नोटबंदी का फेल होना सिर्फ मोदी का फेल होना नहीं, होगा भारत का फेल होना

नोटबंदी का लेखा-जोखा आ गया. अपनी राजनैतिक आस्था के अनुसार सबने उस पर अपनी प्रतिक्रिया दी. मोदी जी के समर्थकों के अनुसार नोटबंदी पूर्णतः सफल रही, तो राहुल, लालू, ममता जी के समर्थकों के अनुसार पूरी तरह फेल रही. दोनों पक्षों की अपनी अपनी मजबूरियां हैं, दोनों पक्ष अपने अपने कर्तव्य पथ पर डटे हुए हैं.

जिन्हें मोदी में विकास पुरुष दिखता है, या जिन्हें मोदी के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं दिखता, वे मोदी जी के साथ हैं, और जिन्हें राहुल मोदी जी से ज्यादा योग्य, अनुभवी, ईमानदार दिखते हैं, या जिनकी नेहरू परिवार के प्रति अटूट आस्था है, राहुल जी के साथ हैं.

मेरे हिसाब से कोई गलत नहीं, दोनों ठीक है. पर नोटबंदी के आंकड़ों ने मुझे भी चक्कर में डाल दिया है. रिजर्व बैंक के अनुसार मात्र सोलह हजार करोड़ के नोट ही वापस नहीं आये हैं, और अभी भी असंख्य लोग ऐसे हैं, जो अब भी नोट जमा करने की छूट चाहते हैं. सरकार यदि उन्हें मौका दे तो शायद सोलह हजार करोड़ का यह आंकड़ा शून्य भी हो सकता है. तो क्या हम यह मान लें कि देश में काला धन बिल्कुल ही नहीं था? क्या मोदी ने काले धन को वापस लाने का जो प्रयास किया वह बिल्कुल ही मूर्खता थी? क्या नोटबंदी का फेल होना मोदी का फेल होना है?

अगर ऐसा है, तो इसका मतलब यह हुआ कि देश के बड़े नेता, बिल्डर, व्यापारी, ठेकेदार, अफसर सभी दूध के धुले हुए हैं, किसी के पास कोई काला धन नहीं था. हमारे इर्द गिर्द कहीं कोई भ्रष्टाचार नहीं. और अगर ऐसा है तो सचमुच मोदी फेल हो गए, उनका निर्णय सचमुच मूर्खता से भरा था.

सच यह है, कि नोटबंदी का फेल होना मोदी के फेल होने से ज्यादा हमारा फेल होना है. इसमें कोई दो मत नहीं कि लगभग तीन लाख करोड़ के काले धन का जो सरकारी अनुमान था, वह सही था. उसके बावजूद भी यदि सारा पैसा वापस चला गया तो इसके दो ही कारण हो सकते हैं.

पहला यह कि बाजार में सरकारी आंकड़ों से अधिक के नोट थे, जिन्हें पिछली सरकारों ने अवैध रूप से छापा था. या दूसरा यह कि सारे काले धन को आम लोगों की मदद से वापस पहुँचा दिया गया. क्या किसी देश के लिए इससे भी ज्यादा बुरा कुछ हो सकता है कि वहां की आम जनता स्वयं काले धन को सफेद करने में सहयोग करे? आप भले मोदी के कितने भी बड़े विरोधी हों, पर यदि आप अन्धविरोधी नहीं है तो आपको यह मानने में कोई दिक्कत नहीं होगी कि नोटबंदी का निर्णय एक हिम्मत भरा और ईमानदार प्रयास था.

आप लागू करने के तरीकों पर प्रश्न उठा सकते हैं, नोटबंदी से उपजी अफरा-तफरी में हुई जनहानि पर भी प्रश्न कर सकते हैं, ये सारे प्रश्न जायज हैं, पर नोटबंदी को काले धन के विरुद्ध उठाया अबतक का सबसे साहसिक कदम मानने में कोई आपत्ति नहीं होगी. जिस तरह सरकारी तंत्र और आम लोगों की मिलीभगत से नोटबंदी फेल हुई, उसे देख कर यह कहा जा सकता है, कि अब कोई प्रधानमंत्री अगले पचास सालों तक इस तरह के कठोर कदम नहीं उठाएगा. नोटबंदी के हश्र ने न सिर्फ काले धन को पकड़ने के अभियान को धक्का दिया है, बल्कि भविष्य की उम्मीद को भी मारने का काम किया है.

मोदी के विरोधी इसके लिए उनकी लगातार आलोचना कर रहे हैं. वे आलोचना करें, यह उनका अधिकार है. पर इस आलोचना से क्या फर्क पड़ेगा? मोदी भारतीय इतिहास में इंदिरा के बाद दूसरे ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिनके पास सरकार बना सकने भर का व्यक्तिगत जनाधार है. आपकी आलोचना उनके स्वास्थ्य पर कोई फर्क नहीं डालेगी.

अभी कहीं पढ़ रहा था, किसी ने लिखा था- यदि दर्जी से आपके पैजामे का कपड़ा गलत कट जाय, तो वह कच्छे के फायदे गिनाने लगता है. मोदी भी कल कुछ नया शगुफा लाएंगे और अपनी राजनैतिक जमीन बचा ले जाएंगे, पर नोटबंदी की असफलता ने एक प्रधानमंत्री के रूप में उनको जो चोट दिया है, उसका भय भविष्य के कई प्रधानमंत्रियों को कठोर निर्णय लेने से रोकता रहेगा.

मेरे हिसाब से आज चर्चा का विषय हम में और हमारे तंत्र में पसरा भ्रष्टाचार होना चाहिए, जिसने सरकार के एक ईमानदार प्रयास को विफल कर दिया. आज चर्चा के केंद्र में वह अनैतिकता होनी चाहिए जो हम सब के अंदर घर बना चुकी है. आज चर्चा उन उपायों पर होनी चाहिए, जो भ्रष्ट देशों की सूचि में प्रथम स्थान पर खड़े भारत का स्थान बदल सकें. नोटबंदी कि विफलता ने हमें अपने अंदर झांकने का एक मौका दिया है, यह अलग बात है कि हम झाकेंगे नहीं. पर यदि हम झांकते तो देखते कि नोटबंदी का फेल होना सिर्फ मोदी का फेल होना नहीं, बल्कि भारत का फेल होना है.

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