जागो प्यारे : उठो लाल अब आँखें खोलो, पानी लाई हूँ, मुँह धो लो

ma with jyotirmaya poem ayodhya singh

एक तिनका

मैं घमंडों में भरा ऐंठा हुआ
एक दिन जब था मुंडेर पर खड़ा,
आ अचानक दूर से उड़ता हुआ
एक तिनका आँख में मेरी पड़ा.

मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा
लाल होकर आँख भी दुखने लगी,
मूठ देने लोग कपड़े की लगे
ऐंठ बेचारी दबे पावों भागी.

जब किसी ढब से निकल तिनका गया
तब समझ ने यों मुझे ताने दिए,
ऐंठता तू किसलिए इतना रहा
एक तिनका है बहुत तेरे लिए.

 

एक बूंद

ज्यों निकल कर बादलों की गोद से
थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी,
सोचने फिर-फिर यही जी में लगी
हाय क्यों घर छोड़कर मैं यों बढ़ी.

मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में,
चू पड़ूँगी या कमल के फूल में.
बह गई उस काल एक ऐसी हवा
वो समदर ओर आई अनमनी,
एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला
वो उसी में जा गिरी मोती बनी.

लोग यों ही हैं झिझकते सोचते
जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर,
किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें
बूँद लौं कुछ और ही देता है कर.

 

जागो प्यारे

उठो लाल अब आँखें खोलो,
पानी लाई हूँ, मुँह धो लो.
बीती रात कमल-दल फूले,
उनके ऊपर भौंरे झूले.

चिड़ियाँ चहक उठी पेड़ों पर,
बहने लगी हवा अति सुन्दर.
नभ में न्यारी लाली छाई,
धरती ने प्यारी छवि पाई.
भोर हुआ सूरज उग आया,
जल में पड़ी सुनहरी छाया.

ऐसा सुन्दर समय न खोओ,
मेरे प्यारे अब मत सोओ.

 

चंदा मामा

चंदा मामा दौड़े आओ,
दूध कटोरा भर कर लाओ.
उसे प्यार से मुझे पिलाओ,
मुझ पर छिड़क चाँदनी जाओ.

मैं तेरा मृग छौना लूँगा,
उसके साथ हँसूँ खेलूँगा.
उसकी उछल कूद देखूँगा,
उसको चाटूँगा चूमूँगा.

खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास के रचि‍यता अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (15 अप्रैल, 1965-16 मार्च, 1947) का सृजनकाल हिन्दी के तीन युगों भारतेन्दु युग, द्विवेदी युग और छायावादी युग तक है. उन्‍होंने पर्याप्‍त मात्रा में बाल साहि‍त्‍य का भी सृजन कि‍या.

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