अभिव्यक्ति डॉक्टर अव्यक्त की : पिता

रात 9 बजे के बाद एक माता पिता अपने बच्चे को शॉल में लपेटकर लाये. मेरी कुर्सी के बाजू में रखे गोल स्टूल पर बैठते ही पिता बोला – “सॉरी सर, मैं आने में लेट हो गया.”

बच्चे को 3 दिन से तेज़ बुख़ार था, डेंगू फीवर के लक्षण थे. मैंने आज तीन दिन बाद बुलाया था. लेकिन आज भी तेज़ बुखार था उसे.

“मैंने कहा उसे ज़ल्दी क्यों नहीं लाये.”

पिता की आँखों में अपराधबोध, हताशा के भाव थे. कहा “सर छुट्टी नहीं मिल पाती.”

“क्या करते हैं आप?” इलाज लिखते लिखते मैंने पूछा.

“सर पहले चाय बनाता था अब महिंद्रा के शो रूम में काम करता हूँ गार्ड का.”

“ओके… कितनी देर का काम होता है”. मैंने जानना चाहा था शायद डाँट सकने के लिए कि बच्चे को लाने लायक छुट्टी तो किसी को भी मिल सकती है.

सर सुबह 8 से रात 8.30 तक.

मैं पैन को पैड पर रख कर उसकी बड़ी सी दाढी में छुपे पुरुष, पिता, संघर्ष, हिम्मत, अभाव, हताशा, शोषण की अनेक लकीरें आँखों के इर्द गिर्द देख पाया था.

मैंने कहा “छुट्टी तो मिल ही ज़ाती होगी न? मैं लिख कर दे दूं बच्चा बीमार है?”

“सर छुट्टी मिल जाती है लेकिन तीन दिन की तनख्वाह काट लेते हैं.”

“अच्छा, तो कितनी है पेमेंट?”

सर 5000 रूपये महीना. और यह कहते कहते उसकी आँखों में आंसू डबडबा गए थे. सामने बैठी उसकी पत्नी के चेहरे पर निर्लिप्त भाव थे.

हाँ कई बार व्यक्ति दुःख के अहसास को कठोरता के बांधों से बांधे संघर्षरत होता है और किसी की हल्की सी सहुनुभूतिपूर्ण बातें भी उस बांध को तोड़ देती हैं.

पत्नी के चेहरे की निर्लिप्तता नियति से हारी हुई निर्लिप्तता थी. ज़ैसे तेज़ धार में घंटों तैरता आदमी अंततः स्वयं को ढीला छोड़ देता है, पानी की धार को और गहराई को समर्पित हो जाता है , बस वैसी ही निर्लिप्तता थी उसके चेहरे पर बच्चे के तेज़ बुखार, पैसों की तंगी, समय का अभाव और पति के आंसू के प्रति.

अच्छा तो कितनी पेमेंट है पर उसने कहा था, रुंधे गले से…

” सर 5000 रूपये”

मैं विस्मित सा देख रहा था 12 घन्टे रोज़ में 5000 रूपये महीना कमाने वाले पिता को शॉल में लिपटा बीमार बच्चा और कुछ आंसू रोकने की कोशिश करती आँखों को. हाँ पुरुष को किसी के सामने रोने की अनुमति नहीं.

लेकिन सर, छुट्टी पर तीन दिन के पैसे काटते हैं. यह वाक्य कितना क्षोभ उत्पन्न करने वाला था…

इस पिता की कहानी भारत के प्राइवेट सेक्टर में शोषित होते करोड़ों पिताओं, बेटों, माओं की कहानी है.

महंगी कारों के शो रूम में आये अमीर लोगों, सेठों को सलूट मारने का काम होगा न उसका…
12 घंटे वो बिना आंसू लाये करता तो है.

लेकिन बच्चे के इलाज को भी आप छुट्टी न दो…

ये कैसा शोषण?

कौन कर रहा है ?

एक देशवासी दूसरे देशवासियों का.

उनके परिवार पल जाने लायक पैसे और समय तो दो बड़ी कारों के सेठ… एक दिन में 5000 की दारू पी जाने वाले सेठ..

विरोधाभास देखने हों तो दिख जाएंगे आपको किसी कार शो रूम के बाहर 5000 रूपये माह की नौकरी करते गार्ड में. करोड़ों पिताओं के कुछ बूँद गिर चुके कुछ थम चुके कुछ सूख चुके आंसुओं में. कुछ माँओं के निर्लिप्त चेहरों में. वहीं नेताओं के इंसान से 10 गुना बड़े किसी बड़े राक्षस से होर्डिंग के नीचे पन्नी बीनते बच्चों में.

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