जब हथियार मिलना आसान है तो पत्थरबाजी क्यों करते हैं कश्मीरी

इस प्रश्न कि जब हथियार मिलना आसान है तो कश्मीरी पत्थरबाजी क्यों करते हैं, का उत्तर बहुत सरल है. अगर वे गोली चलाएँगे तो उन्हें गोली से जवाब देना आसान है. सरकार का अधिकार है. कानूनन, शस्त्र रखना अवैध है, जम्मू कश्मीर में भी. धाराएँ सख्त लगेंगी. इसलिए अगर उन्होंने हथियारों का प्रयोग किया तो पुलिस को जवाब में गोली चलाने में दो मिनट भी नहीं लगेंगे. उसके बाद घरों की तलाशी, छुपाए हथियारों की जानकारी उगलवाने के लिए उठा लेना, आदि सब उपाय जायज होते हैं. हथियारों का अतिरिक्त प्रयोग सेना को भी बीच में ला सकता है और सेना उस परिस्थिति में आ जाये तो उनकी खैर नहीं. कॉम्बिंग, सर्च एंड डिस्ट्रोय में उनकी पूरी वाट लग जाएगी.

सेना आती है तो पूरा फ्री हैंड लेकर ही आती है, पहले गोली मारो बाद में पूछताछ करो वाली स्टाइल से. मुंबई के दंगों में मुस्लिम इलाकों में मोमिनों की जाँबाज बहदुरी क्या होती है यह दिखाने के लिए सेना का एक खुला ट्रक जिसमें गिनती के पंद्रह जवान होंगे, पर्याप्त था. खुद देखा हुआ है. ट्रक बस शांति से धीमे चल रहा था. सैनिक दिखने में तो बिलकुल ढीले से खड़े थे. चार ही खड़े थे और यहाँ वहाँ देख रहे थे, बाकी आराम से बैठे थे. कोई भी बंदूक तानकर खड़ा नहीं था. बस नज़र बता देती थी, इनसे पंगा लेना ठीक नहीं होगा. छतों पर, खिड़कियों में लोग दिख रहे थे, कोई कुछ भी नहीं कर रहा था. ट्रक जाने के बाद भी कुछ नहीं किया किसी ने. दो दिन में ठंडा हो गया सब.

Narrative खराब होगी. आज जो narrative बनाए हैं कि बाहरी ताकत ने कश्मीर पे कब्जा किया है. पंडितों को भगाकर इन्होने माहौल इस्लामी बना दिया इस पर कोई बात नहीं करेंगे. बस, भारत बाहरी देश है, कश्मीरियों के मर्जी के खिलाफ कब्जा कर बैठा है, यही रटते रहेंगे और यहाँ का वामिस्लामी मीडिया भी इसे दोहराता रहेगा. देशद्रोह के कृत्यों को मानवाधिकार बताता रहेगा और उस पर एक्शन को मानवाधिकारों का हनन.

अब पत्थरबाजों पर फायरिंग के आदेश नहीं मिलते. लेकिन पत्थरबाजी जानलेवा हो सकती है. आहत कर सकती है. आदमी को अक्षम कर सकती है. और एक बात है जिस पर आप ने शायद ही सोचा हो कि आदमी का मानसिक स्वास्थ्य बिगाड़ देती है. हाथ में बंदूक है लेकिन आप को केवल वहाँ खड़े रहना है, पत्थर झेलना है, लोग आप को अभद्र गालियां दें वह सुनना है, और आप जवाब नहीं दे सकते.

आप के सामने आप का कोई सहकर्मी जो आप का मित्र भी है, पत्थर से जख्मी हो कर गिर जाता है, कहीं पत्थर ठीक निशाने पर है तो वो आप के सामने तड़प कर मर भी जाता है और आप कुछ नहीं कर सकते. आवेश में या आत्मरक्षा में भी आप ने गोलियां चलाई तो बाद में अदालत में आप का जीना हराम किया जाता है. जरा दो मिनट के लिए खुद को इस परिस्थिति में रख लीजिये और सोचिए कि जिनको हर पल ऐसे हालातों से गुजरना होता है उन पर क्या बीतती होगी.

हौसला सब से बड़ा शस्त्र होता है और उसे नाकाम करना बड़ी जीत. अब बताएं, गांधी ने अपने समर्थकों को कभी पत्थरबाजी करने के आदेश क्यों नहीं दिये? उत्तर सरल है, पत्थर का उत्तर गोली थी. ब्रिटिश सरकार को कोई हर्ज नहीं था खून बहाने में. गांधी वकील तो थे ही, जानते थे इससे कोई साथ नहीं रहता, उनके साथ भी सावरकर जैसा व्यवहार किया जाता. अहिंसा का एक कारण यह भी हो सकता है.

अब एक छोटा सा सवाल है – संविधान से भी ज़्यादा कॉपी पेस्ट है दंडविधान. पहले तो पत्थरबाजी अगर ना थमी तो शुरू में हवाई बाद में सीधा फायर कर सकती थी पुलिस. अब क्यों नहीं कर पाती?

रमाबाई नगर दंगे जैसे मामलों ने पुलिस को निर्बल बना दिया. इसमें सबसे बड़ा दोष कॉंग्रेस का है जो तब विपक्ष में थी. वास्तव में यह शोध का विषय होगा कि काँग्रेस ने केंद्र और राज्यों में विपक्षी सरकारों के कार्यकाल में कहाँ कहाँ दंगों में मीडिया के साथ से मानवाधिकार का हौव्वा बनाकर कड़े क़ानूनों को रद्द कर दिया और सुरक्षा तंत्र को खोखला कर के अपने स्वार्थ के लिए देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया.

आज हर सुरक्षा कर्मी अपनी नौकरी की सुरक्षा को वरीयता देता है. इसके साथ-साथ यह भी देखिये कि जहां भी काँग्रेस (या कश्मीर में अब्दुल्ला / आज़ाद आदि) के काल में दंगे हुए तो कितने कठोरता से निपटाए गए. यही मीडिया तब हड्डी चबाते शांत थी.

इस समस्या का भी हल है और 100% अहिंसक भी है. ऐसे लोग, जो सुरक्षा कर्मियों को कर्मणा नपुंसक बनाकर देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, अपने-अपने समाज से बहिष्कृत हो. उनके पत्नी, बेटे-बेटियों को यह यहाँ-वहाँ कहा जाये कि तुम्हारा बाप जवानों / पुलिस का हत्यारा है. इसके सामने वे ज्यादा नहीं टिक पाएंगे, लेकिन ये हमारे लोगों से होने से रहा, वे तो इनके साथ रिश्ता जोड़कर खुद को socially upgrade करने के लिए अधिक उत्सुक होते हैं.

खैर, बात ज़रा ज़्यादा लंबी हुई. लेकिन उम्मीद है आप समझ गए ही होंगे कि हथियार हासिल होने पर भी कश्मीरी पत्थरबाजी ही क्यों करते हैं. वैसे इसका उपाय है, सुरक्षा दल गोफन चलाये. वही पत्थर गोफन से लौटाए. ज़्यादातर जवान ग्रामीण पृष्ठभूमि से होते हैं, गोफन में अभ्यस्त तो होंगे ही. बीस लोग भी पाँच मिनट तक गोफन चलाएं बड़े पत्थर चुनकर, परिणाम संतोषजनक आएंगे. (गोफन = shepherd sling, balearic sling)

आधुनिक बंदूकों से लैस सेना को गोफन चलाने को कहना, हास्यास्पद लगता है. बस उनको अपना कर्तव्य करने से रोका न जाये. वैसे और एक बात; इन सुरक्षा कर्मियों के तबादले कितने भी हो जाये, VIP सुरक्षा में इन्हें नहीं डाला जाता होगा तो कारण समझ में आता है.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY