कितना भी और कहीं भी संघर्ष हो, इस्लाम को कहां है नुकसान!

लोग बाग अक्सर कहते हैं कि आतंकवाद का शिकार सबसे ज्यादा मुस्लिम ही है… मुस्लिम ही मर रहे हैं… अमेरिका ने ही मुस्लिमों की ज़मीन पर हमला कर रखा है… उन्हें ही हर जगह से खदेड़ा जा रहा है… इसी पर कुछ लोग दुख व्यक्त करते हैं, कुछ खुश भी होते हैं…

पर मुझे दोनों का ही आंकलन गलत लगता है… दोनों ही गणित आप अपनी ओर से लगा रहे हैं… इसे आप इस्लाम के पक्ष से नहीं देख पा रहे…

इस्लाम की नज़र से देखिए… यह दुनिया, और इस दुनिया में इंसानी जिंदगी का अस्तित्व इस्लाम की नज़र में झूठा है, आभासी है. असली ज़िन्दगी तो कहीं और है… और क़यामत के दिन के बाद अल्लाह हर मुसलमान को जन्नत में वह ज़िन्दगी देगा…

इस दुनिया में दो ही चीजें मुसलमान के काम की है… पहली और सबसे बड़ी चीज है ज़मीन. इस्लाम ने कितनी ज़मीन जीती, कितने पर मुस्लिमों का शासन हुआ… यह बड़ी बात है…

और दूसरी काम की चीज है औरतें… सिर्फ सेक्स करने के लिए ही नहीं, बल्कि उनसे अपने बच्चे पैदा करने के लिए… क्योंकि ये बच्चे ही तो अल्लाह की वो फौज बनेंगे जो इस्लाम को दुनिया की पूरी ज़मीन जीत कर देंगे…

पूरी दुनिया में होने वाले संघर्षों में जहाँ जहाँ इस्लाम एक स्टेकहोल्डर है, उसे इस दृष्टिकोण से फिर से देखिए… जहाँ भी संघर्ष हो रहा है उसमें इस्लाम को कहाँ नुकसान है?

अगर संघर्ष आपकी ज़मीन पर हो रहा है तो उसमें उनके नुकसान का सवाल ही नहीं है… क्योंकि ज़मीन तो आपकी है… उसमें उसके खोने का क्या है? अगर बर्मा में बौद्धों ने मुस्लिमों को भगा दिया तो मुसलमानों का क्या बिगड़ा? वह तो ऐसे भी बौद्धों के शासन की ज़मीन थी… जो चीज अपनी है ही नहीं वह खो कैसे सकती है?

लेकिन जब काफ़िर की ज़मीन से विस्थापित हुए तो थोड़ा नुकसान तो हुआ… पर अगर वहाँ से निकल कर आपने दूसरे काफिरों के मुल्क में डेरा डाल लिया तो उस नुकसान की भरपाई हो गई… यही वजह है, कोई रोहिंग्या को पाकिस्तान या बँग्लादेश भेजने की बात नहीं करता… वह तो मुस्लिम देश है ही… वहाँ गए तो मिला क्या?

दूसरा लड़ाई का मैदान उनका अपना घर है. उनकी अपनी ज़मीन पर वे आपस में लड़ रहे हैं. तो आपका उसमें क्या फायदा? उसमें जो जीतेगा वह तो मुसलमान ही होगा ना… सीरिया में असद जीते या ISIS… लीबिया में गद्दाफी समर्थक जीते या विरोधी, मिस्र में होस्नी मोबारक जीते या ब्रदरहुड… जीतेगा तो मुसलमान ही ना…

उनकी आपस की लड़ाई तो समझिए जैसे एक सेमीफाइनल है… उनके बीच कौन ताकतवर है, कौन ज्यादा क्रूर है इसका फैसला होना है. हमारे काम का सवाल बस इतना ही है कि उन दोनों में हमारा क़त्ल कौन करेगा…

और सीरिया या इराक़ से भाग कर शरणार्थी जा कहाँ रहे हैं? इंग्लैंड और यूरोप… तो वहाँ पहुंचकर वे ईसाइयों की ज़मीन में ही घुसपैठ करेंगे ना… ईसाइयों की लड़कियों को फंसायेंगे… उनके गर्भ से अपने बच्चे पैदा करेंगे… अल्लाह की ही फौज बनाएंगे ना…

जमीन की लड़ाई उन्होंने सिर्फ एक ही हारी है… इजराइल से. इस पूरे रेगिस्तान में एक अंगूठे बराबर का है इजराइल… वही इनकी आँख में इतना चुभता क्यों है? क्योंकि इजराइल ने इन्हें वहाँ मारा है जहाँ वह सबसे ज्यादा दुखता है… इनकी जमीन ले ली है… बाकी इस ज़िन्दगी का क्या है… बन्दे जीते-मरते ही रहते हैं… इस्लाम इसका हिसाब नहीं रखता…

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