सिनेमा के बहाने : ज़िंदगी के सिनेमा में घुली बरसात की छवियाँ

पिछले दिनों एकाएक मौसम ने करवट बदली और घनघोर बरसात ने मुंबई का जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया. सड़कों पर घुटनों तक पानी भरा था. जो जहां था वहीं रुक गया. घर से दूर बारिश में फंसे लोगों के लिए आम मुंबईकर ने अपने घर, ऑफिस एक-दूसरे के लिए खोल दिये. किसी तरह इस आपदा से बचा जा सका. ज़िंदगी फिर जीत गई. यह एक ऐसा दृश्य हो सकता है जिस पर आज के समय में फ़क्र ही किया जा सकता है. छोटी होती जा रही और दिन-ब-दिन सिकुड़ती जा रही दुनिया में यह दृश्य बहुत बड़ा है और निदा फ़ाजली के शब्दों में ‘जब तक ये दुनिया ज़िंदा है / धरती और आकाश का रिश्ता जुड़ा हुआ है’. ऐसे दृश्य अक्सर ज़िंदगी को किसी उपन्यास में तब्दील कर देते हैं और सदियों याद किए जाते हैं. सिनेमा भी एक तरह का साहित्य ही है और दृश्य का माध्यम होने के बावजूद उसमें लोकगीत की तरह सदियों याद किए जाने वाला गुण होता है. अपनी-अपनी तरह से सिनेमा के लार्जर देन लाइफ़ दृश्यों को सभी याद करते होंगे. सिनेमा में बरसात के तीन ऐसे दृश्य मेरे ज़ेहन में हैं.

राज कपूर की ‘श्री 420’ में होने वाली बरसात और ‘प्यार हुआ इक़रार हुआ’ गीत किसी भी बरसात में मुझे सबसे पहले याद आता है. मुझे लगता है हिन्दी सिनेमा में बरसात के मौसम और सिचुएशन पर इससे बड़ी इमेज हमारे पास नहीं है. मतलब कि यह दृश्य सारे विशेषणों से परे लगता है. और कितना ताकतवर भी कि आधी सदी से भी ज़्यादा समय गुज़र जाने के बाद भी वह दृश्य आँखों से ओझल नहीं होता. क्या तो उसका पिक्चराइज़ेशन है. स्टुडियो में सेट लगा है और उसके बाद भी कहीं से भी अगर कुछ भी नक़ली लगता हो तो बताइये.

मनुष्य की स्मृति और कल्पना, वास्तविक दृश्य से कहीं ज़्यादा उन्नत और ताकतवर और उर्वर होती है. इसलिए रंगमंच या सिनेमा में अगर एक दृश्य सामने चल रहा होता है तो एक दर्शक के दिमाग में चल रहा होता है. यहीं खेल होता है जब घट रहे दृश्य को अपने सम्पूर्ण रूप और रस में ग्रहण करके दर्शक की कल्पना अपने भीतर कुछ रच रही होती है. ‘श्री 420’ का यह दृश्य आँखों से जाता ही नहीं. अगर आपने प्रेम किया है तब भी नहीं, और नहीं किया है तब भी नहीं.

क्या तो एस्थेटिक्स है उस दृश्य का और फिर श्वेत-श्याम की तो बात ही क्या! उस पर आँखों के इशारे और होंठों के आड़े-तिरछे में नरगिस ने जो ‘एक्स्प्रेशन’ दिये हैं और उसकी प्रतिक्रिया में राज कपूर ने जो मासूमियत भर मुस्कान और मसखरेपन वाली हरकतें की हैं, वो दुनिया के ईमानदार और खूबसूरत होने का ही एहसास देती है.

कल्पना कीजिये कि ऐसी ही किसी बरसात में हम हों जब उससे बचने के बजाय भीगने को दिल करे. कुछ कमाल की स्ट्रीट लाइट्स हैं, बेहद साफ़ सड़क, हवाएँ, बारिश की फुहारें और अपने प्रेमी का साथ. एक दृश्य में इसी सेट अप के साथ राज-नरगिस को एक छाते में भीगते जाते हुए दिखाया है और दर्शक की तरफ उनकी पीठ है, यानि चलते चले जा रहे हैं. उफ़…कला यही करती है. जो आप हैं, जो आप होना चाहते हैं, जो आप कभी नहीं होना चाहते और जो आप कभी नहीं हो सकते – इनके बीच निरंतर आवाजाही करते हुए वह आपको उस एहसास से गुज़ार देगी जिसका मज़ा सच में इस सृष्टि की अनोखी घटना है. ‘श्री 420’ ने बरसात और प्रेम के एहसास को अमर कर दिया.

बरसात की ऐसी ही स्मृतियों में मुझे ठीक रोमांस के उलट एक और भयावह दृश्य याद आता है – मदर इंडिया का. मुझे यह दृश्य इसलिए भी याद है कि बचपन में वीडियो पर यह फ़िल्म कोई 6-7 साल की उम्र में देखी थी. और उस समय देखी पूरी फ़िल्म का केवल वही दृश्य मेरी स्मृति में है. खेत की मचान पर अपने बच्चों के साथ राधरानी बनी नरगिस बरसात की भयावह सच्चाई को देख पा रही है. ठीक बाद मचान टूट जाती है. और शायद बिरजू के मुंह से हमे सुनते हैं, ‘भगवान हमको पानी नहीं चाहिए’. फिर बाढ़ की त्रासदी और राधरानी के जीवन में आगे आने वाले संघर्षों के पहले कुछ और बड़े बन जाते दृश्य – जैसे दोनों बच्चों को सुरक्षित ऊंचे स्थान पर बैठाकर लकड़ी के खंबे का एक पाया ख़ुद के कंधे को बनाना.

साँप आने की स्थिति में एक हाथ से साँप को भगाने का जतन करते हुए दूसरे हाथ और कंधे से मचान को पकड़ कर खड़े रहना. यह दृश्य न केवल बरसात की स्मृति को अलग तरह से जज़्ब करता है बल्कि विपरीत परिस्थिति में खड़ा रहने का शऊर भी देता है. मुझे किसी भी स्थिति में इस दृश्य का फील सावित्री-यमराज की कथा वाली स्थिति और सावित्री के जीवट से कम नहीं लगता. बहरहाल, ‘मदर इंडिया’ और नरगिस के किरदार पर मुकम्मल किताब लिखी जा सकती है.

हिन्दी सिनेमा के इन दो दृश्यों ने बरसात की मेरी स्मृति को बहुत समृद्ध किया है. मैंने न तो बरसात में प्यार के इज़हार और इक़रार को जिया है और न ही बाढ़ को. ऐसे में ‘सेकंडरी एक्सपीरियंस’ बतौर भी बरसात की मधुर और भयावह स्मृति मेरे जीवन में है. सिनेमा की इसी ख़ासियत और जी जाने की तड़प में मुझे वोंग कार वाई की फ़िल्म ‘इन द मूड फॉर लव’ की याद आती है. जहां बरसात एक किरदार की तरह फ़िल्म में होती है. बहुत ही कमाल के और अद्भुत संगीत में मैगी चुँग जिस तरह से काल्पनिक हाँगकाँग की तंग गलियों में टिफ़िन लेकर आती और जाती दिखाई देती है, उसने बरसात को कविता जैसा ही महसूस कराया है.

किसी पहाड़ी शहर की तंग गलियों और सीढ़ियों वाले रास्ते से स्लो मोशन में आती-जाती मैगी चुँग ने खूबसूरती को नए आयाम दिये हैं. बरसात पता है कि नकली हो रही है पर फ़िल्म को देखते हुए वह आपके भीतर सचमुच फुहार-दर-फुहार बरस रही होती है. और वहीं टोनी लुंग का किरदार अक्सर टकराता है. यह बरसात और वह सेट, जहां दोनों अक्सर बारिश से बचने के लिए खड़े होते हैं, उसके बारे में कुछ कहने के बजाए उस दृश्य को देख डालना ही सही होगा. फिर होता है एक रोएँ खड़े करने वाला दृश्य. पता है कि नकली है सब कुछ और तुरंत वो घट जाता है जो असल में होता है. एक एहसास प्रेम का जो पनपता है भीतर और नस-नस में समा जाता है. इतना कि फ़िल्म की चल रही कहानी में रिहर्सल करते वक़्त जलते लैंप के बल्ब की रोशनी में पानी गिरता दिख रहा. और जब वास्तविकता में हम आते हैं तब बारिश बंद हो जाती है पर अब टोनी और मैगी के किरदार भीतर रो रहे होते हैं. क्योंकि पता है उन्हें ये अलग होने का समय है. इससे अद्भुत बरसात और क्या हो सकती है!

दरअसल, कलाओं में वो कह जाने और महसूस करवा देने का सामर्थ्य होता है जो शब्द और दृश्य में नहीं. यानि शब्द और अर्थ के सहारे, शब्द और अर्थ के परे. फिर केवल आप होते हैं, ख़ुद से भी अलग. ख़ुद के साथ अकेले और बहते चले जाते हैं दूर. सिनेमा की यही ख़ासियत है कि एक साथ कई ज़िंदगियाँ हम जी जाते हैं, उसके अपने सम्पूर्ण प्रभाव के साथ. थोड़ा-बहुत तो रुपये-पैसे से अलग इस कला पर हमें रश्क होना ही चाहिए. और गर्व भी. राज कपूर, नरगिस, मन्ना डे, लता, महबूब खान, शंकर-जयकिशन के लिए एक सलाम तो बनता है. और इस ज़िंदगी के लिए शुक्रिया भी, है न !

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