लोकतंत्र और दबाव समूह

एक बार 12th क्लास की पॉलिटिकल साइंस की किताब में सरसरी निगाह से एक शब्द पढ़ा था दबाव समूह (Pressure Groups). ज्यादा तो याद नहीं पर ये ऐसे समूह थे जो किसी देश की राजनीति को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते है.

इनमें धर्म और मज़हब के प्रमुखों से लेकर अति धनी व्यवसायी लोगों के समूह शामिल होते हैं. या किसी विशेष स्थान पर किसी समुदाय या जाति विशेष के मुखिया. और कई बार विदेशी खुफिया एजेंसियां भी.

ये समूह अपने अनुयायियों, धन, और अपनी जाति की संख्या और अपनी पहुँच के बल पर, राजनीति को बाहर से नियंत्रित करते है. और अपनी सुविधा के अनुसार वैधानिक योजना आयोग और सरकारी तंत्र का दुरुपयोग करते है.

जैसे एक बड़ा व्यवसायी ग्रुप, किसी जीत सकने वाली पार्टी को फंडिंग करेगा और उसके बदले में अपनी आवश्यकता अनुसार योजनाएं बनवायेगा. जैसे अगर कोई बिल्डर है तो वो शहर के बाहर सुदूर इलाके में कौड़ी के भाव जमीन लेगा और तय कर लेगा कि एक मुख्य राजमार्ग यहां से गुजरे. ताकि उसकी जमीन के भाव चार गुना हो जाए.

ऐसे और भी कई उदाहरण हो सकते हैं. इस फायदे में नेताओं की भागीदारी तय होती है. कहा जाए तो लोकतंत्र की सब से पवित्र कुर्सियां साम दण्ड भेद के पायों पर टिकी है.

अगर आपको लगता है कि ये दुष्चक्र सिर्फ भारत की राजनीति का हिस्सा है, तो बता दूँ दुनिया में जहां भी चुनावी व्यवस्था है या लोकतंत्र है, वहां ये ग्रुप्स होते ही होते हैं. ये ‘पानी है तो काई भी होगी’ जैसा सम्बन्ध है. बस काई कम या ज्यादा हो सकती है.

किसी भी राजनीतिक दल की जनता के प्रति क्या शुभेच्छा है या विकास और न्याय में कैसी आस्था है, उसकी क्या योजनाएं हैं, ये सब दूसरे दर्जे की बातें है. पहले नम्बर पर तो चुनाव जीतना, सत्ता हासिल करना ही होता है.

और चुनाव एक नग्न खेल है जिसमें प्रचार के लिए धन और चुनाव जीतने के लिए वोटो की संख्या ही सब कुछ है. और हां, इस तंत्र को गाली देने से पहले आप ये याद करियेगा पिछली बार वोट कब और किस आधार पर किया था.

आज जिस डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख की शक्ति संविधान पर भारी पड़ रही है, उसकी शक्ति का एकमात्र स्त्रोत इसके अंध समर्थकों की संख्या और चुनावों को प्रभावित कर सकने की क्षमता औऱ उस वजह से मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण. ये भी उसी तरह का कुचक्र है. मैं तुम्हारा समर्थन करूँगा, तुम मुझे सुरक्षित रखो.

हरियाणा से ही हूँ तो जानता हूँ कि राम रहीम का 36 विधानसभा सीटों पर सीधा दखल है या कहिए ये ही जीत या हार तय करता है. अब ऐसे में किसी राजनीतिक पार्टी में ये क्षमता नहीं कि वो बाबा को सीधा चैलेंज करे. अगर ये पार्टी चैलेंज करेगी तो अगली बार दूसरी पार्टी बाबा की रिहाई को अपने मैनिफिस्टो में प्राथमिकता देकर चुनाव को अपने हक में कर लेगी. ये एक दुष्चक्र है. यूँ ही चलता रहेगा.

इस दुष्चक्र को तोड़ना है तो हमें ही खुद पर काम करना होगा. जब तक संविधान को ही एक मात्र गीता, बाईबल या कुरान नहीं माना जाता और राष्ट्र को एक मात्र आराध्य या ईश्वर, तब तक किसी भी राष्ट्र में लोकतंत्र शब्द पंचतन्त्र की कहानियों की सुखद और कर्णप्रिय शब्द से ज्यादा कुछ नही.

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