अब ‘महान लाश’ को चीलों की तरह विचारधाराओं की जंग में नोंच कर खाएंगे ‘साथी’ पत्रकार

दलित लेखक देवानूरु और जेएनयू छात्र कन्हैया कुमार के साथ गौरी लंकेश (file photo)

बिहार में पत्रकारों की मौत पर सरदेसाई, गुप्ता, वर्मा, कुमार और बाकी लोग नहीं बोलते. गौरी लंकेश की मौत पर चील उड़ चुके हैं. वो एंटी-राइट विंग थी, कई मानहानि के मुक़दमे चल रहे थे, और बीती शाम काँग्रेस शासित राज्य के मेट्रो शहर में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई.

और आप लोग, जो ये लिख रहे हैं कि ‘सच कहने वाला कभी भी मारा जा सकता है’, चुप रहिए. सच क्या है, वो आप पारिभाषित नहीं करेंगे. सबका सच अलग है. ना ही प्राथमिक जाँच से ये पता चला है कि उसकी हत्या निजी कारणों से हुई या फिर विचारधारा या उसके लेखन को लेकर.

चूँकि कोई इस्टैबलिश्मेंट के ख़िलाफ़ लिखता या बोलता है तो बस इसी ‘गुण’ के कारण वो ‘सच’ लिखने वाला पत्रकार नहीं हो जाता. आप में से किसी ने भी, और जब मैं ये कह रहा हूँ तो लगभग 99% के बारे में कह रहा हूँ जो मेरे टाइमलाइन पर हैं, गौरी लंकेश को पढ़ना तो छोड़िए, नाम भी नहीं सुना होगा. खैर वो ज़रूरी भी नहीं. ये सच लिखती थी, वो करती थी, ये एंगल अलग रखिए.

किसने मारा पता नहीं, लेकिन ये कहा जा रहा है कि दक्षिणपंथियों ने ही मारा होगा. मैं मान लेता हूँ कि ऐसा ही है लेकिन दभोलकर, पनसरे आदि की हत्या के बाद भी राज्य सरकार ऐसे पत्रकारों को बचाने में विफल कैसे हो जाती है?

या इसका जवाब भी मोदी से ही माँगा जाय? उसका इस्तीफ़ा माँग लिया जाय? चुनाव कब हैं? क्या इसको असहिष्णुता के मुद्दे से जोड़ दिया जाय?

कोई भी सरकार ऐसी हत्याएँ नहीं रोक सकती. इंदिरा गाँधी की भी हत्या हो जाती है, राजीव गाँधी की भी. कोई भी पुलिस किसी भी दभोलकर, पनसरे आदि की हत्या नहीं रोक सकती. अगर वो ऐसा करने में सक्षम हो जाती है फिर तो देश के किसी भी नागरिक की हत्या नहीं होनी चाहिए.

एक वामपंथी पत्रकार और सड़क पर चलते आम बिहारी पत्रकार की ज़िंदगी का मोल अलग है क्या? एक पत्रकार की ज़िंदगी क्या आम नागरिक की जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण है? किस रास्ते से सरकारें और पुलिस ‘आम हत्याओं’ की जगह ‘हाई प्रोफ़ाइल’ हत्याओं को रोकने का उपाय कर लेगी?

किसी के हाथ में एक बंदूक होना चाहिए, और वो राजदेव रंजन को भी मार सकता है, वो लंकेश को भी मार सकता है. सरकारें हत्यारों को पकड़ सकती है. पत्रकार को भी वैसे ही जाती दुश्मनी में मरना होगा जैसे आम आदमी मरता है. वो किसी दूसरे ग्रह से नहीं आया है.

जब तक आम आदमी को पुलिस सुरक्षित नहीं कर सकती, मुझे पत्रकार आदि की हत्या पर आश्चर्य नहीं होगा. कोई भी किसी को भी मार सकता है. किसी ने किसी को मार दिया. अब इसमें नक्सल हिमायती, ‘दक्षिणपंथियों के ख़िलाफ़ लिखने वाली’ आदि विशेषण जोड़ते रहिए.

गौरी लंकेश एक टुटपुँजिया पत्रिका की एडिटर थी, लेकिन हिंदुत्व के ख़िलाफ़ लिखती थी, इसलिए वो अब महान बनाई जाएगी. मेरे लिए सारे न्यूज़ वाले टुटपुँजिया ही हैं. मैं भी वही हूँ. मुझे भी मार दिया जाएगा किसी दिन किसी बात पर. गौरी लंकेश की ‘महान लाश’ को उसके ‘साथी’ पत्रकार चीलों की तरह विचारधाराओं की जंग में नोंच कर शराब के चखने की तरह खा जाएँगे.

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