बाढ़ और शहर, कारण और निवारण : भाग 2

अब आइये समझें कि बड़े-बड़े शहरों में बाढ़ या वर्षा से होने वाली तबाही का कारण और निवारण है. शहरों की town planning के अनुसार हर मोहल्ले, हर गली और हर सड़क बनाने से पहले वर्षा के पानी के निकास का प्रावधान किया जाता है. प्रारम्भिक काल में जब हमारे समाज में मात्र सरकारें मकान बनाती थी तो स्थान का अभाव नहीं था और कम से कम अपने समाज के लिए ही इन व्यवस्थाओं पर ध्यान दिया जाता रहा है. दूसरे वही सरकार मकान बनाती थी और वही उसके रख रखाव की भी जिम्मेवारी लेती है जिसके कारण वह नगर पालिका का कर भी लेती है.

कालांतर में समय में बदलाव के कारण और सरकार की स्वयं की नीतियों के कारण कुछ कुछ बड़े-बड़े निर्माताओं को यह काम दिया जाने लगा. वह सरकार से सस्ती दर पर ज़मीन ले कर मकान या कॉलोनी बना कर बेचने लगे. लोगों को भी बने बनाए मकान या प्लाट मिलने लगे.

[बाढ़ और किसान, कारण और निवारण : भाग 1]

अब यह निर्माता, मकान या प्लाट बेच कर वहाँ के रख रखाव की ज़िम्मेवारी नहीं लेता था. इसके लिए वही नगर पालिका यह काम करती थी. अब निर्माता ने अपने अधिक मुनाफे के कारण वर्षा जल और अन्य कूड़ा कर्कट के निकास के लिए नालियाँ नहीं बनाई थी.

अभी तक वह नालियाँ या निकास के रास्ते अपना काम कर रहे थे. फिर वह दौर आया जब प्लास्टिक का बहुतायत में प्रयोग आरंभ हो गया. अब आप ध्यान दीजिये कि प्लास्टिक की थैली क्योंकि गलती-सड़ती नहीं है, वह नालियों में जमने लगी. इसके कारण जो भी जल के निकास के रास्ते थे, वह बंद होने लगे. और इसी कारण वर्षा का जल धरती के अंदर स्वाभाविक रूप से जाने से वंचित रह गया.

यहीं पर एक बदलाव और आ गया कि शहरों की अधिकांश ज़मीन पर सीमेंट से बनी इमारतें होने के कारण जल का सीधे मिट्टी से संपर्क लगभग न के बराबर रह गया. इस कारण वह वर्षा का जल धरती के अंदर नहीं जाता है.

अब इसके कारण दो तरफा नुकसान हो रहा है. एक तो वर्षा का जल शहरों में जमा होने के कारण सड़ांध पैदा करता है जिसके कारण बीमारियों का अंदेशा रहता है, दूसरे जल स्तर धीरे-धीरे नीचे गिरता जा रहा है. इस कारण अब पानी की कमी होने लगी है.

अब गांवों से आबादी रोजगार की तलाश में शहरों में आने लगी है. जिसके कारण शहरों पर आबादी का दबाव बढ़ने लगा है. दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों में प्रतिवर्ष 2 लाख से अधिक लोग बाहर से आ रहे हैं. इसके कारण शहरों की मूलभूत सुविधाओं पर असर पड़ा है.

लगभग यही दशा शहरों की सड़कों की भी है. इसके लिए भी निकास के रास्ते बनाए जाते हैं. परंतु धूल, मिट्टी और सबसे अधिक प्लास्टिक के उपयोग के कारण उन नालियों में कूड़ा कर्कट जमा हो जाता है और वह वर्षा के जल को धरती तक नहीं जाने देता है. समय के बीतने के साथ नालियाँ क्षतिग्रस्त भी लगी हैं.

जब वर्षा का जल अपने गंतव्य स्थान तक नहीं पहुँच पाता तो पानी पड़े-पड़े सड़ने लगता है. जिसके कारण इसके महत्वपूर्ण दूरगामी दुष्प्रभाव होने लगे हैं. पहला तो अब धरती का जल स्तर धीरे-धीरे गिरने लगा है जिसके कारण आपको जल संरक्षण जैसे शब्दों का प्रयोग करना पड़ रहा है. पहले यह सब हमारे सही निर्माण कला के उपयोग से वैसे ही संभव हो जाता था.

दूसरे पानी के अधिक समय तक सतह पर रुके रहने के कारण वातावरण में विषैली नमी आ जाती है जिसके कारण आप इस मौसम में नई-नई बीमारियों को सुनने लगे हैं. डेंगू, चिकनगुनिया, स्वाइन फ्लू और अन्य प्रकार के वाइरस इसी कारण इस मौसम में अत्यधिक पनपते हैं. तीसरे दुष्परिणाम के रूप में सड़के पहले से कम समय में टूटने लगी हैं.

नियम तो यह कहता है कि समय-समय पर इस प्रकार के जल निकास के रास्तों और नालियों को साफ करवा दिया जाये. परंतु यह संभव नहीं हो पा रहा है. जहां पर भी तथाकथित सफाई होती है उन सब स्थानों पर मात्र इतना किया जाता है कि एक या दो बाल्टी साफ पानी डाल कर देख लिया जाता है पानी का निकास हो गया कि नहीं. अब जब अधिक वर्षा होती है तो मिट्टी, धूल और कूड़े कर्कट के साथ जल को इससे निकास नहीं मिल पाता है.

अब आइये इसके निराकारण के विषय में चर्चा करें. जब तक किसी भी समस्या के कारण को नहीं समाप्त किया जाएगा, उसका समाधान संभव नहीं. पहला काम तो यह है कि सभी नालियों को साफ करके जहां-जहां पर आवश्यक है बड़ी नालियां बनाई जाएँ. एक नियमित समय पर इनकी सफाई का काम सुचारु रूप से किया जाए चाहे वर्षा आए, न आए.

शहरों से वापिस गावों में लोगों के जाने का रास्ता बनाएँ. इन सरकारों ने खेती को तो बना दिया घाटे का काम, और इसके साथ चलने वाले सभी व्यवसाय बंद हो गए तो ग्रामीण शहरों में पलायन कर गए. इसके लिए उन्हें फिर से गांवों में बसाने का काम करना पड़ेगा. ग्रामीण क्षेत्र में ही खेती को फायदे का काम बनाएँ और वहीं पर कृषि से संबन्धित food processing unit लगाए जाएँ. नदियों की गाद की सफाई करके उन्हें शुद्ध करके उपयोग योग्य बनाया जाये.

अब इन आसान कामों में होने वाली अड़चनों पर विचार करें. इसके लिए सर्वप्रथम सरकार की इच्छा शक्ति और पर्याप्त धन हो. इच्छा शक्ति तो फिर भी मिल जाएगी पर जब सरकारें खुद लगभग 30% के कर्जे के बोझ तले हों तो उनसे इस सब काम की अपेक्षा करना शायद ठीक नहीं होगा. इसके लिए सरकार अर्थक्रांति या ऐसे ही किसी प्रावधान से अपने आपको समृद्ध बनाए और फिर अपनी इच्छा शक्ति का संपूर्ण उपयोग करे. तब तक हर वर्षा पर गरीबों को 2 किलो सत्तू और एक अस्थायी रैन बसेरा दे कर अपने वोट पक्का करके सरकारें अपना काम चलाती रहेंगी.

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