खुद ही खोजना, जीना, पाना होता है, बुद्ध, शंकर, विवेकानंद, ओशो कोई आपके साथ नहीं चलता

मेरे बेटे का नाम है सिद्धार्थ. यह इस पीढ़ी के सबसे पॉपुलर नामों में से एक है. पर मैंने उसका नाम सोचा था उसके जन्म से कम से कम 10 साल पहले. यूँ तो सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के नाम के रूप में ख्याति पाता है, पर मेरे लिए इस नाम की प्रेरणा थी जर्मन लेखक हरमन हेस की पुस्तक सिद्धार्थ.

एक समय मैंने यह पुस्तक लगातार 8-10 बार पढ़ी थी… और इस पुस्तक का केंद्रीय चरित्र सिद्धार्थ, बुद्ध नहीं है, पर बुद्ध का समकालीन है. इस उपन्यास का बालक सिद्धार्थ बचपन में अपने पिता का घर और गुरुकुल छोड़ कर जंगल में चला जाता है और तपस्या करता है.

जब वह तपस्या करके अनेक सिद्धियाँ पा लेता है तो वह फिर बेचैन हो जाता है. नहीं, उसे सिद्धियों की खोज नहीं थी… वह तो कुछ और खोज रहा था. तो वह वन से निकलता है, और गौतम बुद्ध से उसकी भेंट होती है. वह बुद्ध से बहुत प्रभावित होता है… पर उनसे दीक्षा नहीं लेता… नहीं, बुद्ध का ज्ञान मेरा ज्ञान नहीं हो सकता… मेरा अपना अनुभव ही मुझे ज्ञान देगा… ज्ञान कम्युनिकेबल नहीं है, संप्रेषित नहीं हो सकता.

वह बुद्ध की संगति छोड़ कर वापस शहर में जाता है. वहाँ वह एक गणिका की ओर आकर्षित होता है, व्यापारी बन जाता है और सामान्यजन के जीवन को अनुभव करता है… पर सारे अनुभव और ज्ञान के बीच उसने एक ही काम की बात सीखी है… प्रतीक्षा करना…

खैर, कहानी आगे भी है, पर पूरी कहानी नहीं सुनाऊँगा. मेरा मूल बिंदु यह है – ज्ञान कोई किसी से नहीं ले सकता. खुद ही खोजना, जीना, पाना होता है… कोई बुद्ध, कोई शंकर, विवेकानंद, ओशो… कोई आपके साथ नहीं चलते…

यह अकेलापन हिन्दू मानस और दर्शन की नियति है. और स्वस्थ मन और बुद्धि अपनी अपनी क्षमता भर अकेले ही ईश्वर को, स्वयं को पाने की यात्रा और साधना करते हैं. फिर भी हिन्दू परंपरा में हमेशा ही गुरुओं, साधकों, मार्गदर्शकों का स्थान रहा है…

मुझे हमेशा लगा, केवल रुग्ण मन और आत्माएं ही इन गुरुओं, बाबाओं, मठों की ओर जाती हैं. स्वस्थ साधक अकेला ही चलता है… आज तक मैंने अनेक मित्र, स्वजन देखे हैं जो ऐसे बाबाओं, गुरुओं, मठ और सत्संग में उलझे हैं… वर्षों उलझे रहे हैं… पर उन्हें हमेशा साध्य के प्रति भ्रमित ही पाया है. जैसे कोई बच्चा खिलौनों से, बिल्डिंग ब्लॉक्स से खेल रहा हो.

फिर भी इस मठों, सत्संगों, बाबाओं का एक औचित्य और उपयोगिता है. हर मन स्वस्थ सबल नहीं होता. कोई भी मन हमेशा स्वस्थ सबल नहीं होता. जैसे शरीर रुग्ण होता है तो आप डॉक्टर के पास जाते हैं, दुर्बल रुग्ण मानस भी संबल खोजता है.

तो क्या यह संबल आपको राम में, कृष्ण में, शंकर में नहीं मिलता? इन सबको छोड़ कर आप किन बाबाओं की भक्ति कर रहे हो?

तो हर बार आप डॉक्टर के क्लिनिक से दवा लेकर ही स्वस्थ नहीं हो जाते… कई बार हस्पताल में भर्ती भी होना पड़ता है. यह अवस्था शारीरिक रोगों में कई बार देखी होगी… जब आप मजबूरी में किसी सरकारी हस्पताल के बिस्तर पर या किसी घटिया स्तरहीन नर्सिंग होम में भी भर्ती हुए होंगे…

अगर हिन्दू दर्शन और अध्यात्म एक स्वस्थ मन की व्यायामशाला है, खेल का मैदान है… तो ये मठ, सत्संग, गुरु एक सैनिटोरियम हैं. कई बार यहाँ आपको विवेकानंद और ओशो जैसे अध्यात्म-चिकित्सक मिलेंगे तो कई बार आशाराम या गुरमीत जैसे नीम हकीम भी मिलेंगे.

समस्या हिन्दू धर्म के उस मूल स्वरूप और संरचना में है जो अध्यात्म का यह विशाल भंडार समेटे चुपचाप बैठा है… पर अपने अनुयायियों को यह इंस्टिट्यूशनल सुविधा नहीं उपलब्ध कराता.

अब थके, अस्वस्थ मन कहाँ जाएंगे. उन्हें जब संबल चाहिए तो किसका दरवाजा खटखटाएं? अगर इन नीम हकीमों के पास जाएं तो समस्या है… न जाएं तो दूसरे खतरे इससे बड़े हैं…

दूसरी ओर एक ऑर्गेनाइज्ड माफिया है जो बड़े-बड़े एयरकंडिशंड हस्पताल खोले बैठा है जहाँ मरीजों की आत्मा की किडनियाँ और लिवर निकाल कर बेच दिए जाते हैं… जिंदगी भर के लिए उन्हें रुग्ण बना कर और उनकी आत्मा को डायलिसिस पर रखा जाता है… वे भी कहते हैं, बढ़िया ट्रीटमेंट चल रहा है बड़े वाले इंटरनेशनल हस्पताल में…

सिर्फ बाबाओं को कोसने से नहीं होगा. एक बड़े समुदाय का भाग होना… belong करना, स्वीकार किया जाना एक जरूरत है. वह जरूरत हिन्दू धर्म की मुख्यधारा में बहुत लोगों के लिए पूरी नहीं हो पाती.

मंदिरों में जाकर परिवार का बोध नहीं हो पाता. यह शून्य हमें भरना होगा. हिन्दू धर्म का समागम खड़ा करना होगा. नहीं तो ये इंटरनेशनल माफिया वाले फ़र्ज़ी हस्पतालों के जल्लाद हमारी सभ्यता की किडनियाँ निकाल कर बेच देंगे…

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