नैतिकता और पाखंड : इस सरल और साधारण रिश्ते से क्यों आहत हो रही हैं आपकी भावनायें

दीवार फिल्म में सलीम खान और जावेद अख्तर ने शशि कपूर (रवि) के नैतिकता के मापदंड बहुत ऊँचे रखे थे. इतने ऊँचे कि हम भी फिल्म देखते समय शशि कपूर के बजाये अमिताभ बच्चन (विजय) को ही सपोर्ट करते है. परिस्थितियाँ चाहे जो भी रही हों, विजय गलत था और रवि सही. यह नैतिकता और छद्म नैतिकता या वास्तविकता के बीच की लड़ाई थी, जिसमें जीत नैतिकता और सच्चाई की ही होती है लेकिन हम मूवी देखने के बाद शशि कपूर को कोसते हैं और अमिताभ के लिये दुखी हो जाते है.

आज लोगों की सबसे बड़ी परेशानी और कुंठा यही है कि वो खुद तो विजय के जैसा आचरण करते हैं, कहीं-कहीं विजय तो छोड़ो… ये डावर और सावंत को भी पीछे छोड़ देते हैं लेकिन ये दूसरों से यही उम्मीद रखते हैं कि वो नैतिकता के इनके पैमाने पर हमेशा ‘रवि’ बना रहे. दूसरों को ‘आदर्श’ पर ज्ञान देने से पहले ये कभी अपने गिरेबान में नहीं झांकते.

पिछले दिनों यही विशुद्ध दोगलापन… साहिर, अमृता प्रीतम और इमरोज़ के मुद्दे पर देखने को मिला. जिन्हें साहित्य और साहिर का ‘स’ नहीं पता, जिन्हें अमृता का ‘अ’ नहीं पता, उन्होंने भी इस मुद्दे पर जमकर हाथ साफ किये, भड़ास निकाली. एक जगह तो किसी ने साहिर और अमृता प्रीतम के रिश्ते को पहला लव जेहाद का मामला भी बता दिया.

जिस अमृता प्रीतम ने अलग होकर भी अपने पति प्रीतम का नाम ताउम्र अपने साथ लगाये रखा… उसके चरित्र की धज्जियां उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई.

साहिर की माँ नहीं चाहती थीं कि साहिर एक ‘दो बच्चों’ की माँ से शादी करें, वो अमृता को पसंद नहीं करतीं थीं और साहिर सबसे ज्यादा प्यार अपनी माँ से करते थे… अमृता से भी ज्यादा (कारण समझने हों तो भी पढ़ना पड़ेगा… प्रकाश पंडित द्वारा लिखित साहिर का परिचय)… तो अपनी माँ की खुशी के लिये वो अमृता से दूर हो गये. अब इसमें कौन सा लव जेहाद हो गया?

अगर लव जेहाद होता तो साहिर ज़बरदस्ती शादी कर चार बच्चे और पैदा करते. सुधा मल्होत्रा के मामले में भी यही हुआ था. अमृता से साहिर की शादी नहीं हुई लेकिन दिल में प्यार बना रहा… उसमें क्या गलत है?

इमरोज़ बताते हैं कि “हमारी जान पहचान के शुरुआती सालों में जब हम सिर्फ दोस्त थे… वे अमृता को स्कूटर पर बिठा कर रेडियो स्टेशन ले जाया करते थे. तब अमृता पीछे बैठी मेरी पीठ पर उंगली से साहिर का नाम लिखती रहती थीं, मुझे तभी पता चला था कि वह साहिर से कितना प्यार करती थीं”.

साहिर के साथ अमृता का रिश्ता, मन के स्तर का खामोश रिश्ता था, उनके बीच शारीरिक कुछ नहीं था. साहिर अमृता के लिए एक ऐसे इंसान थे जिसके होने के एहसास भर से अमृता को ख़ुशी और जज़्बाती सकून मिलता रहा.

इमरोज़ ने एक जगह कहा था… ‘अमृता साहिर से प्यार करती थीं… ये उनका मसला है और मैं अमृता को चाहता हूँ… ये मेरा मसला है. अमृता ने मुझसे कभी झूठ बोला होता तो मुझे दु:ख होता लेकिन ऎसी कोई बात नहीं थी.’ … तो भैया उन्हें सब कुछ जान कर कोई दिक्कत नहीं थी तो हमें क्यों दिक्कत है?

लोगों ने इस मुद्दे को ऐसे उठाया जैसे कोई ब्रेकिंग न्यूज़ इनके हाथ लगी हो. ‘रसीदी टिकिट’ का ‘र’ भी जिन्होंने नहीं सुना होगा… उन्हें ये भी नहीं पता कि ये सब अमृता प्रीतम ने खुद अपनी आत्मकथा में लिखा है और उस किताब का कवर और सारे पेज इमरोज़ के स्केच से सजे हुए हैं.

अब इस सरल और साधारण रिश्ते से आपकी भावनायें क्यों आहत हो रही है… जबकि ये रिश्ता तो दिल की सतह पर लिखा और पानी की तरह साफ और शफ़्फ़ाफ़ है.

इस मुद्दे पर अमृता को कोसते हुए मैंने ऐसे-ऐसे लोगों की पोस्ट पढ़ी जो नैतिकता और चरित्र के स्तर पर विजय तो क्या मदन पुरी और अमरीश पुरी के निभाए खल-चरित्रों को भी पीछे छोड़ दें.

अपनी हर तीसरी पोस्ट में ठरक दिखाने वालों ने भी ज्ञान देने में कोई कसर नहीं रखी. दोगलापन और पाखंड फेसबुक की U.S.P. और T.R.P. है. इससे गिने चुने लोग ही बचे हुए हैं.

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