शिक्षक दिवस : शिक्षक को आज TOPPER BUILDER के स्थान पर बनना चाहिए NATION BUILDER

आज फिर शिक्षक दिवस पर बहुत से गुरुओं को स्मरण किया जाएगा. बहुत से विद्यार्थी अपने शिक्षक या गुरु के प्रति आभार प्रकट करेंगे. मुझे भी मेरे विद्यार्थियों ने बहुत प्रेम और सम्मान दिया. परंतु मेरे विचार से आज के दिवस पर शिक्षक या गुरु को स्वयं से प्रश्न पूछने का यत्न करना चाहिए कि असल में शिक्षा का उद्देश्य क्या है और क्या मैंने उस कार्य को निभाया है?

इस ज्ञान को समझने का समय है. शिक्षा का उद्देश्य है कि व्यक्ति स्वयं को पहचान सके अपने आसपास की संरचना को समझे और उनसे यथायोग्य संबंध बनाए रखे. आस पास से अर्थ है कि अपने परिवार के सम्बन्धों, धन संपदा से अपने सम्बन्धों को, प्रकृति से अपने सम्बन्धों को और पर्यावरण इत्यादि से अपने संबंध को. आज की शिक्षा व्यवस्था, जो अंग्रेजों ने चलायी थी न तो व्यक्ति को स्वयं से पहचानने मे सहायक है और न ही वातावरण या समाज को समझ पाता है इसीलिए समाज और वातावरण के प्रति अपने दायित्व को नहीं निभा पाता है.

कुछ समय से हमारे देश मे कभी मातृ दिवस कभी पितृ दिवस और कभी पर्यावरण दिवस इत्यादि मनाने की परंपरा शुरू हुई है. इस सनातन देश में जो हजारों सालों की सभ्यता पर जीवित है कभी ऐसे विशेष दिवस मनाने की न तो परंपरा थी और न ही आवशयकता. वह इसलिए था कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अपने सामाजिक दायित्व और प्रकृति के प्रति दायित्व को हमें ठीक प्रकार से समझा पाती थी. इसलिए समाज का हर व्यक्ति अपने अपने स्तर पर समाज मे अपना योगदान देता था.

यदि भारत सोने की चिड़िया कहलाता था तो उसका कारण भी स्पष्ट था कि समाज के हर व्यक्ति समाज के लिए आवश्यक था. तभी एक सशक्त समाज की रचना हो सकती है. आज हम शिक्षा विद्या और साक्षरता को एक ही समझ बैठे हैं इसीलिए शिक्षा के मूल रूप से हट चुके हैं. शिक्षा से बेहतर जीवन जीने की कला आनी चाहिए जिससे एक बेहतर समाज की रचना होनी चाहिए.

संस्कार विधि के अनुसार जब गुरुकुल में विद्यार्थी का उपनयन संस्कार (यानि जब वह गुरुकुल में आता है) उस समय गुरु उसके हृदय पर हाथ रखता है और मंत्रोच्चारण के साथ उसके साथ अपना मन एकीकृत करके उसके कल्याण वचन देता है. क्या आज यह परंपरा है? सभी गुरुओं को यह सोचना चाहिए. आज का शिक्षक कभी संस्थान के दबाव में, कभी अभिभावाक के और कभी विद्यार्थी के दबाव और बहुधा अपने स्वार्थ के कारण मे अपना पूर्ण कार्य, जोकि है एक सर्वांगीण विकास की ओर अपने शिष्य को ले जाना नहीं कर पाता है. इस प्रकार से शिक्षा के स्वरूप का जो रूपांतर हुआ है उसमें सरकारी व्यवस्थाएं भी कम दोषी नहीं है.

याद करें कि जब महाभारत काल में गुरुवार द्रोणाचार्य जब अर्जुन की एकाग्रता देखते हैं तो उसे धनुर्विद्या के लिए निर्धारित करते हैं, भीम अधिक भोजन करते हैं तो उन्हे मल्ल युद्ध इत्यादि के लिए चुन लेते हैं अर्थात विद्यार्थी को क्या पढ़ाना है वह गुरु तय करता है. धन की व्यवस्था समाज या राजा से होती है तभी तो कृष्ण और सुदामा के एक ही सांदीपनी ऋषि के आश्रम से ज्ञान अर्जन करते हैं. आज की व्यवस्थाएं ठीक उलट हो गई हैं जहां क्या पढ़ाना है समाज या राज्य तय करता है धन की व्यवस्थाएं अभिभावक करते हैं. जीवन निर्माण में गुरु का काम लगभग नगण्य हो गया है. इसी ने शिक्षा के आचरण में मूल परुवर्तन दे दिया है. शिक्षण मात्र एक धन उपार्जन का काम बन कर रह गया है.

क्या आज का शिक्षक सही अर्थों मे वह शिक्षक है जो एक सभ्य समाज की संरचना कर सके. कारण स्पष्ट है कि आज की शिक्षा प्रणाली जो अंग्रेजों ने चलायी और आज़ादी के बाद भी हम ढो रहे हैं एक सशक्त समाज की रचना नहीं कर सकी यह तो हम सब देखते हैं. सभी धर्म सभी संस्कार सीखते हैं कि प्रेम करो, प्रेम से रहो परंतु यह शिक्षा प्रणाली ही प्रतिस्पर्धा पर आधारित है सहयोग पर नहीं. आज का या हर समय का समाज हर वर्ग में सहयोग की भावना से ही चल सकता है.

अगर हम बच्चे के बचपन को तलाशें तो जब बच्चा गिर जाता है कहीं पर किसी वस्तु से ठोकर खा कर, उसे कहा जाता है इसे धत्त कर दे या इसे मार फिर यह वस्तु तुझे नहीं गिराएगी. अनजाने में हमने बच्चे के मन यह विचार डाल दिया कि जो तुम्हें मारे उसे तुम भी मारो. क्या ही अच्छा हो यदि बच्चे को समझाया जाये जिस वस्तु ने तुम्हें कष्ट दिया है उसे पुचकारो, प्रेम करो फिर यह तुम्हें तंग नहीं करेगी.

समाज में जब बच्चा अपने अभिभावक के साथ है और अभिभावक के साथ अन्य लोगों के सामने कोई गलती करता है तो अभिभावक या पिता को बुरा लगता है और वह समझाने की कोशिश करता है कि यह गलत है. वहीं पर अन्य मित्र या लोग कहते है “कोई नहीं बच्चा है”. कल्पना करें इस घटना से बच्चे के कोमल मन पर पिता या अभिभावक के विरोध में विचार आते हैं. उसमें भावना घर कर जाती है कि मेरे पिता या अभिभावक सबसे ज़्यादा रोक टोक करते हैं.

उसके उपरान्त जब बच्चा अपने स्कूल जाता है वहाँ से तो उस पर प्रतिस्पर्धा का बोझ लाद दिया जाता है. जो अगली पंक्ति में आता जो कक्षा में प्रथम आता उस पर वाह वाही और दूसरों पर छींटाकशी. उस को देखो वह पढ़ लिया तुम क्यों नहीं नंबर ला पाते.

इसके परिणाम जो तथाकथित आगे है उसके अहंकार को बढ़ावा मिलता है और जो पीछे है उसमे हीन भावना घर कर जाती है. क्या परोक्ष रूप से शिक्षा तंत्र यह नहीं सिखाता सबको पीछे करो और आगे बढ़ो, इस प्रतिस्पर्धा से ही ईर्ष्या जन्म लेती है. आप पढ़ते है कि प्रेम से रहो परंतु सिखाते है ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा. इतना ही नहीं जब समाज के अभिभावक और माता पिता का जब कभी PTM इत्यादि में अध्यापक से सामना होता है तो माता पिता का एक ही प्रश्न – “हमारे बच्चे के आगे कितने हैं?”

और घर पर फिर बच्चा उसी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर देता थक जाता है. जो आगे आता उसे पदक मिलते हैं उसे माला पहनाई जाती है जो पीछे रह गया उसे अपमानित कर रहे हैं. हमारा कल का बच्चा, आज का युवा इसी वातावरण मे बड़ा हुआ है. यदि आज का युवा कुछ कहीं गलत सोचता है तो शायद उसके अध्यापक, उसकी परवरिश का समाज भी कुछ हद तक दोषी है. चलिये आज से इसको बदलने का प्रयास करें. हर समाज का का आधार है उसके बच्चे जो कल युवा बन कर देश को आगे ले जाएँगे.

अंतिम एक बात को और समझने की आवश्यकता है कि “वर्तमान की दृष्टि में अतीत हमेशा दोषी है यदि ऐसा न हो तो समाज की प्रगति का रास्ता रूप जाएगा” यह शिक्षा भीष्म पितामह ने अपनी शरशैय्या पर लेटे हुए पांडवों को दी. शायद आज इसकी फिर आवशयकता है.

आज का शिक्षक यह बताने का प्रयास करता है कि मैंने कितने इंजीनीयर, डॉक्टर CA बनाने मे योग दान दिया है परंतु उनमें से या उसके अतिरिक्त कितनों मे शिक्षक राष्ट्र या समाज के प्रति संवेदनाएं पैदा कर पाया है. शिक्षक को आज TOPPER BUILDER के स्थान पर NATION BUILDER बनना चाहिए.

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