नोट नोट नोट : कुछ तथ्य

भारत में 1 हज़ार का नोट 1978 में बंद किये जाने के बाद दुबारा शुरू हुआ 2000-01 में. इस साल में कुल प्रचलित मुद्रा थी लगभग 2 लाख 18 हज़ार करोड़, और इनमें से लगभग 53 हज़ार करोड़ 500 के नोट थे और लगभग 4 हज़ार करोड़ के 1 हज़ार के, यानी कुल रकम का लगभग 26% बड़े नोटों में था.

10 साल बाद, 2009-10 में कुल प्रचलित मुद्रा थी लगभग 8 लाख करोड़. इनमें 500 के नोट थे लगभग 3 लाख 65 हज़ार करोड़ के और 1 हज़ार के थे लगभग 2 लाख 40 हज़ार करोड़ के, यानी कुल रकम का लगभग 75% बड़े नोटों में बदल चुका था।

2013-14 में कुल प्रचलित मुद्रा थी लगभग 13 लाख करोड़. 500 के नोट थे लगभग 5 लाख 70 हज़ार करोड़ के और 1 हज़ार के नोट थे लगभग 5 लाख करोड़ के, यानी कुल रकम का 82% बड़े नोट थे.

2014-15 में कुल प्रचलित मुद्रा थी लगभग 14 लाख 500 करोड़. 500 के नोट लगभग 6 लाख 50 हज़ार करोड़, 1 हज़ार के नोट 5 लाख 60 हज़ार करोड़, यानी कुल रकम का 84% बड़े नोट थे.

2015-16 में कुल प्रचलित मुद्रा थी 18 लाख 400 करोड़. 500 के नोट लगभग 7 लाख 85 हज़ार करोड़, 1 हज़ार के नोट थे लगभग 6 लाख 300 करोड़ के, यानी कुल रकम का 78% बड़े नोटों में था.

इसके आगे के कुल प्रचलित मुद्रा के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. बस बड़े नोटों के आंकड़े आये हुए हैं जो सबको पता हैं कि 99% बड़े नोट बैंको में जमा हुए और वापस 500 और 2000 के नए नोटों में बाजार में उतरे.

ये जो जमा हुए, ये सारे के सारे व्यक्तिगत या करंट एकाउंट में ही नहीं बल्कि सरकारी जमा के रूप में भी जमा किये गए. जैसे सेल्स टैक्स/ इनकम टैक्स/ बिजली या और सरकारी विभागों की बकाया पेनाल्टी/ टेक्स/ पेट्रोल पंपों पर रोज की सेल की रकम/ रोडवेज और ट्रेन टिकट की रकम.

भारत में एक दिन में लगभग 3000 करोड़ के पेट्रोलियम प्रोडक्ट बिकते हैं, यानी नोटबन्दी के वक्त में लगभग डेढ़ लाख करोड़ की रकम. इसी तरह एक दिन में लगभग 500 करोड़ के ट्रेन टिकट बिकते हैं, यानी नोटबंदी के दिनों में लगभग 25 हज़ार करोड़ के.

बस टिकट सेल एक दिन में कितनी होती है, इसका कोई अधिकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है पर इतनी बड़ी जनसंख्या को देखते हुए अकेले सरकारी बस सर्विसेज कम से कम 200-250 करोड़ मूल्य के टिकट रोज बेचती ही होंगी.

अब अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं है कि बड़ी रकमें बिना बैंक वालों की मिलीभगत के भी बदली गई होंगी. हर शहर में 30% तक रकम कम लेकर लोगों ने नोट बदले हैं, सोना खरीदा है, बिल्डरों को कैश देकर फ़्लैट खरीदे हैं, डेढ़ गुनी कीमत पर खरीदे हैं. बड़ी फैक्ट्री वालों ने अपने सब स्टाफ को नोट बदलने पे लगाया था जब तक बैंक सीधे बदल रहीं थीं, बैंक वालों ने अपनी जमा की हुई id एक दूसरे से बदली हैं…

ये सब जानकारी, एक अनुमान मात्र है. असलियत इससे कहीं और आगे भी हो सकती है. डबल सीरीज़ नोट (जो सरकारी छापाखाने या उस जैसे छापाखाने में छपे और मार्किट में गए) मिले या नहीं, ये आंकड़ा आना अभी बाकी है. नकली नोट तो जमा हुए नहीं. बैंको में तो वो नष्ट किये गए होंगे, असली अभी भी लोगों के पास बिना जमा किये यदा कदा मिलते ही रहते हैं…

ये मानना बेवकूफी ही होगी कि कोई काला धन या अवैध रकम थी ही नहीं, बल्कि ये मानना पड़ेगा कि ऐसे लोगों ने, जो भ्रष्टाचार की रकम अरबों खरबों में इकट्ठा की, वह कैश की जगह किसी और रूप में जमा की गई या हवाला के जरिये भारत के बाहर जमा करते हैं हमेशा.

बाकी भारत में कभी भी कुल प्रचलित मुद्रा का 5% से ज्यादा बैंको में कैश जमा के रुप में नहीं रहा है. नोटबंदी का सबसे बड़ा फायदा ये हुआ कि 99% बड़ी रकम सरकारी निगाह में आ गई. अब आगे इससे होने वाले ट्रांजेक्शन छुपाना मुश्किल होगा.

ये बात सही है कि सरकार का ये अंदाज़ गलत साबित हुआ कि 3 लाख करोड़ के आस पास रकम जमा नहीं होगी, पर जुगाड़ तंत्र ज्यादा कारगर साबित हुआ. हां लगभग 5 लाख करोड़ के नकली नोटो से मुक्ति जरूर मिल गई…

अब इनकम टैक्स रिटर्न की संख्या बढ़ चुकी है. GST लगने से ज्यादा खुदरा व्यापार टेक्स के दायरे में आएंगे. नकली/फेक कम्पनियां, जो सिर्फ पैसा घुमाने के काम आती थीं, बन्द की जा रहीं हैं. जन धन खातों में लिमिट से ज्यादा रकम जमा करने की जांच चल रही है. आइन्दा सरकार और कदम उठाएगी देश को भ्रष्टाचार के कैंसर से मुक्त करने के लिए और सफल भी होगी ऐसी पूरी उम्मीद है…

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