इस्लाम ओशो की दृष्टि में

मोहम्मद ने अपने धर्म को नाम दिया इस्लाम. इस्लाम यानी शांति. और दुनिया में इस्लाम ने जितना उपद्रव पैदा किया है, उतना किसी धर्म ने नहीं किया. निश्चित ही, मोहम्मद उसके लिए जिम्मेदार होंगे.

उन्होंने अपनी तलवार पर लिख रखा था, शांति मेरा संदेश है. यह कोई तलवार पर लिखने की बात नहीं है. क्योंकि तलवार शांति का संदेश नहीं है. ज्यादा से ज्यादा वह सुरक्षा बन सकती है, लेकिन संदेश नहीं बन सकती.

ये सारे महापुरुष, जो इस पृथ्वी पर हुए, उनके प्रति मेरा दृष्टिकोण इतना ही है: उनमें हमारे लिए जो संगत है उसे चुनें और असंगत है उसे छोड़ दें.

इस्लाम धर्म उस देश में पैदा हुआ था जो ज्यादा सुसंस्कृत नहीं था. उसे सिर्फ एक ही तर्क मालूम था— तलवार का तर्क.

और तलवार कोई तर्क नहीं है. और इस्लाम धर्म ठीक उसी बिंदु पर अटका रह गया है, जहां मोहम्मद छोड़ गए थे. क्योंकि उनने कहा है, और मैं उसका निषेध करता हूं, कि मैं अल्लाह का आखिरी पैगंबर हूं; कि अल्लाह के पूर्ववर्ती संदेशों में कुरान अंतिम सुधार है. अब इसके बाद कोई और पैगंबर नहीं होगा और अन्य कोई परिवर्तन नहीं होंगे.

अब यह धर्मांधता है और यह किसने कहा है कि इसका कोई सवाल नहीं है—बात ही गलत है. जीवन विकसित होता रहेगा और लोगों को नए संदेशों की जरूरत पड़ेगी और नए लोगों की जरूरत पड़ेगी जो नई समस्याओं का हल खोजेंगे.

और कुरान कोई बहुत बड़ा धर्म ग्रंथ नहीं है. उसमें उपनिषद की वह उड़ान नहीं है. उसमें गौतम बुद्ध की विचार संपदा नहीं है. लेकिन यह स्वाभाविक भी था क्योंकि मोहम्मद अशिक्षित लोगों से बोल रहे थे.

लेकिन वे अशिक्षित लोग अब भी वही ढोए चले जा रहे हैं. एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कुरान. या तो कुरान को स्वीकार करो या तलवार को.

भारत में जो मुस्लिम रहते हैं, जिन मुस्लिम लोगों ने पाकिस्तान निर्मित किया है, उन्हें बौद्धिक रूप से यह बात स्वीकृत नहीं है कि वे जिस धर्म को छोड़ रहे हैं, उससे इस्लाम धर्म कोई अधिक श्रेष्ठ धर्म है.

उनसे जबरदस्ती की जा रही है. और कम से कम धर्म के मामले में जोर जबरदस्ती नहीं की जा सकती है, नहीं होनी चाहिए. प्रत्येक व्यक्ति को अपना दर्शन अभिव्यक्त करने की छूट होनी चाहिए.

और प्रत्येक व्यक्ति को उसे स्वीकार या अस्वीकार करने की छूट होनी चाहिए.उसका अस्वीकार करना उसका अपमान नहीं है. धर्म केवल स्वतंत्रता की आबो हवा में विकसित होता है.

इस्लाम ने खुद मुस्लिमों को भी यह स्वतंत्रता नहीं दी है.

ओशो

“फिर अमरित की बूंद पड़ी”
प्रवचनमाला से…

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