JNU जीतने की संघी ‘चाल’!

निर्मला सीतारमण के रक्षामंत्री बनने पर उम्मीद के मुताबिक ही प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. एक अग्रज तो इतनी दूर की कौड़ी लाए कि इस कदम को JNU जीतने की संघी ‘चाल’ तक बता बैठे. अरे भैवा! जनेवि को यूनिवर्सिटी ही रहने दो, वो ‘चैना’ नै न!!

दूसरी प्रतिक्रिया राष्ट्रवादी शेर-चीते-लकड़बग्घों की है. ‘टैंक मांगा, तो रक्षामंत्री मिल गयीं’ का नारा बुलंद कर ये लहालोट हो रहे हैं. हे गदधारियों! शांत! हरेक NDA वाले की डिग्री JNU की ही होती है. उनकी डिग्री देने से JNU राष्ट्रवादी उसी तरह सिद्ध नहीं होता, जैसे एकाध लड़की छेडनेवालों या जिहादी कामरेड्स की वजह से राष्ट्रद्रोही!! इस न्याय से चलोगे, तब तो अगर सेना ‘बलात्कारी’ है तो JNU का हरेक स्टूडेंट भी बलात्कारी हुआ!!

निर्मला जी को JNU से जोड़ कर खुश होने से पहले उनका इतिहास भी जान लो. वे वहां ‘फ्री थिंकर्स’ की रही हैं, कहीं अपनी ‘फ्री थिंकिंग’ के जलवे न दिखा दें. (इसका मतलब वामपंथी झूठों का समर्थन नहीं, जो निर्मला जी को SFI का सिद्ध कर रहे हैं).

वैसे, मेरी मानिए और सच पूछिए तो यह नियुक्ति बहुत खुशी की बात नहीं है. यह सरकार 3 साल में अकादमिक डिस्कोर्स से अगर वामपंथ को नहीं हटा सकी, सिलेबस नहीं दुरुस्त किया, आप लोगों के शब्दों में ‘भगवाकरण’ नहीं हुआ, पत्रकारिता से जातिवादी-परजीवी, राष्ट्रद्रोही विचार हाशिए पर नहीं आए, तो काहे की खुशी? सीधी सी बात है, जब तक अकादमिक संस्थानों और विचारों से, पत्रकारिता से इन परजीवी-वामपंथियों को उखाड़ फेंका न जाए, तब तक जश्न की कोई बात नहीं है.

(विशेष:- वामपंथी बुद्धिजीवियों को याद रखना चाहिए कि मोदीजीवा बिल्कुल तृणमूल स्तर की राजनीति से ऊपर उठे हैं. उनके पास तुम्हारे हरेक झूठ, छल, प्रपंच, धोखे और बेईमानी की काट है. बल्कि, राजनीति तो तुमको वह 45 साल न्यूनतम सिखाएगा. संभलकर, बच्चों! )

 

 

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