नवल गीत : कुछ ना कहो कुछ भी ना कहो

विधु विनोद चोपड़ा की 1942- ए लव स्टोरी के कुछ ना कहो गाने के दो वर्जन है. एक जो सब जानते ही है. कुमार शानू का गाया हुआ. दूसरा वर्जन गाया है लता ने. इसे लता ने आर डी की मौत के बाद रिकॉर्ड किया. बिना आर डी के. बिना आरडी के दिये जाने वाले हर छोटे-बडे इनपुट के.

लता ने माइक पकड़ा और गा दिया. एक अवसाद में, खालीपन में. इस वर्जन को सुनते हुए आप गीत से ज्यादा उस खालीपन को महसूस कर सकते हैं जो आरडी छोड़ गए थे. कुछ ना कहो में आरडी ने अपने खराब समय की सारी हताशा और छटपटाहट उतारी थी और लता ने इस वर्जन में आरडी के ना होने का अपना दुख. इस गीत में लता की आर डी के लिये गहरी संवेदना दर्ज है. कुमार शानू का वर्जन जहां जीवन में प्यार के प्रवेश और उसका मजबूती के साथ उपस्थित होना है, वहीं लता का वर्जन प्यार की अनुपस्थिति और उसके छोड़े हुए निशानों में डूबे बेचैन चित्त का गीत है. दोनों जीवन के स्थायी भाव है. एक की मजबूत उपस्थिति दूसरे के आगमन की महीन आहट है.

आर डी बर्मन जीनियस थे. जैसा कि जावेद अख्तर कहते हैं कि हम जल्दबाजी में, हड़बड़ी में सभी के लिये जीनियस विशेषण का इस्तेमाल करने लगे हैं पर जब जीनियस शब्द आरडी बर्मन के साथ जुड़ता है तो वो अपने को सार्थक करता है. अगर आरडी कुछ ना कहो जैसी जीनियस कम्पोजिशन को रचे बिना भी इस दुनिया से चले जाते तो क्या हो जाता. उनका रचा और वो खुद उतने ही चमकदार होते जैसे कि अभी है.

पर चैम्पियन को चैम्पियन की तरह ही जाना था. उसे ये कम्पोजिशन एक महान विदा गीत की तरह दुनिया के नाम करना था. ऐसा महान विदा गीत कि उसके रचे सारे संगीत पर कोहिनूर सा चमके. कुछ ना कहो आरडी के सारे संगीत पर चमकता दमकता एक ऐसा ही कोहिनूर है. ये गीत दुनियावी नहीं, आसमानी है. प्यार पंख लगा कर आसमान में पहुंचा है तभी तो सब कुछ तेजोमय है. एकांत में है. संसार भर की तमाम चिंताओ से दूर है.

क्यारी, सीढ़ियाँ, मोती, झूला, घर, लैंडस्केप सब कुछ दिव्य. अनिल का शर्ट. मनीषा का सूट. हंसी. सब कुछ दूध सा. निर्मल. अभिनेताओं पर गौर करें. अनिल कपूर और मनीषा कोईराला. एक बेमेल जोडा. जिन्हें देख शाहरूख-काजोल की तरह पहले से प्यार की गुदगुदी लगनी शुरू नहीं होती. जिन्हें रोमांस में प्रतीक बनाते-बनाते दुर्घटना होने का अंदेशा अधिक था पर भंसाली ने उपलब्ध अभिनेताओं का इस गीत में सर्वश्रेष्ठ दोहन किया.

ये फिल्म निर्देशित की थी विधु विनोद ने पर फिल्म के सभी गाने डाइरेक्ट किये थे संजय लीला भंसाली ने जो उन दिनो विधु विनोद के सहायक थे. अनिल कपूर इतने ग्रेसफुल इससे पहले किसी गाने में कभी नहीं लगे. मनीषा कोईराला भी यहां स्त्रीत्व के अपने पूर्ण आकार में है. पूर्णिमा का चांद शरद की रात्रि में चमकता. और जिस पल में दो प्रेमियों के बीच कोई नहीं है उसके लिये सांझ की लाली वाली फैंटेसी. गोधूली का बैकग्राउंड. आसमानी पल, आसमानी सब.

प्यार-व्यार होता ही आसमानी है और ये आसमानी ही बना रहे तो अच्छा. दुनियावी होते ही इसकी छाती पर सारे नियम व शर्ते चढ़ बैठते हैं और प्यार धराशायी हो जाता है. प्यार होना जीवन की अकस्मात घटना है. अकस्मात हम चौंके. सोचे कि प्यार हुआ. बस, यहीं रुखसत हो लो. प्यार को दुनिया के धक्कों में शहीद करने से बेहतर है विदाई. आखिर प्यार दर्ज करने के लिये होता है, जाया करने के लिये नहीं. जीवन में प्यार के होने से ज्यादा उसकी ताजा-ताजा इंटेनसिटी को संभाले रखना बड़ा काम होता है.

कुछ ना कहो गाने को लिखा था जावेद अख्तर ने. जावेद अख्तर हिंदी सिनेमा के सबसे समझदार गीतकारों में से एक हैं जिन्हें गीत के साथ फिल्म, उसके किरदार उसके पीछे की मनोस्थिति, उसका तनाव सब ध्यान में होता है. स्क्रिप्ट राइटर होने का फायदा उनके गीतकार स्वरूप को भी मिला. कुछ ना कहो को लिखते समय में उनकी इस समझदारी को साफ साफ महसूस कर सकते है. गीत का मुखड़ा है- “क्या कहना है, क्या सुनना है. मुझको पता है, तुमको पता है.” यहां जावेद अख्तर की जगह कोई और होता तो अंतरे मे इस स्थिति को भूल वो सब कह देता जिसके लिये मुखडे ने बंदिश लगाई है. नायिका की सुंदरता, तिस पर नायक का सौन्द्रर्य वर्णन, इच्छा, सपने, प्रणय निवेदन और भी बहुत कुछ. पर जावेद ने जब मुखड़े में कह दिया कुछ नहीं कहना है तो दोनों अंतरे भी केवल नायक के मन की आवाज बनते हैं और कुछ ना कहो की मनोस्थिति को बरकरार रखते हुए नायिका से कुछ ना कहकर खुद ही खुद को कहता है-

कितने गहरे-हल्के शाम के रंग है छलके/ परबत से यूं उतरे बादल जैसे आंचल ढलके
और इस पल में कोई नही है/ बस एक मै हूं/ बस एक तुम हो
सुलगी सुलगी सांसे/ बहकी बहकी धड़कन/ महके महके शाम के साये/ पिघले पिघले तन मन
और इस पल में कोई नहीं है/ बस एक मै हूं/ बस एक तुम हो

कुमार शानू ने इस गाने में सच में अफीम बोया है. आरडी ने ये धुन किशोर कुमार को ध्यान में रखकर बनाई थी. किशोर के जाने के बाद इस धुन को छोड़ दिया. कभी काम ही नहीं किया. लगा किशोर कुमार के साथ ये धुन भी खत्म हो गई है. पर उस घडी, उन लम्हो में जब आरडी का उतराव अपने पूरे चरम पर था और उनका खुद का खुद पर ही आत्मविश्वास खत्म होता जा रहा था, तब भी जब कैसेट कंपनी एचएमवी ने विधु विनोद को साफ बोल दिया था कि अगर आरडी बर्मन तुम्हारी इस फिल्म का संगीत बनायेंगे तो वो संगीत खरीदेंगे ही नहीं, उस बुरे समय में आरडी को अपनी इस धुन की याद आई.

दरअसल कुछ ना कहो की पहली धुन ये थी ही नही. आर डी ने बप्पी मार्का एक धुन विधु विनोद को पहली सिटिंग में सुनाई. आर डी ने पूछा-कैसी लगी. विधु ने उठते हुए कहा-बाद में बताता हूं. आरडी ने बच्चों की तरह जिद करके कहा- अभी बताओ. विधु ने आरडी के पीछे उनके पिता एस डी बर्मन की लगी तस्वीर की और देखकर कहा कि आप बेस्ट हो पर मै आपमें उनको ढुंढ रहा हूं और आप ऐसा खराब काम करेंगे तो ये स्वीकार करने जैसा नहीं है.

आरडी ने विधु से सात दिन मांगे. विधु विनोद ने कहा एक साल ले लो पर वो दो, जो मैं चाहता हूं. सात दिन बाद कुछ ना कहो की धुन दोबारा बनी. आरडी ने अपना सारा एकांत और दुख धुन में उतार दिया. विधु विनोद प्रसन्नचित. उन्हें पता था कि आरडी ने मास्टर पंच दे दिया है. विधु विनोद के सिनेमाई जीवन के इस प्रसंग के कारण भी उसके लिये सम्मान हमेशा रहेगा. ढलते सूरज के सामने भी दण्डवत होना उसने बताया.

अलहदा तथ्य ये भी है कि जिस 1942 ए लव स्टोरी का संगीत को मास्टरपीस की तरह माना गया, वो नये किस्म के आरडी का संगीत था. ये धुनें, एरेंजमेंट्स और गायकी का अंदाज टिपिकल आरडी मार्का नहीं था. शायद उसके बनाये सारे संगीत से अलग. लिखे गीत राजकपूर सिनेमा और संगीत उस दौर के जतिन-ललित मार्का के करीब था. इस फिल्म के बाद आरडी की बस दो फिल्में रिलीज हुई. राजकुमार संतोषी की घातक, जिसमें उनके एक या दो गाने थे और 97 में आई अन्याय ही अन्याय.

दोनों का काम शायद 1942 ए लव स्टोरी से पहले का काम था. इस लिहाज से ए लव स्टोरी आरडी का अंतिम काम था. फिल्म की रिलीज वो नहीं देख पाये. उनकी दिली इच्छा थी कि उनके काम को लोग वापिस सराहें और जब सराहा गया तो खुद नहीं थे. चिरनिद्रा में थे. 1942 ए लव स्टोरी का म्यूजिक आरडी का सबसे बेस्ट नहीं है. इससे बहुत बेहतर वो कर चुके थे पर जिस समय, जिस जुनून और जिस जिद में ये संगीत बना, इसका जायका खास है. यकीनन आरडी के प्रयाण से पहले का विदा गीत कुछ ना कहो ही है, वैसे ही जैसे कि गुरूदत के प्रयाण से पहले का सुसाइड नोट फिल्म प्यासा. आहटें कमाल होती है. आहटें कमाल ही करवाती है.

अक्सर कहता हूँ कि कुछ गीत जेहन में ऐसे बसे है कि सोचता हूं कि जब मौत मुहाने पर आए, आंखे और मन गहरी नींद में उतरने को हो तो जाते-जाते इन्हें सुनते हुए ही जाऊं. मेरी अंतिम नींद इसके बिना मुकम्मल नहीं होगी. आराम न मिलेगा. कुछ ना कहो ऐसा ही एक गीत है. कुछ ना कहो जीवन का ऐसा ही एक पल है. लव यू आर डी. जहां हो, आबाद रहो.

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