गुरु शिष्य परम्परा : देश को सबसे बड़ा धोखा इस देश के टीचर्स ने दिया

हमारे एक फेसबुकिये मित्र हैं. बड़े मूर्धन्य लेखक हैं. बनारस में रहते हैं. तबला बजाते हैं. अभी सीख रहे हैं. साथ-साथ छोटे मोटे प्रोग्राम कर के किसी तरह आजीविका चलाते हैं.

देश में शास्त्रीय संगीत सीखने के लिए बनारस से अच्छी जगह भला और क्या होगी… बनारस में संगीत की गुरु-शिष्य परम्परा बड़े पुरातन समय से रही है. शिष्य गुरुओं के घर पर ही रह कर दसियों-बीसियों साल सीखते, रियाज़ करते थे.

सो मैंने उन मित्र से पूछा… “बनारस में किसी कायदे के गुरु से सीख रहे हैं न…”, उनका दर्द उभर आया… “अरे कहाँ दद्दा, अब कहाँ रह गए हैं बनारस में गुरु”. मैंने पूछा, “क्यों? क्या हुए? यहाँ तो पहले ढेला उठाओ तो नीचे से तीन गुरु जी लोग निकल आते थे… अब क्या हुआ”?

“अरे सर, अब वो सब गुरु नहीं रहे, उस्ताद हो गए हैं…. अंग्रेजों को सिखाते हैं… घंटे के हिसाब से payment लेते हैं… और सिखाने के नाम पर बस खानापूर्ति…”, इस पर मैंने कहा, “अरे यार… उनका भी तो पेट परिवार है… कहाँ से जिएंगे-खायेंगे? अंग्रेजों से कमाने दो… पर अपने जीवन में कोई चेला तो निकालते ही होंगे”.

“हाँ सर… हम एक गुरु जी के पास गए थे. एक दिन सिखाये. अगले दिन तेल मसाला हरदी पियाज की लिस्ट थमा दिए…. बोले कल लेते आना. उनको 5000 रु महिन्ना चाहिए… तब सिखायेंगे”.

कलाकारों ने कला को भी अंग्रेजी-गणित जैसा विषय बना डाला है… ट्यूशन लो और सीखो…. मुफ्त में नहीं सिखायेंगे…

पुरातन काल में गुरुकुल व्यवस्था थी. राजा, गुरु को एकाध गाँव दे देता था. गुरु जी वहाँ अपना गुरुकुल बनाते. शिष्य आते थे. वहीं रहते थे. खेती करते, पशुपालन करते और शिक्षा लेते… गुरु को अपने परिवार के भरण पोषण की चिंता न थी.

गुरुकुल राज्य और समाज पोषित होता था. ब्रह्मचारी शाम को गाँव का चक्कर लगाते थे… हर घर के सामने आवाज़ देते… ‘भवति भिक्षान्न देहि…’, गृहस्वामिनी के पास जो भी अन्न, आटा-चावल होता झोली में डाल देती.

अंग्रेजों ने हमारी गुरुकुल परंपरा को नष्ट कर अपना स्कूल सिस्टम लागू कर दिया. आधुनिक शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या और सबसे बड़ा दोष, परीक्षा प्रणाली में है. गुरुकुल परम्परा में एग्ज़ाम नहीं था. न कोई सिलेबस…. किसी के प्रति कोई जवाबदेही भी नहीं थी.

एग्ज़ामिनेशन सिस्टम और डिग्री, सर्टिफिकेट की व्यवस्था भारतीय शिक्षा को खा गई. आज शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन न हो कर सिर्फ डिग्री लेना भर रह गया है. पूरी की पूरी शिक्षा ज्ञानार्जन पर नहीं बल्कि परीक्षा में ज़्यादा से ज़्यादा अंक लेने पर फोकस करती है….

आखिर इसका हल क्या है?

सरकार और समाज को एक प्रयोग करना चाहिए… experiment…

एक ऐसा स्कूल बनाओ जिसमे कोई क्लास रूम न हो… सिर्फ एक बगीचे में कुछ पेड़ हों… कोई syllabus न हो… और कोई exam न हो… किसी प्रकार की कोई औपचारिकता नहीं और कोई लाल फीताशाही नहीं…

टीचर्स के एक ग्रुप को 30–30 स्टूडेंट्स की 5 classes दे दो… यानि कुल 150 बच्चे. उन टीचर्स को इन बच्चों को दस साल तक पढ़ाने दो… टीचर्स ऐसे हों जो सचमुच के टीचर्स हों…. टीचिंग सचमुच जिनका पैशन हो, जूनून हो… बीच-बीच में नज़र रखते रहो… देखो क्या होता है… बिना syllabus, बिना exam और बिना लाल फीताशाही के वो बच्चे अनपढ़ रह जाते हैं क्या?

इस देश को सबसे बड़ा धोखा इस देश के टीचर्स ने दिया. सबसे बड़े कामचोर, धोखेबाज़, डाकू वही निकल गए… उनकी धोखाधड़ी को काबू करने के लिए CBSE जैसे बोर्ड्स ने आज इतने सारे safety precautions, checks और balances बना दिए कि पूरी व्यवस्था ही लाल फीते से बाँध दी.

CBSE स्कूल के प्रिंसिपल और टीचर की दशा उस बीवी जैसी हैं जो रोजाना अपने पति को, जब वो अपने ऑफिस से लौटता है शाम को… अपनी वफादारी का सबूत देती है… CBSE अपने हर स्कूल से बाकायदा सबूत माँगता है… बताओ इस महीने क्या-क्या activity करायी तुमने अपने स्कूल में… पहले फोटो भेजनी पड़ती थी, आजकल वीडियो मांगते हैं.

क्रमशः…

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