गतिरोध का हासिल भाग-2 : बड़े बेआबरू होकर डोकलाम से तुम निकले

शिकारी जिस जाल से दूसरों को शिकार बनाता है, उसमें खुद फंस जाने पर उसकी छटपटाहट देखने लायक होती है. तो डोकलाम में चीन पहले दिन से ही अपने बुने जाल में फंस रहा था. मनोवैज्ञानिक युद्ध के महारथी इस देश की हजारों साल बाद भी सुन त्जू में आस्था ज्यों की त्यों है. सुन ने लिखा था- वह युद्ध ही क्या जो लड़ कर जीता जाए. चतुर सेनापति बिना लड़े जीतते हैं. विरोधी को भयाक्रांत कर और युद्ध का हौव्वा दिखा कर.

चीनी रणनीति है किश्तों में छोटे-छोटे इलाकों पर कब्जा करो. एक बार में इतना ही कि कोई देश उसके लिए युद्ध की हद तक न जाए. लेकिन सतत अतिक्रमण और घुसपैठ की इस रणनीति से चंद सालों या दशकों में वह एक बड़े भूभाग का नक्शा बदल देता है. दक्षिणी चीन सागर में इसे देख सकते हैं. इस रणनीति को सलामी स्लाइसिंग और कैबेज (पत्तागोभी) कहते हैं. यह रणनीति वह सामारिक ही नहीं कूटनयिक क्षेत्र में आजमा रहा है. छोटे-छोटे देशों को धमका कर अपने खेमे में लाओ ताकि बड़ा देश (अमेरिका) अपने आप अलग-थलग पड़ जाए.

[गतिरोध का हासिल भाग-1 : पाकिस्तान को छोड़ ज़्यादातर एशियाई देश इससे खुश]

बस इस बार यही रणनीति उल्टी पड़ गई. एक भी गोली नहीं चली और चीन हार गया. मनोवैज्ञानिक युद्ध का दांव उल्टा पड़ा. डोकलाम में पहले दिन से ही चीन की धमकियों का जो क्रम शुरू हुआ वह लगातार 74 दिन तक जारी रहा. चीन ने 45 हजार के करीब सेना, आर्टिलरी और सैकड़ों युद्धक विमान भी तिब्बत भेजे. मकसद यह दिखाने का था कि हम नफा-नुकसान की परवाह नहीं करेंगे, हमला जरूर करेंगे. वीटो पावर वाले पांचों देशों को संदेशा भेजा- भारत को पीछे हटाओ वर्ना विकट लड़ाई होगी.

कोई तिकड़म काम नहीं आई. धमकियां बेअसर होते देख वीडियो जारी किए, पत्थर भी फेंके. गर्जना की कि जनमुक्ति सेना (पीएलए) वो पहाड़ है जिसे कोई नहीं हटा सकता. पहले यह कॉमिकल और बाद में प्रहसन सा हो गया. चीन को एक सुपर पावर की जगह विदूषक और खिसियानी बिल्ली की भूमिका में देखना आनंदित कर गया.

चीनियों का हान श्रेष्ठता में और भारत के दोयम दर्जे का देश होने की धारणा में अखंड विश्वास है. गतिरोध के दौरान भारत के एक पूर्व विदेश सचिव ने एक चीनी राजनयिक का एक बयान उद्धृत किया जिसमें उसने कहा था, “भारतीय वो कुत्ते होते हैं जो कुछ देर गुर्राते हैं और फिर दुम हिलाने लगते हैं.” चीनी राजनयिक की मंशा अपमान करने की नहीं थी, बस इस तरह की भाषा उनके लिए सामान्य है. चीनी आटिज्म! पर धारणा ही नहीं, अनुभव भी उन्हें धोखा दे गए.

भारत की संभावित प्रतिक्रिया को लेकर वे आश्वस्त थे कि वे पहले गुर्राएंगे, फिर दुम हिलाने लगेंगे. पर भारतीय इस बार अलग मंशा से डटे थे. ना गुर्राए, ना दुम हिलाए, बस डटे रहे और उनके सर्कस पर चुपचाप हंसते रहे. आखिर में पीएलए ने जब देख लिया कि भारत पीछे नहीं हटने वाला तो उन्होंने युद्ध करने के बजाय मार देंगे-काट देंगे का शोर मचाते हुए विदा लेना ठीक समझा. जाते-जाते थोड़ा और मनोरंजन हो जाए, इसके लिए हिदायत दे गए- डोकलाम का सबक याद रखना.

भारत के लिए इस बार दांव पर इतना कुछ था कि दुम हिलाने की गुंजाइश नहीं बची थी.

पहला, यदि वह भूटान में आए दिन चीनी घुसपैठ और अतिक्रमण नहीं रोकता तो फिर सुरक्षा संधि बेमानी साबित होती. फिर भूटान शायद कुछ समझौते कर चीन के साथ ही अपना भला देखता. भूटान के बाद नेपाल का नंबर आता.

दूसरा, चीन भारत की सुरक्षा की दृष्टि से बेहद संवेदनशील इलाके में सड़क बना रहा था. रोका नहीं जाता तो दावा ठोकने के विशेषज्ञ चीनी बस्ते से कोई नया नक्शा निकालते और बताते कि सिलीगुड़ी गलियारे के पास तक लगती जमीन आठवी सदी में तिब्बत का हिस्सा थी और इस नाते अब चीन की है. जो बता रहे हैं कि भारत के पास सिलीगुड़ी गलियारे की रक्षा के लिए पर्याप्त सैन्य क्षमता है, वे बुनियादी उसूल भूल रहे हैं कि अपने घर में लड़ने के बजाय शत्रु की जमीन लड़ना हमेशा बेहतर होता है.

तीसरा, भारत के लिए अपनी विश्वसनीयता का सवाल था. और इसमें सबसे अहम चिंता थी भारत की ढुलमुल नीति को लेकर एशिया के मित्र देशों और अमेरिका और मित्र यूरोपीय देशों में लगातार बढ़ता संशय. एक आम धारणा बलवती हो रही थी कि भारत ‘फ्री राइडर’ यानी मुफ्त सवारी गांठने वाला देश है. उनका मानना था चीनी हठधर्मिता और उसकी विस्तारवादी नीतियों को लेकर पश्चिमी देशों की चिंताओं को भुनाते हुए भारत उनके सर्वश्रेष्ठ हथियार खरीद रहा है और अपनी सेना को मजबूत बनाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकें व एक्सक्लूसिव अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं-संगठनों की सदस्यता भी मांग रहा है. उनकी अपेक्षा थी कि बदले में भारत कभी चीन के सामने खड़ा होगा. लेकिन हम अक्सर ‘रणनीतिक स्वायत्तता और पंचशील’ की आड़ में कन्नी काटते रहे.

दो नावों की इस सवारी का एक दिन अंत होना ही था. जरूरत थी बस एक मजबूत नेतृत्व की. आखिर में बिल्ली के गले में घंटी भारत को ही बांधनी थी. इस घटनाक्रम पर सबकी नजर थी खास कर दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों की. फिलहाल इस शुरुआत से सबने राहत की सांस ली है.

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने जब अपने चीनी समकक्ष से पूछा कि क्या हर विवादित इलाका स्वयमेव चीन का हो जाता है तो वे दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों का सवाल भी उठा रहे थे. 74 दिन के गतिरोध में वे समीकरण जो अब तक ढके छिपे हुए थे, अब औपचारिक शक्ल लेने के करीब हैं. हाल ही में वाशिंगटन में अमेरिका, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और आस्ट्रेलिया के विदेश सचिव जुटे और इंडो-पैसिफिक (भारत-प्रशांत महासागर) क्षेत्र में रक्षा सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया.

डोकलाम को कूटनीतिक विजय कहें या यह सेना की मजबूत मोर्चेबंदी का नतीजा! चीन के आगे कूटनीति नहीं चलती. इसलिए यह सैन्य विजय है. नरेंद्र मोदी ने जब ‘लुक ईस्ट नीति’ को ‘एक्ट ईस्ट नीति’ का नाम दिया तो तमाम चुटकुले गढ़े गए. कहा गया कि जुमलेबाज का एक और जुमला. पर डोकलाम के बाद शायद उन्हें समझ में आए कि ‘एक्ट’ का मतलब एक्शन है.

उधर, ‘ग्लोबल टाइम्स’ के सामने चीनियों को यह समझाने की चुनौती होगी कि पहाड़ (पीएलए) हिला नहीं है बल्कि थोड़ी देर सुस्ता रहा है. जल्द ही यह फिर किसी नई घुसपैठ व नए दावों के साथ प्रकट होगा.

और अंत मेंडोकलाम समझौते की खबर को पाकिस्तानियों ने चीन की भारी जीत बताते हुए कहा कि भारतीय फौज वहां से भाग रही है. लोगों ने समझाया कि विवाद सड़क का था और वो तोड़ दी गई है पर पाकिस्तानी सड़क के बारे में कुछ सुनने को तैयार ही नहीं? उधर, वियतनाम कह रहा है कि भारत उसे ब्रह्मोस मिसाइलों की आपूर्ति कर चुका है. अपना विदेश मंत्रालय खंडन मुद्रा में है.

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