Me-Time : अपने लक्ष्य के वास्कोडिगामा आप खुद हैं

लकीर का फकीर ही क्यों बनना है? सही राह और पिटी पिटाई लकीर ही सही, लेकिन क्या अपनी तरह की नहीं हो सकती यह लकीर?

जो सदैव से जानी-पहचानी राह है और उस पर सदा से लोग आते-जाते रहे हैं और मालूम भी है कि वह लक्ष्य को पहुँचती है – उस पर चलने में सहूलियत अवश्य है. पर, जो उबड़ – खाबड़ पगडंडी हमारे चलने से बनी और लक्ष्य तक पहुँची भी – उसकी संतुष्टि के क्या कहने!

सबसे बड़ी बात है आपका स्वातंत्र्य! अपने मन के अनुसार, अपने समय में, स्वयं ढूँढी आपने अपनी राह. चूंकि राह आपने बनाई, तो भीड़ नहीं थी, टोक-टोकारी नहीं थी. कभी बैठ कर आपने स्वप्न देखे, सुस्ता लिया और फिर अपने स्वप्न को अपने साधन और सूझबूझ से पूरा करने में लग गए . . . फिर लक्ष्य को पहुँचे.

मैं जब पहली बार अकेले घूमने निकली थी, तो लोगों ने बहुत बातें बनाईं थीं. यहाँ तक कि मेरे ऊपर ही प्रश्न उठा दिया गया था. अगली बार जब अपनी एक सहेली के साथ निकली, तो मुझ पर दूसरी तरह का संदेह किया गया! फिर भी मैंने हर वर्ष एक बार अकेले निकलने के निर्णय को नहीं बदला. आज पाती हूँ कि मेरे साथ only women का एक कुनबा ही निकलने को अधीरता के साथ तैयार रहता है.

यह शुरुआत अपने आसपास मैंने की थी. आज मेरे जान-पहचान की महिलाएँ इस me-time के महत्व को जान समझ रही हैं. आपके राह की खोज आपकी थी. अपने लक्ष्य के वास्को डिगामा आप थे. एक अद्भुत संतुष्टि. और वह अनुभव आपकी थाती.

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