मेकिंग इंडिया गीतमाला : हम दोनों

हम दोनों के बीच यह बात तय थी कि एक नौका पर
केवल तू और मैं बैठकर विहार करेंगे,
हमारी तीर्थ यात्रा किस देश और किस लक्ष्य के लिए होगी,
इसका भेद विश्वभर में किसी को ज्ञात नहीं होगा…

उस तटहीन सागर में बहते हुए
मैं अकेले तेरे श्रवणोत्सुक कानों में गीत गाऊँगा..
सागर की उत्ताल तरंगों के समान
शब्दों के बन्धन से मुक्त मेरी रागिनी
तू मौन मन्द मुस्कान के साथ सुनेगी…

क्या अभी तुझे समय नहीं है?
अब भी क्या कुछ काम काज शेष है?
देख, सन्ध्या समुद्र के तट पर उतर आई है
और धुंधले प्रकाश में समुद्र पार के पक्षी पंख फड़फड़ाते
अपने घोंसलों में लौट रहे हैं..

तू घाट पर कब आएगी
कि मेरा बन्धन ज़रा काट दे
और सूर्य की अंतिम किरणों सी हमारी नाव भी
रात्रि के अन्धेर में निरुद्देश्य चल दे…

– रविन्द्रनाथ टैगोर

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