आध्यात्मिक इतिहास : पिपीलिका और विहंगम मार्ग

शैव अद्वैत धारा के इंचगिरी सम्प्रदाय का प्रवर्तन श्री भाऊसाहेब महाराज ने किया. उनका मार्ग पिपीलिका पथ माना गया है जैसे किसी भूभाग के ज्ञान के लिए पिपीलिका अर्थात् चींटी को समस्त भूभाग का भ्रमण करना पड़ता है उसी प्रकार तत्त्वज्ञान के लिए हमें भी सतत ध्यान लगाकर अद्वैतप्राप्ति होती है.

1906 में श्री भाऊसाहेब महाराज ने अट्ठारह वर्षीय सिद्धरामेश्वर को दीक्षा प्रदान की. सिद्धरामेश्वर 1920 तक धारणा और ध्यान सिद्ध करता रहा. इस बीच 1914 में भाऊसाहेब महाराज ने समाधि भी ले ली थी.

1920 में सिद्धरामेश्वर पुरातन तोप के मुख पर बैठकर जब ध्यान कर रहे थे तब उन्हें विहंगम मार्ग का ज्ञान हुआ. चींटी की भाँति निखिल भूभाग का भ्रमण न करके यदि जीव विहंग अर्थात् पक्षी की भाँति उड़ जाए तब क्षणांश में वह ज्ञान को प्राप्त होता है. इस ज्ञान में दग्ध प्राणबीज पुनः फलीभूत नहीं होता और मुक्ति होती है.

श्री सिद्धरामेश्वर के गुरुभाइयों ने विहंगम मार्ग को गुरु के बताए पिपीलिका पथ से भिन्न जानकर आरम्भ में इसका विरोध किया किंतु अनेक साधकों को तत्त्वप्राप्ति करता देख पश्चात इसे स्वीकार किया.

विहंगम मार्ग अक्रम ज्ञानप्राप्ति है, इसमें अद्वैतदर्शन को जानकर मनोस्पंद अवरुद्ध कर देते है. ध्यानधारणा आदि का लम्बा पथ पार नहीं करना पड़ता. अद्वैतदर्शन का अध्ययन करने से पूर्व मंत्र द्वारा मन को ग्रहणशील बनाया जाता है जैसे हल्दी की माला बनाने से पूर्व हल्दी को दूध में गला दिया जाता है.

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