रहे है? भाजपा / दक्षिणपंथियों को! किस बिनाह पर? क्या इन की वजह से दक्षिणपंथी विचारधारा की इतनी हानि हो रही थी कि इनको मार दिया जाना चाहिए था?

इनकी हत्या उस समय क्यों नहीं हुई जब इन प्रदेशों में (महाराष्ट्र और कर्नाटक) में भाजपा सरकारें थी? क्या भाजपा शासन में ये सारे महारथी वामपंथी जीभ निगल कर बैठे थे?

भाजपा के लिए इन लोगों को ठिकाने लगाना उनके शासन में आसान था या अब, जब वह सत्ता से बाहर है?

कुल मिला कर पूछने लायक प्रश्न यह है – क्या वामपंथियों ने फिर एक बार हाथ चूम कर चाँटा जड़ दिया है?

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