शिक्षक दिवस : जिन सबने जीवन का पाठ पढ़ाया, वो सब थोड़े-थोड़े मुझमें बस गए

समय के साथ हमारे सलीके और तरीके बदलते जाते हैं. थोड़ा हम बदलते हैं, बढ़ती उम्र के कारण. थोड़ी हमें बदलती दुनिया अपने बदले तौर-तरीकों से बदल देती है. इन सब के बीच साल में ऐसे दिन बहुतेरे आते हैं जब हम एकदम से आदर्शवादी हो जाते हैं. ये एक दिन ऐसा होता है जब हम चाहे-अनचाहे किसी मुद्दे के दूसरे पक्ष को भूल से जाते हैं. उन्हीं में से एक दिन आज का भी है.

अब ये बदलाव का ही असर है कि बचपन से यदि मुझे न बताया गया होता कि 5 सितम्बर शिक्षक दिवस का दिन होता है, तो शायद मुझे पता भी नहीं चलता कि आज कुछ खास था! मैं इसके लिए किसी को दोषी नहीं मानता, खुद मेरी भी गलती नहीं है. हर किसी के जीवन में अलग-अलग दौर आते हैं. उन्हीं बदलावों के क्रम में कई वो चीजें जो कभी हमारे जीवन के सबसे अहम हिस्सों, सबसे अहम लम्हों में हुआ करती थी, वो पीछे छूट जाती हैं. ये स्वाभाविक है.

तब हमारे पास बीतें दिनों को याद करना ही सबसे बेहतर विकल्प होता है. उसी बहाने हम उन पलों को कल्पना में जी आते हैं. मगर यादों की सबसे बड़ी कमी ये है कि हमें मीठा-मीठा तो सब याद रहता है, खट्टा वाला हम भूल जाते हैं. जब मैं खास दिनों के आदर्शवाद पर सोचता हूँ तो उसके पीछे मुझे सबसे बड़ा कारण यही दिखता है.

जो दिक्कतें हमारे साथ आज हैं, वो हम आगे भूल जाएंगे. जीवन-चक्र को चलाने के लिए ये जरूरी भी है. पर हमारे पीछे समस्या नासूर बनकर दूसरों के लिए यथावत न बनी रहे, इसका ध्यान रखना भी हमारी जवाबदेही है.

हम जब बात करते हैं कि अब शिक्षकों में वो पहले वाली बात नहीं रही, गुरु शिष्य परम्परा जैसा कुछ होता नहीं, शिक्षा अब व्यापार हो गया है, आदि-आदि; तब हम अपने हिस्से का दोष दूसरों पर मढ़ रहे होते हैं, तब हमारी कोशिश दाग को अपने दामन पर आने से रोकने भर की होती है. इसलिए हमारे तमाम तर्क समस्या को तो खूब बताते हैं, पर समाधान की बात शायद ही करते हैं.

हकीकत ये है कि एक समाज के रूप में सबसे पहले हम असफल हुए हैं जिसकी झलक हमारी शिक्षा व्यवस्था गाहे-बगाहे सालों भर अलग अलग खबरों के जरिए दिखाती रहती है. आत्मावलोकन की जरूरत हमें है कि क्यों गुरु-शिष्य की अवधारणा खत्म हो गई ?

क्यों शिक्षक और छात्र का व्यवहार, जो मूल्यों (Values) पर आधारित होना चाहिए था वो अर्थ(Economy) आधारित हो गया? क्यों शिक्षक और छात्र का जो सम्बन्ध अभिभावक और बालक वाला होना चाहिए वो नहीं रहा? गर इन सब मामलों में ह्रास हुआ है तो हमें सामूहिक जिम्मेवारी तो लेनी ही होगी.

व्यक्ति, छात्र, शिक्षक, व्यवस्था, प्रशासन, शासन सबको अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी. अभिभावक और समाज को सबसे अधिक गम्भीर होना होगा, जिस दिन ये दोनों जागरूक हो गए, उस दिन कौन रोकेगा गुरु-शिष्य, शिक्षक-छात्र के आदर्शों को कायम होने से ?

बाकी सबसे महत्वपूर्ण तो ये है ही कि हम जो हैं वो अपने शिक्षकों के बदौलत ही हैं. सायास-अनायास चाहे क्लासरूम के अंदर या बाहर उन्होंने हमें सिखाया है, हम उसी के बिम्ब मात्र हैं. हर शिक्षक का अपना-अपना योगदान है, ऐसा कि उन्होंने जो नहीं सिखाया, उसका श्रेय भी उन्हें ही जाता है क्योंकि परोक्ष होकर भी साधन और माध्यम वही थे.

खासकर मैं इस मामले में भाग्यशाली हूँ, मुझे अपने जीवन मे जो भी शिक्षक मिले हैं, सबने मुझे जीवन का अलग पाठ पढ़ाया है, ऐसा कि वो सब थोड़े-थोड़े मुझमें बस गए हैं! मेरे सभी शिक्षकों को प्रणाम! आप सबको शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं!

(विषय महत्वपूर्ण और वृहद है इसलिए सभी दृष्टिकोणों को एक आलेख समेट पाना सहज नहीं हैं. इसलिए भी ये ज्यादा जरूरी है कि हम अपने स्तर से प्रयास करते रहें, शायद उसके बाद ही हम सशक्त राष्ट्र के संकल्पना की कल्पना भी कर सकते हैं!)

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