यूँ ही नहीं कोई प्रियंका से बनता हनीप्रीत!

बहुत बार दुःख होता है कि भला कैसे किसी रसूख वाले व्यक्तित्व के सामने एक महिला अपनी गरिमा सरेंडर कर सकती है। हर क्षेत्र में बहुत से ऐसे उदहारण हैं जहाँ या तो महिलायें सब कुछ जानते बूझते व्यक्तिगत लालच में अनर्गल व्यवहार करती हैं या किसी बहकावे में आकर शोषक का साथ देती हैं.

आखिर क्यों महिलायें इन बाबाओं, मठाधीशों, राजनीतिज्ञों, महंतों, अभिनेताओं, बिजनसमैन, साहित्यकारों, पत्रकारों, अफसरों, संस्थाधीशों, निर्देशकों के चंगुल में फंस जाती हैं. ऐसे दुराचारियों के साथ वो महिलायें भी बराबर की दोषी हैं. क्या इन अल्पबुद्धियों को जरा भी एहसास नहीं होता कि कैसे ऐसे व्यक्ति दुनिया दिखाने के भ्रम में इनकी उंगली पकड़ने के बहाने कब इनका शरीर पकड़ लेते हैं.

क्या वे उनके रसूख की सहायता से अपना जीवन संवारना चाहती हैं या फिर वो सच में इतनी भोली होती हैं कि उन्हें स्वयं नहीं पता चलता कि सामने वाला उनका इस्तेमाल कर रहा है. अगर पहला पक्ष है तो ये घोर निंदनीय एवं शर्मनाक है. अपने अस्तित्व को दांव पर लगा कर पायी इज़्ज़त कीचड़ से भी बदतर है. पर दूसरे पक्ष पर विचार जरुरी है. हो सकता है शुरूआती दौर में उन्हें आभास न हो पाए पर एक वक़्त के बाद तो उन्हें पता चल ही जाता है कि उपरोक्त व्यक्ति वास्तव में कितने पानी में है.

दरअसल अपने अभावों के शून्य को भरने के लिए आप किसी बेहतर और पूर्ण इंसान की खोज करती हैं. वें अभाव कुछ भी, किसी भी प्रकार के हो सकते हैं. पर औरते क्यों नहीं समझती कि उन अभावों की एवज में उन्हें सिर्फ ठगा ही जाता है. और जरा ये बताइये कि आपकी किसी भी रिक्तता को भरने के लिए दैहिकता से होकर ही क्यों गुजरना पड़ता है?

सबसे जरुरी जब हमें सब पता चल जाता है तो हम आवाज क्यों नहीं उठाती हैं? अगर गलती दोनों तरफ से है तो खुद को समझाइये. लेकिन तब भी चाहे कुछ आ जाए उस स्थिति से भागो मत. चूँकि बहुत बार परिवार, समाज और हमारी इज़्ज़त आड़े आ जाती है. तो भी रहो इनके बीच. इन्हें जवाब दो. इन्हें लताड़ों. एहसास दिलाओ जो हुआ सही नहीं हुआ. और आगे किसी और के साथ न किया जाए. लेकिन अगर गलती सिर्फ सामने वाले की है तो उसे बख्शिए मत. किसी भी कीमत पर चुप मत बैठिये. यकीन मानिये जब आप सहीं हैं तो विपरीत परस्थितियों में भी जीत सिर्फ आपकी ही होगी.

लेकिन अंततः सवाल वही कि मात्र किसी रसूख के आगे औरत बिछ कैसे सकती है? आपकी उच्चतम अंक अर्हता आपकी योग्यता का इंडेक्स नहीं हो सकता. आपकी योग्यता आपके विवेक, आपकी बुद्धि और आपकी आवाज में है. शोषण हो जाना और बेवजह मूक बधिर बन कर करवाने में फर्क है. जब तक आपको अंदाजा होता है तब तक बहुत देर हो जाती है. इसलिए जागरूकता ही बचाव है.

– मोनिका भारद्वाज

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