झोली वाले बाबाओं और पैगंबरों से बचिए, बच्चों को स्वाभिमान सिखाइए

एक झंडू बाबा को लेकर हल्ला मचा हुआ है. आप सब लोग आश्चर्य कर रहे हैं कि इस देश में इतनी बड़ी संख्या में लोग बुद्धिहीन कैसे हो सकते हैं. कैसे वे एक अपराधी, जो इतनी अजीब-अजीब हरकतें करता हो, उसमें भगवान, ख़ुदा या फकीर देख सकते हैं. लेकिन मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ. ना ही मुझे रामपाल बाबा, राधे माँ और निर्मल बाबा वाले मामलों में हुआ था. मामले कई हो सकते हैं लेकिन उनका एक ही मूल कारण निकलेगा. आप उसकी जड़ को समझ लीजिए.

ये जितने भी हरियाणा और पंजाब के लोगों को आप रामरहीम के चेलों के रूप में देख रहे हैं इनमें से कोई आपको ऐसे परिवार से नहीं मिलेगा कि जहाँ हिन्दू परम्पराएँ इनकी जीवनशैली का हिस्सा हो. इनमें से कोई भी आदमी या महिला पूछने पर गायत्री मंत्र, रामायण या हनुमान चालीसा की कोई चौपाई या फिर कोई संस्कृत मन्त्र अथवा श्लोक नहीं सुना सकेंगे. सीताराम और राधाकृष्ण के विषय में इनकी जानकारी शून्य है. क्यों? क्योंकि इनके घरों में ना ही ऐसी कोई संस्कार परंपरा इनके माँ बाप के समय थी और ना ही आज इनके समय में है. और मुझे हँसी आती है तब जब कोई इस बाबा को “हिंदू सन्त” जैसा कुछ संबोधित करता है. सरकारी कागजों में ये लोग अपना धर्म क्या भरते होंगे, कह नहीं सकता. लेकिन ये लोग हिन्दू तो कतई नहीं कहे जा सकते.

आप सोच सकते हैं कि ये लोग सिख परंपरा में विश्वास रखने वाले होंगे. पर जी नहीं.
मेरा विश्वास है कि इनसे दसों सिख गुरुओं के नाम क्रम से बताने को कहा जाए तो नहीं बता सकेंगे. इनका सिख परंपरा से भी कोई जुड़ाव नहीं था. और नतीजन जो एक स्पेस यानी खाली जगह पैदा हुई उसी का फायदा रामपाल और राम रहीम जैसे झंडू बाबाओं ने उठाया और इन्हें बड़ी आसानी से फुसलाकर “एक नया मज़हब” जिसे “इंसानियत” का नाम दिया, इनके दिमाग में इस कदर घुसाया कि उसके बाद ना तो इनकी अपनी समझ बचती है और ना ही सही गलत की विवेक बुद्धि.

ये तो मैंने आपको हरियाणा और पंजाब का हाल बताया. अब पूरे भारत की भी समझ लीजिए.
इसी तरह यूपी में एक ‘भोले बाबा’ भी चर्चा में रहे थे. पिछड़ी जातियों और दलितों में बाबा ने यह प्रचार करवाया कि ऊँची जातियों के संतों और भगवान को छोड़ो क्योंकि हमारे लिए स्पेशल परमात्मा धरती पर आए हैं. और फिर गुलाबी रंग का कोट पेंट पहने बाबा जनता को दर्शन देते थे.

भोले-भाले आदिवासियों को बहलाकर ईसाई मिशनरी के ठग कैसे चमत्कार के नाम पर उनका धर्म परिवर्तन करते हैं, इसके सैकड़ों वीडियो सोशल मीडिया पर जगजाहिर हैं

चाहे साईं बाबा हो या फिर राधे माँ, आसाराम हो या फिर घुइयाँ लस्सन इत्यादि स्वघोषित सन्त महात्मा फकीर, जिन्हें आप टीवी पर भी देख सकते हैं. जो लोग इनसे प्रभावित होकर इनसे किसी भी रूप में जुड़ते हैं उनमें भी एक बात कॉमन मिलेगी. उन लोगों को यही नहीं पता कि हिन्दू संस्कृति में सन्त परंपरा होती है. कोई भी संत या आचार्य आसमान से नहीं टपक सकता. कितने शर्म की बात है कि आज हिंदुओं को यही नहीं पता कि शंकराचार्य कौन थे. उनकी चलाई शंकराचार्य परंपरा क्या है.

अपने बच्चों को साईं के आगे माथा रगड़ना तो सिखाया लेकिन कभी तुलसीदास, मीरा, सूरदास, चैतन्य महाप्रभु के बारे में नहीं बताया. बताएंगे कैसे, जब खुद को ही नहीं पता. हिन्दू युवाओं से गायत्री मन्त्र पूछा जाए तो कितने उसका सही उच्चारण और अर्थ बता सकेंगे, आप खुद ही समझदार हैं. रही बची कसर स्कूलों ने पूरी कर दी. फिर हम उम्मीद करते हैं कि ढोंगी बाबा ना पैदा हों. भैया, प्रकृति का नियम है, कोई जगह खाली नहीं रह सकती. जहाँ स्पेस यानी अवकाश होगा वहाँ कोई और आकर जगह बना लेगा. ये बाबा, फ़क़ीर के शौक उन्हीं को लगते हैं जिनके “बेसिक्स क्लियर” ना हों.

सीधा सा हिसाब है. लोग जितना वैदिक संस्कृति से यानी कि जड़ों से दूर होंगे उतना ही गलत रास्तों में भटकेंगे. हर रोज़ एक नया पंथ और फॉर्मूला लेकर कोई मैसेंजर ऑफ गॉड पैदा हो जाता है. और अपनी सांस्कृतिक विरासत से दूर होने के कारण लोग उनके चक्कर में बिंध जाते हैं, जैसे जाल में कबूतर. कोई भी मुँह उठाकर अपने नाम के आगे “आचार्य”, “महर्षि”, “संत” और “बाबा” जैसे विशेषण लगा लेता है और पैर पुजवाने लगता है.

एक काँग्रेसी चाटुकार जो स्वघोषित आचार्य है, ने तो उत्तर प्रदेश में कल्कि अवतार के नाम पर अपना “कल्कि धाम” स्थापित कर रखा है. भोली भाली जनता इनसे यह भी नहीं पूछती कि महाराज आप किस गुरु-शिष्य परंपरा में आते हैं, ज़रा अपने से पहले के 5 गुरुओं के नाम तो बता दो. हिंदुओं को यही नहीं पता कि वैष्णव भक्ति के प्रमुख कौन से चार सम्प्रदाय यानी परम्पराएँ हैं. फिर कोई भी ऐरा गैरा कृष्ण भक्ति के नाम पर इन्हें अपनी टोली में शामिल कर लेता है, और ये हो भी जाते हैं.

एक बात आप अन्य लोगों को सिखाएँ और समझाएँ कि जो व्यक्ति वैदिक धारा के विपरीत बात बोले या आचरण करे, वो पक्का ठग है. आप जानते हैं? सनातन धर्म में वेद सबसे बड़ी संस्था है. अगर स्वयं भगवान भी वेद विरुद्ध बात करें तो उसे अस्वीकार करने को कहा गया है. किसी को गुरु पद पर विराजने से पहले या फिर किसी भी संस्था से जुड़ने से पहले उसकी गुरु परंपरा का पता करें. एक बात.

दूसरी बात, अगर कोई लम्बी गुरु परंपरा में नहीं भी है तो उसकी प्रमाणिकता उसके आचरण से जाँचिए. क्या उसका 24 घंटे का जीवन खुली किताब की तरह है अथवा नहीं. उसका व्यक्तिगत रहन सहन सादगी भरा है या नहीं.

और अंत में आचार्य श्रीराम शर्मा जी की एक बात साझा करना चाहता हूँ. जो हर आध्यात्मिक जिज्ञासु व्यक्ति को याद कर लेनी चाहिए. उन्होंने कहा कि ब्राह्मण वही जो समाज से कम से कम ले और समाज को ज़्यादा से ज़्यादा दे. समाज को नैतिक पाठ अपने आचरण से सिखाने की उसकी जिम्मेदारी होती है.

और संत वही कि जो अपरिग्रही हो यानी कि चीजें इकट्ठा ना करता हो. सादगी सन्त होने की पहली शर्त है.

अच्छा होगा कि हिन्दू या सनातनी लोग अपने बच्चों को गायत्री मंत्र और हनुमान चालीसा विरासत में दें, ताकि वो जड़ों से जुड़े रहें.

विश्व की सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक और उदार सभ्यता का वंशज होने पर गर्व करना सीखिए और अपने घर के बच्चों को भी सिखाइए.

फिर किसी झोली वाले बाबा से कोई डर नहीं रहेगा.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY