चोरों के भरोसे कितने दिन कितनी मौज करेगा देश, पार तो करना ही होगा आग का दरिया

GDP की वृद्धि दर में गिरावट को लेकर मीडिया और विपक्षी राजनीति के गलियारों में हंगामा बरपा है. लेकिन इस गिरावट का कारण क्या है? क्योंकि पहले 2 वर्षों तक तो यह वृद्धि दर ठीकठाक गति से बढ़ रही थी. पिछले एक वर्ष में सरकार ने ऐसा कोई नया नियम या कानून नहीं बनाया जिसे उद्योग जगत का विरोधी कहा जाए. इसके बजाय उद्योग जगत को प्रोत्साहित करने वाले मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया सरीखे कार्यक्रम प्रारम्भ किये. फिर यह गिरावट क्यों?

इस सवाल पर कोई चर्चा नहीं हो रही, एक शब्द नहीं बोला जा रहा. इसके बहाने केवल नोटबन्दी के खिलाफ तांडव कर रहा है विपक्ष और मीडिया का एक वर्ग. दरअसल इस गिरावट के कारणों के सच से जानबूझ कर मुंह चुराया जा रहा है. क्योंकि उन कारणों की पड़ताल आज हल्ला हंगामा कर रहे लोगों को संगीन सवालों के कठघरे में खड़ा कर देगी.

[फ़्लॉप नहीं, हिट हुई है नोटबन्दी]

आइए जानते हैं उन कुछ कारणों को – वर्ल्ड बैंक ने 1999 से 2007 तक के विस्तृत अध्ययन के पश्चात 2010 में प्रकाशित अपनी एक रिपोर्ट में भारत में GDP का 20% धन काला धन होने का तथ्य उजागर किया था. 2013 में वर्ल्ड बैंक की ऐसी ही एक रिपोर्ट में भारत की GDP में कालेधन की 30% उपस्थिति का अनुमान लगाया गया था.

वर्ल्ड बैंक की उपरोक्त रिपोर्टों के अलावा लगभग 9 साल पहले 2008 में मुम्बई में हुए 26/11 हमले की जांच कर रही IB और NIA सरीखी जांच एजेंसियों ने आतंकी फंडिंग की जांच करने के बाद सरकार को एक चौंकाने वाली जानकारी दी थी कि देश में लगभग 1 लाख 70 हज़ार करोड़ रूपए मूल्य के नकली नोट चलन में हैं.

अनुमान लगा लीजिये कि अब क्या स्थिति रही होगी. यह धन भी कहीं बक्से में नहीं रखा हुआ था. बल्कि चलन में ही था. उद्योग धंधों में इसकी बड़ी घुसपैठ थी. अतः प्रधानमंत्री मोदी ने इस काले धन पर रोक के उपाय साल भर पहले शुरू किए.

सबसे पहले भारत से हवाला के जरिये विदेशों में घूमकर साइप्रस मॉरीशस सिंगापुर रूट से भारत आने का रास्ता कठोर कानून बनाकर बंद किया गया. काले धन को बेनामी तरीक़े से धन्धे में खपाने वाली एक लाख कम्पनियों के लाइसेंस निरस्त किये गए. ऐसी 37000 और अन्य कम्पनियों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई प्रारम्भ की गई. और अंत मे नोटबन्दी ने काले धन के खेल के इस गोरखधंधे की कमर ही तोड़ दी. बची-खुची कसर GST ने पूरी कर दी है.

अतः जिस देश की GDP में 30% काला धन खपा हुआ हो उस देश में काले धन के ख़ात्मे की दिखावटी नहीं गम्भीर और कठोर कार्रवाई शुरू होगी तो कुछ समय के लिए GDP की रफ्तार तो लड़खड़ायेगी ही. इसके कष्टकारी तात्कालिक परिणाम भी देश को झेलने होंगे. लेकिन सारी दुनिया के अर्थशास्त्री एक स्वर से इस बात को स्वीकारते हैं कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में काला धन जितना कम होता है, वह देश उतनी ही तेजी से फलता फूलता है.

अतः उपरोक्त पूरे घटनाक्रम को मैं उस पीड़ादायक सर्जरी की तरह मानता हूं जो देश को एक गम्भीर रोग से मुक्ति दिलानेवाली है. इसीलिए मैंने शीर्षक ही यह बनाया कि चोरों के भरोसे कितने दिन और कितना मौज करेगा देश? आग का दरिया तो पार करना ही होगा.

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