कुर्बानी प्रेम की, संस्कार की, भाईचारे की या इंसानियत की?

बांग्लादेश के ढाका से प्रकाशित समाचार पत्र प्रोथोम आलो ने अपने एक लेख में ईद से पहले सजने वाले पशु बाजार का विवरण देते हुए लिखा कि कुर्बानी हेतु पशुओं के बाजार सज गये हैं. जहां सबसे अधिक मांग और खरीद बिक्री गायों की हो रही है.

देश के प्रमुख शहरों ढाका, चटगांव, खुलना, फरीदपुर, सिलहट बागुरा, रंगपुर आदि में लाखों ग्राहक कुर्बानी के लिए अलग अलग नस्लों की गाय तलाश रहे हैं. मनपसंद गाय मिलने पर ग्राहक खुशी से झूम रहे हैं और अपने मोबाइल फोन से गाय के साथ सेल्फी भी ले रहे हैं.

सुबह से रात तक ये कुर्बानी गाय हाट गुलजार रहते हैं. देश के कई शहरों के स्कूलों ने तो बच्चों को इन स्थानीय कुर्बानी गाय हाट में भेजा हैं ताकि बच्चे कुर्बानी हेतु गायों के क्रय विक्रय को समझने के साथ कुर्बानी का महत्व भी जान सके.

1971 से पूर्व बांग्लादेश पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जाना जाता था. वर्तमान पाकिस्तान की तत्कालीन सरकार और सेना ने इन बांग्लादेशियों पर जमकर अत्याचार ढाये. हत्याएं की बलात्कार किये. नागरिकों का सामूहिक नरसंहार किया. तब इन्होंने भारत से मदद की भीख मांगी.

भारत ने अमेरिका की धमकी की भी परवाह नहीं की और बांग्लादेश को पाकिस्तान से आजाद करवाया. भारत को लगा कि बांग्लादेशी हमेशा भारत का एहसान मानेंगे. पर पिछले कुछ सालों में यहां भारत और हिन्दू विरोधी गतिविधियां चरम पर पहुंच गई हैं. ईद उल अजहा पर पशु की कुर्बानी की परम्परा है और दुनियाभर के देशों में ऊंट, बकरा, भेड़ और दूसरे कई पशुओं की कुर्बानी दी जाती हैं.

किन्तु बांग्लादेश और पाकिस्तान में इस अवसर पर सबसे अधिक भारतीय गायों की कुर्बानी दी जाती हैं. और यहीं कारण है कि ईद से पहले हमारे देश में गायों की तस्करी बढ़ जाती है. क्योंकि युद्ध में अनेकों बार हार चुके पाकिस्तान और बांग्लादेशियों को भारत की गायों की हत्या करने से उनको भारत और यहां के हिन्दुओं की भावना आहत करने का असीम आनंद प्राप्त होता है और भारत और हिन्दुओं की भावनाएं आहत करना तो बांग्लादेशी और पाकिस्तानी अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं.

और ये दोनों देश भारत और हिंदू विरोधी मानसिकता का इजहार करने का कोई मौका कभी छोड़ना नहीं चाहते. भले ही उनको अपने धार्मिक त्यौहार का ही इसके लिये इस्तेमाल क्यों न करना पड़े!

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